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दाग़-ए-दामन भी आबाद हो जाते है मसलन उम्र नाकाफ़ी होती है जीने को और वह क़ब्र की राह हो जाते है

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  • trickypost 15w

    एक मुलाक़ात (part:08)

    दृश्य बदलाता है।

    नन्हे से पैरों में पायल और उसपर लगे घुँघरू झूम रहे है।
    कभी घुँघरू की आवाज़ थोड़ी धीमी हो जाती पर उस आवाज़ के साथ एक प्यारी से मुस्कान ओढ़े नन्ही परी अपने हाथों से अपनी आवाज़ को मध्यम करने की नाकाम कोशिश करती और उसके पीछे २ औरतें। एक ने उसकी बाहों को आख़िरकार पकड़ा और बोली बड़े शैतान हो गए हो आप, अभी इतना इतराने लगी हो, हाथ में भी नहीं आती अल्लाह जाने बड़ी होकर हमें कितना भगाओगी। दूसरी ने झट से कहा शबनम धीरे बोलो और फिर दोनो ही बस उस नन्ही परी को सीढ़ियों से ऊपर ले जाने लगी, सामने से एक बूढ़ी औरत बड़बड़ाते हुए चली आ रही थी। उसके पाँव में कढ़े जैसा कुछ था जो दिखने में चाँदी का लग रहा था और उसी तरह के कढ़े हाथों में भी ढेर सारे थे। हाथों पर बुढ़ापे की परछाइयाँ थी पर चेहरा मानो हुस्न की रानी, जो शरीर से बूढ़ी हो गयी हो पर उसके बीते कल की ख़ूबसूरती अभी भी बरकरार हो वह साफ़ नज़र आ रही थी। आँखों में ढेरों सूरमा और दोनो ही पलकों के आख़िरी छोर पर काला टिका जो सजावट कम संस्कृति की छाप ज़्यादा नज़र आ रही थी। उसके शरीर से इत्र की ख़ुशबू ने तो आसपास की फ़िज़ा को रंगीन ही बना दिया था, वह अचानक रुकी और दोनो लड़कियों की तरफ़ देखते हुए बोली।

    मेरे रास्ते में आने की जुर्रत कैसे की?

    उसकी आवाज़,
    उसकी आवाज़ में जो तल्ख़ी थी, जो मर्दाना कड़क थी, एक झटके में महल की दीवारों से टकराते हुए गूंजने लगी। लगा ऐसा की मानो किसी ने जंग का एलान कर दिया हो। दोनो लड़कियाँ घबराते हुए बोली माफ़ी, माफ़ी हम तो नूर को उसकी माँ के पास ले जा …

    इतना ही कहा था की उस बूढ़ी औरत ने जो अपनी ज़बा से घर की बुजुर्ग नज़र आ रही थी उसके कहा… काफिरों से इतना प्यार तो एक ग़द्दार ही कर सकता है। एक लड़की ने मुँह खोला कुछ कहने को तो उसके हलक की बात काटते हुए वह बोली… एक लफ़्ज़ कहा तो जहन्नुम भेज देंगे। फिर ग़ुलाम बनकर मर्दों के बिस्तर सजाते रहना। उन दोनो लड़कियों की नज़रें झुकी और वह नूर (छोटी लड़की) को उठाकर नीचे की तरफ़ भागी ही थी उस बूढ़ी औरत ने कमरबंध से लटकी हुयी थैली से पिस्टल निकाली और गोली चला दी।

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  • trickypost 16w

    एक मुलाक़ात (part: 07)

    वही लोग खड़े मुस्कुरा रहे थे जिन्होंने कुछ समय पहले हमला किया था। सायमा ने ग्रेनाइट फ़ेकने भर की कोशिश ही की थी की वज्रभान मुस्कुराया और बोला अच्छा अब आपमें इतनी हिम्मत आ गयी की हमें जवाब दोगी।

    सायमा: बारूद के ढेर पर खड़े होकर नसीहत दे रहे हो।

    वज्रभान: अब क्या करे, मेरी राह ही ऐसी है

    सायमा: साँसे गिन कहीं गलती हो गयी तो जो नसीब में है वह भी छिन जाएगा।

    वज्रभान: मेरा वक़्त इतना जल्दी तो नहीं आ सकता तो मुझे नहीं तुझे फ़िक्र करनी चाहिए।

    सायमा: बड़ा शायराना अन्दाज़ है, वार भी करते हो, बातें भी अदब से करते हो, बस समझ नहीं आ रहा की दुश्मनी कैसी है?

