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  • vipin_bahar 1d

    विधा-गजल(हिंदी)
    वज्न-2122,2122,212
    शीर्षक-चाँद का

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    चाँद का..

    क्या करोगी तुम झरोखा चाँद का ।
    मत करो तुम यूँ भरोसा चाँद का ।।

    आज छत पर चाँदनी ही चाँदनी ।
    आज तो हैं जान मौका चाँद का ।।

    बादलों में छुप रहा वो हर दफ़ा ।
    हैं बड़ा करतब अनोखा चाँद का ।।

    लाल चुनरी देखकर वो छिप गया ।
    यार समझों आप धोखा चाँद का ।।

    देर करता देर ही करता रहा..
    काश धर लेता मुखौटा चाँद का ।।

    विपिन"बहार"
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    ©vipin_bahar

  • vipin_bahar 3d

    @gunjit_jain
    आज हमारे प्रिय लाडले और मेरे प्राण प्रिय भाई गुंजित का जन्मदिवस है ऊपर-वाला आपको और ज्यादा कलम -फन से नवाजे मेरे भाई...सच कहूँ तो मेरे भाई जी मिराकी पर कुछ ही लोग है जिनको पढ़ने ..मै विशेष तौर पर आता हूँ..उनमे से एक आप भी हो,वैसे तो आप को हर विधा में महारत हासिल है..पर आपकी शिल्प-शैली और शब्दों के अनुशासन का मैं कायल हूँ...
    ऐसे ही लिखते रहो और हमें प्रोत्साहित करते रहो..
    एक दोहा भाई जी आपको उपहार स्वरुप भेट कर रहा हूँ������अभी यही है मेरे पास देने के लिए������������������

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    दोहा...

    लेखन का सुमिरन करें,लेखन का अभिराम ।
    लेखन का जब नाम हो,गुंजित का ही नाम ।।

    विपिन"बहार"
    ©
    ©vipin_bahar

  • vipin_bahar 3d

    विधा-गीत
    शीर्षक.मन का पपीहा
    वज्न-122,122,122,122

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    पपीहा...

    उड़ा मन पपीहा यहाँ से वहाँ हैं ।
    कहे बोल भाई सुकूँ ये कहाँ हैं ।।

    किसी को नही है ख़बर भावना की ।
    बली अब चढ़ी हैं सुनों साधना की ।।
    सभी पाप ढोये यहाँ घूमते हैं...
    चली होड़ कैसी अजब कामना की ।।

    नहा लों भले तुम कई बार गंगा...
    सभी पाप का फल मिलेगा यहाँ हैं।।
    उड़ा मन पपीहा यहाँ से वहाँ हैं..
    कहे बोल भाई सुकूँ ये कहाँ हैं..

    कही आँसुओ की नदी ये भरी हैं ।
    कही शाख अब टूटने से डरी हैं ।।
    मुझें तो अभागी लगी यार दुनियाँ..
    कही बेबसी हैं,कही भुखमरी हैं ।।

    सभी एक धुन में चलें जा रहें हैं..
    यहाँ भाव सबके जहाँ से तहाँ हैं ।।
    उड़ा मन पपीहा यहाँ से वहाँ हैं..
    कहे बोल भाई सुकूँ ये कहाँ हैं.

    सही बात पर यूँ भटकता दिखा हैं ।
    बिना बात के वो उछलता दिखा हैं ।।
    वही चंद लकड़ी..वही चंद कपड़े ..
    कफ़न आदमी पर सिमटता दिखा हैं ।।

    कभी मौत का तन पहाड़ा पढेगा..
    करो मोल उसका रहो तुम जहाँ हैं ।।
    उड़ा मन पपीहा यहाँ से वहाँ हैं..
    कहे बोल भाई सुकूँ ये कहाँ हैं..

    विपिन"बहार"
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    ©vipin_bahar

  • vipin_bahar 5d

    विधा-गजल(हिंदी)
    शीर्षक-धोखा
    वज्न-2122,2122,2122,212

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    धोखा..

