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Reposts
  • yusuf_meester 1w

    लिखूँगा किसी दिन खुदको तो तुम भी पढ़ लेना
    मिरी बेपरवाह किरदार बेदाग़ दिल पे जड़ लेना

    लहज़ों की अफ़सुर्दगी , बयां करती है ये आँखें
    शिकायतों की गठरी बांध तुम मुझसे लड़ लेना

    मुझे शक़ अब मिरी ही मुहब्बत पे होने लगा है
    कशमकश में हूँ शायद ! मेरा हाथ पकड़ लेना

    ©yusuf_meester

  • yusuf_meester 1w

    अब शे'र-ओ-शायरी से राबता टूटने लगा है...

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    सुना है इश्क़ में दिल नहीं भरता मगर भर रहा है
    इसका मतलब तू इश्क़ नहीं , मज़ाक कर रहा है

    ये बात तो छुपा लेनी चाहिए थी ना तुझे 'यूसुफ़'
    फिर क्यूँ ? कमबख़्त तू छुपाने से भी डर रहा है

    ©yusuf_meester

  • yusuf_meester 9w

    अभी तो दिल ने सीखा था ज़ुबान-ए-इश्क़ यूसुफ़

    और उस संगदिल ने बेवफ़ाई का तमाचा दे मारा

    ©yusuf_meester

  • yusuf_meester 9w

    शायद मिरे दिल का, रोशनदान बंद हो गया
    तभी अरमानों का ये कब्रिस्तान बंद हो गया

    वो खरीददार वफ़ाएँ खरीदने आया था यहाँ
    और बाज़ार-ए-इश्क़ में , दुकान बंद हो गया

    ©यूसुफ़ मिस्टर

  • yusuf_meester 10w

    जाने क्या उस इक शख़्स में देखती है नजरें
    कि दहलीज़ उनकी, अक्सर चूमती है नजरें

    बोसे लगे थे उनकी मुहब्बत के इस दिल पर
    वो हाल-ए-दिल बड़े शौक़ से कहती है नजरें

    मैं , मिरी वफ़ा , मोहब्बत और मिरी तनहाई
    क़ैदी-ए-मुकद्दर हैं मगर नहीं मानती है नजरें

    कभी हुआ करता था इक चाँद उस छत पर
    अब उस घर की दरो दीवार ताकती है नजरें

    ताक रहा था इक शख़्स बड़े गौर से मुझको
    मगर ये, मुहब्बत की मार से बचती है नजरें

    ©यूसुफ़ मिस्टर

  • yusuf_meester 10w

    मुहब्बत जब जान पे बन आई तो ये हर्फ़ निकले

    मेरी वफ़ाओं के कद्रदान , बड़े कमज़र्फ निकले

    ©यूसुफ़ मिस्टर

  • yusuf_meester 10w

    कासा-ए-दीद लिए बैठे हैं दर पे यार के

    ऐ दर-ओ-दीवार बुलादो उन्हें पुकार के

    ©yusuf_meester

  • yusuf_meester 10w

    दिल , जिगर , इश्क़ , उलफत , जाम , ज़हर सब उड़ेल भी दूँ अपनी लफ़्ज़ों पे गर

    फिर भी मक्खियाँ ही भनभनाएँगी इनपे, चुसकियाँ लेने वाले तो नामुराद हो गए

    ©yusuf_meester

  • yusuf_meester 11w

    इब्तिदा-ए-इश्क़ की मदहोशियाँ क्या कहें
    दिल में होती है , किलकारियाँ क्या कहें

    नजरों में जबसे छू लिया है सुरत तेरी
    दिन रात करती है गुस्ताख़ियाँ क्या कहें

    मैं नहीं साथ किसी आवारा शाम के, पर
    ख़्वाब करने लगा , बदमाशियाँ क्या कहें

    सितारों ने तो पर्दे यूँ ही डाल रक्खे हैं
    हमने तो चाँद पे डाली डोरियाँ क्या कहें

    कोई ख़ता तो नहीं खुशबू-ए-गुल बनना
    गुलशन ने कर दी नादानियाँ क्या कहें

    वो अब भी नहीं क़ैद ज़ंजीर-ए-वफ़ा में
    करने लेने दो उन्हें मनमानियाँ क्या कहें

    "यूसुफ़" कुछ तो कमी रह गई मुहब्बत में
    हो गई होगी , गलतफ़हमियाँ क्या कहें

    ©यूसुफ़ मिस्टर

  • yusuf_meester 11w

    अभी तो सब्र का दामन लपेटा ही था इश्क़ पे हमने कि

    जनाब का मिज़ाज-ए-मौसम आशिक़ाना होने लगा !!

    ©yusuf_meester