    वज्रभान: ठहाके लगाते हुए, एक लंबी साँस ली और गाड़ी की बोनट पर जा ऐसे बैठा मानो की वह शैर-सपाटे के लिए निकला हो। अपने एक पैर को दूसरे पर टिकाते हुए उसने दाहिनी जेब से एक बीड़ी का पैकट निकला और बीड़ी सुलगाते हुए बोला!

    देखिए बात यूँ है ना की है जो वो तो है पर जो है वह क्या है यह किसी को क्या पता और जो पता है वह है भी की नहीं यह कैसे करे पता। हमें तुम समझ नहीं आ रहे ना बॉस तो तुम्हें क्या समझाए की क्या दुश्मनी है और हाँ “आदमखोर का कोई इलाक़ा नहीं होता क्यूँकि वह जहाँ जाते है रेत को भी राख बना देते है।”

    वो देखो असली आदमखोर अपना जकिरा लिए आ रहा है। अपने काल को समय देने के लिए आपको दिल से आभार नफ़िज़ा। उसने बात ख़त्म ही की और सायमा के साथी हरकत करते उससे पहले हावाओं को रौंदती ६mm की bullet एक के बाद एक के सिने को चीरती हुयी ज़मीन पर जा बैठी। ऐसा लगा मानो की काम अब ख़त्म हुआ और जीत का सेहरा भी अब दुश्मन के माथे सज गया।

    सायमा के आँखों में तल्ख़ी कुछ यूँ छाई जैसे चाँद नभ को अपनी रोशनी से भर सूरज के निशा को मिटाता हुआ सबको अपना बाधक बना देता है। उसने झुककर ग्रेनाइट को हवा में वज्रभान की तरफ़ उछाल दिया। वज्रभान खुद को सम्भालते हुए बोनट से उतरकर गाड़ी से दूर भागा और यहाँ ग्रेनाइट जो हवा में बाहें फैलाए तितलियों की तरह उड़ता हुआ जा रहा है उसने दिशा बदली। सायमा की गर्दन पर गोली लगने के कारण ग्रेनाइट फेंकते वक़्त उसकी दिशा बोनट की जगह कही और हो गई थी और समय के चक्रव्यूह ने वह बोनट मानो वज्रभान के हिस्से ही लिख दिया था।

    एक ज़ोर का धमाका और सबकी आँखें चौधियाँ गयी, कमजोरी की वजह से सायमा कब ज़मीन पर लुढ़की उसे ख़बर ही नहीं, धुए के बीच एक आवाज़ आयी।

    “ एक मुलाक़ात को सूखे नैना तरस गए थे
    “ उलझने थी कमबख़्त दिल में जाने कितनी
    “ हम तो अपने ही दिल से जमीं पर उतर गए थे
    “ जाने यह फ़ासले किस मुँडेर पर है जा थमें
    “ साँसो को ख़लिश है ख़्वाहिशों के दामन छूटे
    “ गिरफ़्त में आकर भी उनके हम उनके अब कहां
    “ ख़्वाब बेच दोनो ही मौत के सौदागर जो है बने।।

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  • trickypost 16w

    एक मुलाक़ात (part ५)