    जिंदगी में वो करूँ तुमसे नही इंकार हों ।
    मौत का सजदा करूँ फिर मौत से इजहार हों ।।

    चोट खाकर अब हमें ये तो भरोसा हो गया ।
    प्यार जिससे कर रहे हो प्यार के हक़दार हों ।।

    तोड़ देती हर तरफ से ये किताबी आशिकी ।
    आदमी यूँ प्यार में ऐसे नही बीमार हों ।।

    कर रहे हैं हम ख़ुदा से बस यही अब आरजू ।
    अब हमारा एक डेरा चाँद के ही पार हों ।।

    हम तड़प कर ना मरे कुछ तो करो मेरे खुदा ।
    मौत के सर पर कभी ना आँसुओ का भार हों ।।

    आशिक़ी ने यार हमकों यूँ मिलाया मौत से ।
    एक शायर फिर कभी ऐसे नही लाचार हों ।।

    विपिन"बहार"
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    ©vipin_bahar

  • vipin_bahar 5d

    विधा-तोटक छंद
    वर्ण-12
    4×सगण(4×llS)

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    छंद..

    बन डोर रहा चित चोर रहा ।
    हमरे मन का वह मोर रहा ।।
    कजरी अखियाँ करती बतियाँ ।
    प्रिय साजन याद कटी रतियाँ ।।

    तन झूमत है मन घूमत हैं।
    दहके-बहके दर चूमत हैं ।।
    कथनी-करनी सब वार गई ।
    जब देख उसे उर हार गई ।।

    दमके गजरा बनके सहरा ।
    हिय कुंडल रूप करे पहरा ।।
    चुपके-चुपके प्रिय घात करे ।
    मिलते-जुलते वह रात करे ।।

    विपिन"बहार"
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    ©vipin_bahar

  • vipin_bahar 1w

    विधा-गीत
    शीर्षक-घाट-पर(श्मशान घाट)
    वज्न-2122,2122,212

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    घाट-पर

    आग की तो आतिशे थी घाट-पर ।
    यूँ दफ़न सब ख्वाहिशें थी घाट-पर ।।

    सोचकर भावुक हमारा रग हुआ ।
    कौन है जो जिंदगी का ठग हुआ ।।
    चल रहे सब रेल की रफ़्तार में...
    मोह-माया क्षोभ-काया जग हुआ ।।

    अंत होती दिख रही थी लालसा...
    जल रही सब साजिशें थी घाट-पर ।।
    आग की तो आतिशे थी घाट-पर..
    यूँ दफ़न सब ख्वाहिशें थी घाट-पर..

    नैन की ये पुतलियाँ अब थक गई ।
    बेरहम ये जिंदगी अब पक गई ।।
    राख होने को बदन तैयार है..
    लकड़ियों में आरजू अब ढक गई ।।

    कौन अपना है पराया क्या पता...
    दूर सारी बंदिशे थी घाट-पर ।।
    आग की तो आतिशे थी घाट- पर ...
    यूँ दफ़न सब ख्वाहिशें थी घाट-पर...

    दर्द को अपने समेटें मैं चला ।
    छोड़कर सब यार भेटें मैं चला ।।
    मोल मेरा तुम लगा लो अब यहाँ ...
    पाप की गठरी लपेटें मैं चला ।।

    कर भला तो हो भला की तर्ज़ पर...
    छोड़ दी जो रंजिशें थी घाट पर ।।
    आग की तो आतिशे थी घाट पर ...
    यूँ दफ़न सब ख्वाहिशें थी घाट पर...

    विपिन"बहार"
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    ©vipin_bahar

  • vipin_bahar 1w

    विधा-गजल(हिंदी)
    शीर्षक-लोग तो
    वज्न-2122,2122,2122,212

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    लोग तो...

