Grid View
List View
Reposts
  • vishalprabtani 7w

    ना आना की राहों में बड़े पत्थर है ,
    इश्क़ का रास्ता लाज़मी नही इस शहर में ,

    है कई दरवाज़ें , है कई खिड़किया है मंदिर और मस्ज़िद भी ,
    हवा है दबाव में सच्चाई के और अफवाहों का बाजार है इस शहर में ,

    यहाँ बस्ती है शानों शौकत की , लोग भी बड़े मशरूफ़ है ,
    एहमियत आपकी जानी जाती है आपके लिबाज़ से इस शहर में ,

    एक दीवाना आया भी था रंग बिखेरने मोहब्बत के यहाँ,
    अँजाम कुछ यूं था कि दो ग़ज़ ज़मीन तो नसीब हुई पर फूलों से परहेज़ रही है इस शहर में

    ©vishalprabtani

  • vishalprabtani 8w

    शिकायतों की रिवायत रही नही ....
    ए-ज़िन्दगी इसीलिए तुझसे गिला नही ....
    मंज़िल ....मेरे दर से बड़ी दूर रही ......
    रोशनी जुगनू की है साथ , इसीलिए अँधेरो से गिला नही ।।।।।
    ©Vishal Prabtani

  • vishalprabtani 9w

    दुआ, करम, किस्मतें लाज़मी है .....

    लेकिन

    कौनसा कलमा पढ़ू के तेरी निगाह में मेरा अक्स उत्तर आए
    ©vishalprabtani

  • vishalprabtani 9w

    मैं हँस के ज़हर पी लेता गर बेबसी होती तेरी ,

    तेरी फ़ितरत में ही मुझे ठुकराना था ये बात बड़ी देर बाद पता चली .....
    ©vishalprabtani

  • vishalprabtani 97w

    एक जंगल बंजर ज़मीन का टुकड़ा बन गया ....

    कभी चिंगारी से पूछा था तेरी हैसियत क्या है ?????

    ©Vishal Prabtani

  • vishalprabtani 97w

    करू तौबा मगर .... लाज़मी तो ये भी नहीं ....

    मेरी बर्बादी में शामिल एक महज़ शराब तो नहीं....

    ©Vishal Prabtani

  • vishalprabtani 97w

    आज एक लाचार माँ के आँसू पूछ रहे है ....

    वो कौनसी किताब थी जिसमे लिखा था

    " बूढ़ा होने पे इंसान को लाचार छोड़ दो "


    ©Vishal Prabtani

  • vishalprabtani 97w

    जब भी कभी कुछ माँगने के लिए उस रब के सामने हाथ जोड़े ....

    मेरे लबों पे तेरे सिवा कोई और नाम ना था .....

    ©Vishal Prabtani

  • vishalprabtani 97w

    मैं अँधेरा रात का .....

    तू कतरा रोशनी का ....

    दो घड़ी का मिलन अपना ....

    एक ख़िलती सुभह का ... एक ढ़लती शाम का ...

    ©VISHAL PRABTANI

  • vishalprabtani 97w

    तेरी हर एक याद को मिटाने की कोशिष तो हर बार की मगर ....


    वो मेरा रूमाल जिसमे तेरी आँखो का काजल लगा था कभी ...

    आज भी सीने से लगा के सोया करता हूँ ......

    वो आइना जिसे देख के तुम अपने आपको सवारा करते थे ...

    आज भी उस आईने अक्स तुम्हारा ढूँढता रहता हूँ ....

    जिस मोड़ पे हम मिले थे कभी अंजान बन कर ....

    आज भी तुझसे मिलने की आस में उन गली से तुमसे मिलने की आस में गुज़रा करता हूँ .....

    ना ख्वाईश , ना आरज़ू , ना जुस्तजू , ना ही कोई उम्मीद फिर से मिलने की ये अनकहा वादा तो है .....
    फ़िर भी तेरी उम्मीद पे दुनियां भूलाए ... आज भी तेरे इंतेज़ार में बैठा हूँ ....


    ©Vishal Prabtani