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    गोली सीधे सायमा के गले से सटकर गुजरी और रक्तधार की डोरियाँ कुछ यूँ बिखरने लगी मानो मुट्ठी से रेत फिसलकर ज़मीन पर चादर बन गयी हो। वज्रभान ने ज़ोर से चिल्लाते हुए कहा लड़की को cover करो, उसे कमरे में ले जाओ। ऐसा कहते हुए उसने गोलियाँ दागनी शुरू कर दी, दो महिला पोलिसकर्मी ने अपने आप को संभला और सायमा या नफ़िज़ा जो समझ लो आप, उसकी कलाई को पड़कर घसीटते अंदर ले गयी और दरवाज़ा बंद कर दिया। यहाँ बाहर अभी भी दोनो तरफ़ से गोलियों का रह-रहकर गूँज रही थी। एक-आध गोली कमरे के यहाँ से और खिड़की के यहाँ से भी आयी। तक़रीबन १ घंटे बाद माहौल कुछ शांत हुआ, जो गोलियाँ चला रहे थे उनमें से १ ढेर हो गया और बाक़ी सब उसके साथी वहाँ से भागने में कामयाब हो गए थे। वज्रभान ने इशारे से अपने सहकर्मियों को जगह का आकलन करने को कहा और सब धीरे -धीरे अपने आस-पास की स्तिथि को देखकर वज्रभान की तरफ़ आने लगे। जब सभी को तसल्ली हो गयी की शायद अब कोई नही है तो उन्होंने दरवाज़ा खटखटाया लेकिन कोई जवाब नहीं आया। एक ने कहा की सर no response, वज्रभान ने माथा पोछते हुए कहा “साला दिन ही ख़राब है” और ज़ोर से बोला “दरवाज़ा खोलो”, कोई जवाब नहीं। वज्रभान को अंदेशा हुआ शायद कुछ तो गड़बड़ है, उन्होंने अपने सहकर्मी को कहा के ईमारत के पीछे से या खिड़की से देखो कुछ नज़र आ रहा है और हाँ जाने का अंदर कोई दूसरी जगह है क्या, उनके इतना कहते ही ४ सहकर्मी अपनी बंदूक़ ताने आदेश का पालन करने चल पड़े। वज्रभान ने दरवाज़े को धक्का दिया देखने के लिए की क्या इसे तोड़ा जा सकता है। फिर उसने यहाँ- वहाँ नज़र घुमाई और एक सहकर्मी के कंधे पर हाथ रखकर बोला “साला सिन समझ नहीं आ रहा रावत”,
    रावत: मैं समझा नहीं सर
    वज्रभान: अबे साले, अपने को बॉस से बोला ७-८ को साथ ले जाओ, सिविल में एक लड़की को उठाकर गोदाम में ले आना है। आपण लोग ने मस्त पोलिसवाला getup लिया और उसको उठाने आ गए। पर साला हमपर कोई गोली चलाने कौन आया था, चोर-चोर तो मौसेरे भाई होते है ना और पोलिस होती तो अबतक तो अपनी फट गयी होती, यह हुआ क्या समझ नहीं आ रहा।
    रावत: हो साहेब, सही बोल रहे हो, मेरी मानो तो अब आपण यहाँ से जल्दी निकलते है, कही कोलोनिवालों ने फ़ोन किया हो पोलिस में तो अपनी लग जाएगी।
    वज्रभान: अबे, कम पगारवाले, हम ही पोलिस है, हमको कोई काहे call करेगा, झंडू और फिर वज्रभान हसने लगा। तभी दरवाज़ा किसी ने अंदर से खोला।

    वज्रभान: बोल बुरी खबर क्या है चंदू चिलगूजे
    चंदू: उसबे अपनी नाक टेढ़ी की और बोला ज़्यादा ना बोल, ये सोच हाथ में लिया काम निकल गया। पैसे अब मिलने से रहे और गाली तो पूरे बक्से भर-भर के मिलेगी, तू ही खाना। बड़ा पोलिसवाला idea लेकर आया था और अपना ही game कोई बजा गया।
    वज्रभान: क्या - क्या बोल रहा है, हकलाते हुए. वो लड़की ग़ायब हो गयी क्या?
    चंदू: अबे अपनी आज पूरी लगनेवाली है, लड़की नहीं माँ भी उसके साथ ग़ायब है और बोले तो तेरे style में “साला समझ नहीं आ रहा की यह नफ़िज़ाऔर सायमा का क्या चक्कर है। आपण लोग अब रफुच्चकर होते है नहीं तो हवा हवाई करनेवाले मामू आ ही जाएँगे।

    वज्रभान ने हालात को समझते हुए भागने का ईशारा किया तो एक ने कहा की ये item जो अंदर मस्त पड़ी है उनका क्या? वज्रभान ने कहा अपने पैसे बच गए, चल जल्दी निकल और सब भागकर गाड़ी शुरू किए और मोहल्ले से निकलकर पक्की सड़क पर पहुँचे ही थे की सामने नफ़िज़ा या सायमा जो भी थी उसने अपने हाथ में ग्रेनाइट लिया था और ५-६ गाड़ियों में वही लोग खड़े मुस्कुरा रहे थे जिन्होंने कुछ समय पहले हमला किया था।

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  • trickypost 19w

    एक मुलाक़ात (Part:04)

    एक दिन...