    दूसरों की खिड़कियों में झाँकते हैं लोग तो ।
    बात कुछ भी है नही पर आँकते हैं लोग तो ।।

    कौन क्या है कौन लेगा अब ख़बर बोलो जरा ।
    काम अपना हर किसी से साधते हैं लोग तो ।।

    वश चले तो आग फैला चल चलेंगें तान कर ।
    गम किसी का अब कहाँ पर बाँटते हैं लोग तो ।।

    यार गलती यूँ बताकर आतिशे क्यों मोल ली ।
    अब कहाँ यूँ गलतियाँ भी मानते हैं लोग तो ।।

    कौन देगा अब किसी का साथ बोलो राह में ।
    दूसरों को यूँ गिराना चाहते हैं लोग तो ।।

    आज तक ना लिख सके हम यार मेरे शायरी ।
    शायरी का तोप हमकों जानते हैं लोग तो ।।

    विपिन"बहार"
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    ©vipin_bahar

  • vipin_bahar 1w

    शीर्षक-ठीक होगा
    विधा-गीत
    वज्न-2122,2122,2122

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    ठीक होगा...

    मन अभी तन से जुदा है...ठीक होगा ।
    कह रहे हो सब खुदा है..ठीक होगा ।

    यूँ तुम्हे ठगती तुम्हारी सादगी है ।
    बात बोलो कौन सी ये आज की है ।।
    कौन ऐसा है तुम्हें जो सच बताए ..
    कागजी है लोग सारे कागजी है ।।

    बैठ कर बोले कही तुम मन्दिरों में ..
    कर रहे है हम दुआ है..ठीक होगा ।।
    मन अभी तन से जुदा है..ठीक होगा..
    कह रहे हो सब खुदा है..ठीक होगा..

    इस गरीबी को कहाँ अपना कहा है ।
    तू अमीरी धार में अपना बहा है ।।
    अब भला किससे रहम की आस होगी ।
    आदमी जब आदमी ही ना रहा है ।।

    यार रोटी की तड़प है और क्या है..
    कौन सा माँगे सुधा है..ठीक होगा ।।
    मन अभी तन से जुदा है..ठीक होगा ..
    कह रहे हो सब खुदा है...ठीक होगा..

    आदमी को मार डाले काश है जी ।
    कर रहा वो दूसरों से आस है जी ।।
    काटते है सर यहाँ खुद आपसी ही..
    आदमी ही आदमी का नाश है जी ।।

    मानते है हम चलो जब कह रहे तुम..
    आदमी खुद पर फिदा है..ठीक होगा ।।
    मन अभी तन से जुदा है..ठीक होगा ...
    कह रहे हो सब खुदा है..ठीक होगा..

    विपिन"बहार"
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    ©vipin_bahar

  • vipin_bahar 1w

    शीर्षक-मान जा
    विधा-गजल(हिंदी)
    वज्न-2122,2122,212

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    मान जा...

    यार मेरी अर्जियाँ...तू मान जा ।
    हो गई है गलतियाँ...तू मान जा ।।

    दोष खुद पर इस कदर भारी हुआ ।
    रात-भर है सिसकियाँ...तू मान जा ।।

    प्यार का यूँ मौत से नाता रहा ।
    उठ गई है अर्थियां...तू मान जा ।।

    हर कदम पर साथ तेरे चल रहा ।
    याद कर सब नेकियाँ.. तू मान जा ।।

    जान मेरी बात सुनकर देख लो ।
    की बहुत अब मर्जियाँ...तू मान जा ।।

    इस तबाही में सनम सब राख है ।
    हर तरफ है आँधिया...तू मान जा ।।

    विपिन"बहार"
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    ©vipin_bahar

  • vipin_bahar 1w

    विधा-गजल(हिंदी)
    वज्न-2122,2122,212

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    #गजल

    गजल
    *******
    जिंदगी तो अब उधारी हो गई ।
    आँसुओ पर याद भारी हो गई ।।

    रोज मिलने आ रही यूँ जा रही ।
    मौत से तो यार यारी हो गई ।।

    आँसुओ के बोझ से बोझिल रहा ।
    चाहतों की जब सवारी हो गई ।।

    खेल है ये खेल-खेले खेल कर ।
    जिंदगी तो अब मदारी हो गई ।।

    आँख खुलने को नहीं अब कह रहे ।
    नींद की कैसी खुमारी हो गई ।।

    दिल लगी बातें गजल में लिख दिया ।
    शायरों में क्यों शुमारी हो गई ।।

    विपिन"बहार"
    ©
    ©vipin_bahar