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Reposts
  • vandna 30w

    ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं
    और जुर्म क्या है ये पता ही नहीं
    इतने हिस्सों में बट गया हूँ मैं
    मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं
    कृष्ण बिहारी नूर

  • vandna 31w

    कहीं कहीं यूँ भी होता है--

    मायका जली रोटियाँ खाकर भी जिस बेटी को तारीफों से नवाज़ता है
    ससुराल सब कुछ हर कर उसका जिस्म नीलों से सजाता है
    वंदना

  • vandna 32w

    जब माँ नहीं देख पाती बच्चों को भूख में बिलखते
    तो वो बेच आती है अपना जिस्म
    जब पिता नहीं कर पाते बच्चों की मौलिक आवश्यकता पूरी
    तो वो पिसते हैं किसी रईस के पैरों की जूती तले
    माता पिता सेमल के फूल हैं
    सुंदर हैं पर सुगन्धविहीन।
    वंदना
    ©vandna

  • vandna 32w

    उसकी यादों ने समेट रखा है मुझे
    जिसकी राख ने बिखेर दिया था मुझे
    वंदना
    ©vandna

  • vandna 33w

    ये ज़िन्दगी भी, अजब बवंडर है
    दो गज़ की कश्ती ,मीलों समुन्दर है
    तेरे जाने से, कुछ बदला तो नहीं
    साँस खारी हो जाती है, बस कभी कभी
    आंखे झपकती हैं, रोज़ जैसे ही
    मौन रहती हैं ,शब्दों की डायरी अब
    यूँ ही.....
    तेरे जाने से,कुछ बदला है क्या?
    वंदना

  • vandna 33w

    सन2021 के अप्रैल और मई इतिहास में दागदार दर्ज किये जायेंगे। बेगुनाहों की मौतें और रूहों पर लगे ज़ख्म कैद रहेंगे इनमें।
    वंदना

  • vandna 35w

    उम्रे दराज़ से माँग के लाये थे चार दिन
    एक पढ़ाई में
    दूसरा आजीविका कमाने में
    और तीसरा व चौथा लगता है
    कम्म्बख्त करोना से निबटने में गुज़र जायेंगे.....

    ©vandna

  • vandna 35w

    प्यार पहली बारिश की पहली बूंद है जिसमे मन या तन नहीं बस आत्मा भीगती है।इसे समेट लेना खुद में। अगर धूप में छोड़ा तो ये बूंद वाष्प बन उड़ जाएगी और छोड़ जाएगी एक अमिट दाग।
    फिर बार बार बारिश में रहेगी प्रतीक्षा उस बूंद की जिसने कभी द्वार खटखटाकर अनुमति मांगी थी भीतर आने की।
    मिट्टी का शरीर ये रेगिस्तान बन जाता है कुछ वर्षों में,उस नन्ही बूंद के बिन,और हवा के साथ उड़ते रहते हैं उसके सूखे कण।
    कभी कभी वो बूंद बवंडर बन उड़ा देती है पर्वतों के वजूद तो कभी भँवर में प्यासा मन मृगतरिशनयी हो जाता है।
    मन के बिस्तर को उस नन्ही बूंद से गीला रखना,नहीं तो जीवन नदी मर जाएगी प्यासी मौत और अस्तित्व रह जायेगा बस बनकर एक खारा समंदर और एक मीठी बूंद को रह जाएंगे किनारे तलाशते।
    वंदना

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    प्यार

  • vandna 35w

    आजकल सांसे तो चल रही हैं,पर देह का अस्तित्व क्या है ये भी समझ आ रहा है।
    लोगों का असमय मरना, बच्चों का अनाथ होना,हर तरफ हाहाकार है।
    ऐसे समय में माँ की गोद,माँ की लोरियाँ बहुत याद आती हैं। प्रार्थना में हाथ उठते है माँ की सुरीली आवाज फिर से सुनने को।
    एक बहुत ही सुंदर लोरी सुनी थी,आप सब भी समय निकालकर ज़रूर सुने।

    "माँ सुनाओ मुझे वो कहानी
    जिसमें राजा ना हो ना हो रानी

    जो हमारी तुम्हारी कथा हो
    जो सभी के ह्रदय की व्यथा हो
    गंध जिसमें भरी हो धरा की
    बात जिसमें ना हो अप्सरा की
    हो ना परियाँ जहाँ आसमानी

    वो कहानी जो हँसना सिखा दे
    पेट की भूख को जो भुला दे
    जिसमें सच की भरी चाँदनी हो
    जिसमें उम्मीद की रोशनी हो
    जिसमें ना हो कहानी पुरानी
    नन्दलाल पाठक जी द्वारा रचित"

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    माँ

  • vandna 35w

    "Love is stronger than differences. We all live on the same planet. We walk on the same earth. We breathe the same air. No matter where I was born, no matter what color skin I have or what religion I was raised to believe in, everything and everyone is connected to this one life. I no longer choose to prejudge others, to feel either superior or inferior. I choose equality -- to have warm, loving, open communication with every member of my earthly family. I am a member of the earth community. Differences of opinion are wonderful, colorful varieties of expression.