    भोर ही हुयी थी, आसमान में परिंदों ने बस उड़ना ही शुरू किया था। अभी भी घरों के किवाड़ आधे खुले और बंद ही थे, कुछ लोग आँखों को मिसते उठे ही थे की... जैसे उनके हलक में प्यास सुख गयी, मानो हाथों में लिया पानी आँखों को शीतलता देने से पहले ही अंतिम यात्रा करने को मजबूर हो गया हो। खिड़कियों से नीचे ही सबकी आँखें टिकी हुयी थी और वहाँ ढेर सारी वैन से सफ़ेद कपड़ों में बन्दूकों को थामे कुछ लोग बाहर आकर कुछ यूँ सायमा के घर को घेरना शुरू किया की मानो किसी बड़े अपराधी को दबोचने के लिए सारे विभाग की मंडली को आज ही समय मिल गया हो। एक ने दरवाज़े की बाई तरफ़ की खिड़की से सटे दिवार पर अपनी कोहनी को एक तरफ़ टिकाया और बंदूक़ को खिड़की की तरफ़ तानकर खड़ा हो गया। कुछ लोग या फिर कहो सिपाही जिनके पजामे ख़ाकी रंग के थे वह सब उस ईमारत के पीछे की और दौड़े, कुछ वहीं आसपास किसी किसी ना किसी वस्तु या दिवार के पीछे छुपकर यूँ अपना निशाना साधे छुप गए ताकि किसी भी प्रकार की अगर कोई घटना होती है तो वह दूसरे साथियों की मदद के लिए जल्दी वहाँ पहुँच सके। लगभग उस भोर चारों तरफ़ किसी फ़िल्म का नजारा लग रहा था।

    एक नौजवान आदमी जो काफ़ी लम्बा और चौड़ा था वह कुछ देर बाद आया, उसके साथ ५-६ महिला पुलिस भी थी। सरकारी वैन से उतरकर उसने कुछ अपने साथियों से बातें की, शायद वह हालात का जायज़ा ले रहा था। फिर वह सायमा के दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा और उसके पीछे ३ महिला पुलिस यहाँ- वहाँ नज़र फेरते उसके पीछे हो चली। उस नौजवान आदमी जो कि उच्च दर्जे का अधिकारी लग रहा था उसने डोर बेल बजाई तो अंदर से आवाज़ आयी! कौन है?
    अधिकारी ने कहाँ वज्रभान शेखावत।
    अंदर से फिर आवाज़ आयी आपको किससे मिलना है? अधिकारी ने कहाँ “मैं नफ़िज़ा का सहकर्मी हूँ”, उन्हें ऑफ़िस के कुछ काग़ज़ाद देने आया था।

    यहाँ घर के अंदर सायमा गहरी नींद में ख़्यालों के रेशे बुनकर मुस्कुराए जा रही था। रसिदा ने सोचा की सायमा से पूछूँ की वह किसी नफ़िज़ा को जानती है क्या! फिर उसे ख़्याल आया की वह तो बाहर किसी से मिलती ही नहीं तो भला उसे क्या पता होगा। फिर रसिदा बेग़म ने सोचा छोड़ो जाकर देखूँ तो भला कौन है। दरवाज़े के ऊपर की चिटकनी नीचे खिसकी और फिर बीच की चिटकनी को सरकाते हुए रसिदा बेग़म ने दरवाज़ा खोलकर कुछ कहना ही चाहा था की वज्रभान ने सर पर बंदूक़ तान दी और उसके पीछे खड़ी महिला पुलिस ने एक तमाचा जड़ दिया। रसिदा संभले उससे पहले उसे लगा यह झटका उसे मूर्छित बना गया, वह फ़र्श जा गिरी। जिस महिला पुलिस ने थप्पड़ जड़ा था उसने नब्ज टटोली और धीरे से कहाँ ज़िंदा है। तभी वज्रभान एक ईशारा किया और ४-५ सिपाही दौड़े चले आए घर में, यहाँ- वहाँ नज़र फेरने के बाद उसे सायमा एक कमरे में मिली तो उसे महिला पुलिस ने उठाया। सायमा की आँखों को यह नए चेहरे इतने डरावने लगे की वह रोने लगी, उससे कुछ कहाँ ही ना गया। महिला पुलिस ने उसके बाल पकड़े और घसीटते हुए उसे बाहर खिंचते ले गयी। सायमा चिल्लाने लगी, बचाओ-बचाओ प्लीज़ अल्लाह के वास्ते कोई तो हमारी मदद करे। वह गुहार ही लगा रही थी की एक ईमारत के पीछे से ख़ाकी पजामा पहने लोग आए और धड़ाधड गोलियाँ चलाने लगे। हड़बड़ी में कुछ वैन के पीछे तो कुछ तीतर बितर हो कर किसी ठोस समान की आड़ ले ही रहे थे की गोली सीधे सायमा के गले से सटकर गुजरी और….

    To be continued…

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  • trickypost 20w

    एक मुलाक़ात (part:03)

    रसिदा बेगम को अपनी पोती के चेहरे की लालिमा देख रहा ना गया तो उसने पूछा ही लिया, क्या लिखा है?सायमा ने अपनी दोनो बाँहें खोलकर कुछ यूँ रसिदा बेग़म को क़ैद किया की चर्रर की आवाज़ आयी और रसिदा ने झट से कहा...
    “जवानी कब की फ़ानुश हो गयी है ग़ालिब,
    हमें यूँ लहूँ का जौहर अब ना दिखाइए।”
    और दोनो ढहाके मारकर हसने लगे!

    सायमा ने कहा मुझे इसी शहर में एक नौकरी मिल गयी है। हरिहर थोड़ा बड़बोला ज़रूर है पर उसने मदद भेज ही दी,अब हमारा गुज़ारा.... आगे वह कुछ कहती इससे पहले रसिदा बेग़म ने टोका उसे। तुम-तुम नौकरी, नहीं नहीं, तुम नौकरी नहीं करोगी। पढ़ाई करोगी, मैं इंतेज़ाम करूँगी।मैं -मैं हकलाते हुए उसने कहा! मैं-मैं मेरे जिगर के टुकड़े को इस ज़माने के भरोसे नहीं छोड़ सकती। जाने कब क्या हो जाए, मैंने सबकूछ खो दिया है और अब बस तुम्हीं हो। वह आगे कुछ कहती की सायमा ने बात काटते हुए कहा आज नहीं तो कल नौकरी तो करनी ही होगी, शुरुआत अभी से करूँगी तभी तो कल खुद के पैरो पर खड़ी हो पाऊँगी। रसिदा बेग़म ने कुछ कहने के लिए अपने लबों पर ज़ोर हो दिया था की सायमा ने उनके होंठों पर अपनी उँगलियाँ रख दी, रसिदा बेग़म ईशारा समझ गयी पर उसकी बेचैनी ने उसके हाथों में मानो जान भर दी थी। सायमा थाली के बर्तन लेकर रसोई की तरफ़ चली गयी और कुछ डर बाद काम ख़त्म करके आयी। रसिदा को अपनी बाहों में भरते हुए कहा नानी, तू फ़िक्र ना कर देखना तेरा ये बेटा ना सब ठीक कर देगा। कोई ख़लिश अब ज़ेहन में नहीं रहेगी, हमारी सारी ख़्वाहिशों को मक़ाम मिलेगा, इंसाअल्लाह। रसिदा कुछ ना कह पायी।

    रात बीती सवेरा हुआ, सुबह वैसी ही थी जैसे आम हुआ करती है बस एक ख़ामोशी दीवारों पर जा थमी थी, वैसी ही जैसे अमूमन जनाज़ा निकलने के बाद घरों में होती है। सायमा ने बक्से से कुछ कपड़े निकाले, उसमें से एक हरे रंग की सलवार क़मीज़ का चुनाव किया, स्नान करने के बाद उसे पहनकर वह रसोई में गयी। खाना बना हुआ था तो उसने नानी के साथ खाना खाया, नानी से उसकी कुछ थोड़ी बहुत बात हुए, जैसे.. कहाँ जाना है? कैसे जाओगे? कबतक घर आ जाओगे? सायमा ने जवाब उतना ही दिया जितना उसे अंदाज़ा था बाक़ी उसने देख लूँगी कहकर टाल दिया। भोजन करने का बाद वह घर से निकली, चौराहे से उसे अपनी मंज़िल के लिए जुगाड़ (tempo) मिल गयी। सायमा के अंदाज़े से वह जगह बड़ी दूर निकली और एक्का-दुक्का ही सवारियाँ वहाँ आती-जाती है यह उसे पहले दिन ही उसके साथ काम करनेवालो से पता चला, पर उसने ज़्यादा ना सोचा। उसे तो बस इस बात की ख़ुशी थी की नौकरी मिल गयी है और तनख़्वाह भी अच्छी है तो सफ़र का तकल्लुफ़ कोई मायने नहीं रखता।

    गुज़रते वक़्त के साथ हालतों में सुधार होने लगा। रसिदा बेग़म को इतनी जल्दी हालातों के ठीक होने की उम्मीद ना थी। सब ठीक था बस एक बात उसे खाए जा रही थी, सायमा से कई मर्तबा पूछने के बाद भी उसने कभी अपनी नौकरी के बारे में सही से जवाब ना दिया था और एक दिन....

    To be continued...

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  • trickypost 20w

    एक मुलाक़ात (part:02)

    दरवाज़ा खोलों हरामख़ोरों... आवाज़ की गुंजे धीरे-धीरे इतनी तीव्र हो गयी की रसिदा के दिल की धड़कनो का शोर मानो उसके सिने में ही कही दब गया हो। डर के मारे उसके हाथों में कंपकंपी की एक लहर दौड़ी जैसे तूफ़ान के आते ही पोखरों के पानी उबाल मारने लगते है। रसिदा ने चाहा की वह इस शोर को ना सुने, उसने भरसक कोशिश की आपने कानो के किवाड़ को बंद करने की लेकिन शोर कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था। अचानक दरवाज़े पर खटखटाने की आवाज़ आयी, रसिदा के हाथ पाव फूल गए और घबराहट में वह पैरों पर झट से खड़ी हुईं तो सायमा का सर धड़ाम से फ़र्श पर आ लड़ा पर सायमा की आँख ना खुली। उस समय उसका शरीर उसे अनंत की शैर करा रहा था। मानो, जहाँ चारों तरफ़ चिनार और मख़मलि झील पर सरसराती पतवार सी नाव और उसपर आसमाँ से बहती प्रेम की वीणा के दृश्य हो। उसे तनिक भी एहसास ना हुआ था। लेकिन यहाँ रसिदा की मानो तो जान हलक में आ गयी थी। पसीने ने उसके माथे पर मानो जरी का काम किया हो, एक बूँदे दूसरे से इस तरह तालमेल जोड़े थे की मानो कश्मीरी गलीचे पर किसी ने अपनी बेहतरीन कलाकारी दिखाई हो।

    फिर दरवाज़े के खटखटाने की आवाज़ आयी, क्या यह सायमा का घर है क्या?
    पोस्टमैन... दरवाज़ा खोलिए। यह सुनते ही रसिदा थोड़ी संभली और दरवाज़े की ऊपर की चिटकनी को नीचे करते हुए उसने आधा दरवाज़ा खोला तो पाया की सच में वहाँ पोस्टमैन ही था।

    रसिदा: हाँ बोलिए भाईसाहब
    Postman: आपा आपने तो बड़ी देर लगा दी, कब से आवाज़ दिए जा रहा हूँ और यह आपके बग़ल के घर में क्या झमेला चल रहा है.
    रसिदा: पता नही भाईसाहब, हम यहाँ नए है ज़्यादा जानकारी नहीं है हमें।
    रसिदा ने लिफ़ाफ़ा लिया और घर के भीतर आ गयी।

    अपने दोनो हाथों को आसमान को ओर ले जाते हुए, उसने अपनी नम आँखो से ऊपर की ओर देखते कहा, हमारी बस यूँ ही हिफ़ाज़त करते रहिए, हम आपके बताए राहों पर ही चलते रहेंगे, यह कहते हुए उसने अपने दोनो हाथों को अपने चेहरे पर रखा ही था कि...सायमा ज़ोर से चिल्लायी.....
    रसिदा भागते हुए रसोई में गयी तो देखा की सायमा कुर्सी पर आँखें बंद कर कलमा पढ़ रही है। रसिदा कुछ उससे पूछती तभी उसने देखा की एक तिलचिट्टा वहाँ मँडरा रहा था। यह देख रसिदा का डर नदारद हो गया और वह परिस्तिथि भाँप गयी। उसने बड़े धीमे स्वर में सायमा को पुकारा और बोला क्या बेटा आप भी ना हमारी जान ही निकाल दिए थे। यह तो छोटा सा परिंदा है आप इससे क्यूँ इतना डरते हो ऐसा कहते हुए उन्होंने तिलचिट्टे को परलोक की यात्रा करा दी। सायमा कुर्सी से उतरी और भागते हुए अपने कमरे की ओर जाने लगी। बड़बड़ाते हुए वह कहती रहीं ये कमबख़्त तिलचिट्टे कहीं के मेरा पीछा ही नहीं छोड़ते।

    रसिदा ने रसोई को साफ़ किया और फिर वह अपने काम में मशरुख हो गयी, समय अपनी गति से चलता रहा और निशा की आग़ोश में धीरे-धीरे शहर जुगनू की तरह रोशनदान बन गया। शाम का भोजन बनाने के बाद जब रसिदा खाना खाने के लिए सायमा को बुलाने उसके कमरे की ओर निकली तब उसे लिफ़ाफ़े का ख़याल आया। वह हॉल में गयी और नज़र फेरते ही उसे लिफ़ाफ़ा दिख गया। उसने उसे खोला तो दो काग़ज़ थे उसमें। यह चिट्टी हरिहर बिंद ने भेजी थी, हरिहर बिंद उसके गाँव के एक बड़े ज़मींदार के भाई का बड़ा बेटा है जो दिल्ली में पला बढ़ा और वहीं उसने अपना कारोबार जमाया था। रसिदा सोचने लगी आख़िरकार हरिहर को यहाँ का पता कैसे मिला। यह सोचते-सोचते वह सायमा के कमरे में गयी और उसे जगाया।

    चलो बेटा खाना खा लेते है शाम हो गयी है। सायमा अंगड़ाई लेते बिस्तर से उठी, अपनी ज़ुल्फ़ों को समेटते हुए उसने जोड़ा बाँधा और रसोई की ओर चल पड़ी। थोड़े समय बाद वह दो थालियों में खाना लेकर हॉल की तरफ़ आयी जहाँ रसिदा बेग़म ने ग़लीचा पहले से ही बिछा रखा था। दोनों वहीं पर बैठकर खाना खाने लगे। खाना खा लेने के बाद रसिदा बेगम ने सायमा को हरिहर बिंद की चिट्टी देते हुए पूछा की इसे हमारे मकान का पता किसने दिया। सायमा मुस्कुराई और बोली बूढ़े पेड़ों को कभी याद नहीं रहता की उनकी साख कहां तक फैली है, यह कहते हुए उसने चिट्टी खोली और पढ़ने लगी। जैसे जैसे चिट्टी की पंक्तियाँ सिमटती जा रही थी, वैसे-वैसे सायमा के मुखड़े पर मुस्कुराहट की छटा यूँ बिखर रही थी जैसे पेड़ों के बीच ढलती शाम में सूरज की लालिमा नभ को अपने अधीन कर लेती है।

    To be continued....
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  • trickypost 20w

    एक मुलाक़ात (Part:01)

    कप की प्यालियाँ जैसे ही हाथों से गिरी, चाप-चाप करती कदमों की आवाज़ संग पायल की झनकार धीमें-धीमे बढ़ने लगी। रसोई के दरवाज़े कराहते हुए यूँ चुप हो गए जैसे सारी पीड़ा मानो एक क्षण में ही नदारद हो गयी हो। वो नंगे कोमल साँवरे पर हल्की सी लालिमा ओढ़े पाँवों पर चाँद की रोशनी बिखेरते घुँघरू उन टूटी प्यालियों के इर्द-गिर्द मँडराने लगे।

    किसी ने खाँसते हुए कहाँ, रहने दो सायमा, मैं यह कर लूँगी। शायद किसी कीड़े ने काट लिया और डर के मारे हाथों से यह कप गिर गया। तुम रहने दो बेटा कहते हुए उसने सायमा के दोनो हाथ पकड़ लिए। हाथों पर उम्र के थपेड़ों ने इतनी लकीरें बना दी थी जितनी आसमान से देखने पर शहर की सड़के लगती है। यह सायमा की नानी थी, रसिदा गुलबाग बेगम लोन। क़द काठी में वह किसी राजपूत घराने की लगती थी। अभी-अभी उसे कुछ माह ही हुए थे कश्मीर छोड़कर इलाहाबाद के एक क़स्बे में आए हुए।

    सायमा अभी भी उन टुकड़ों को बटोरने में कुछ ज़्यादा ही व्यस्थ थी। उसके गेसू चेहरे को पूरी तरह ढके हुए थे। सायमा आपने केसु को बार-बार धकेलती और कप के टुकड़ों को ढूँढती, एक आध बार तो टुकड़े उसके केसु में ही लटकते हुए उसे मिले।

    रसिदा ने फिर एक बार कहा, सायमा मेरी बच्ची और गले लगा लिया। वह उसके बालों को सहलाए जा रही थी, जो बड़े ही चमकीले और मुलायम थे। उन्होंने कहा “या अल्लाह” इतने खूबसूरत बाल है तुम्हारे की मैं लड़का होती तो इसी से निकाह कर लेती, ठंडी में गर्मी के लिए कंबल ना ख़रीदना पड़ता। यह कहते हुए हल्की सी मुस्कान बिखेरे उसने सायमा की निगाहो से निगाहें मिलायी तो देखा कि सायमा के चेहरे पर चिंता की लकीरों ने जमघट बना रखा था। आँखो से मोतियों की धार निकलकर मानो किसी पतवार पर झूल रहीं हो की कोई झोंका आए और उसे भूमि पर ढकेल दे। वक्त की नज़ाकत को समझते हुए रसिदा बेग़म ने सायमा के चेहरे पर हाथ ऐसे फेरा जैसे ईश्वर की आराधना करने के बाद उसके आशीर्वाद को ओढ़ने के लिए अक्सर नमाज़ के बाद स्त्रियाँ घर में करती है। रसिदा ने पूछा बेटा क्यूँ इतने मायूस हो, इतना लग़ाव किसी से अच्छी बात नहीं है और यह तो बस पुराना एक कप ही तो है।

    सायमा ने धीमी और रुआसु आवाज़ में कहाँ “हाँ जानती हूँ की यह बस चाय की प्यालियाँ है पर यह उस ज़मीन की है, उस धरौंदे की है जहाँ हमनें अपने जीवन के पल को साथ बिताया, अब्बा-अम्मीजान, खाला सबकी इसमें यादें बसी है। मैं इन यादों से कैसे पीछा छुड़ाऊँ, मुझे समझ ही नहीं आता” यह कहते-कहते वह रोने लगी। रसिदा बेग़म ने झट से सायमा को आपनी बाँहों में जकड़ा और उसे अपनी गोद में सुलाकर थपकियाँ देने लगी। उसने कहाँ उन यादों को अब भूल जाना ही हमारे लिए बेहतर है, इससे जबतक हमें निज़ात नहीं मिलेगा हम जीवन में आगे कभी नहीं बढ़ पायेंगे। बेटा हालात को समझो अब तुम्हीं ही एक चिराग़ हो जो इस घर को रोशनी दे सकती है, तुम्हीं आख़िरी उम्मिद हो और मैं तुम्हें अपनी इन आँखो से खिलखिलाते हुए देखना चाहती हूँ। उम्मीद करती हूँ की जो ग़लतियाँ वहाँ लोगों ने की उसकी आँच आपके दामन को कभी ना छू पाए। अल्लाह हमें कभी माफ़ नहीं करेगा, जाने यह बोझ लेकर हम कैसे जिएँगे। हमें सबकुछ भूलकर एक नए सफ़र की शुरुआत करनी ही होगी। माना कि यह जगह नयी है पर हमें इसमें ढलना ही होगा। संतावना के ऐसे ही कई उपदेश उस रसोई में देर तक गूंजते रहे और यहाँ सायमा सो गयी। रसिदा बेग़म ने आसमान की ओर देखते हुए कहाँ “या अल्लाह हमें हमेशा अपनी पनाह में ही रखना, इन हालातों में तुम्हारी दुआ और रेहमत की हमें बहुत ज़रूरत है” ऐसा कहते हुए उन्होंने आमीन कहा ही था की, दरवाज़ा खोलों हरामख़ोरों...

    To be continued....

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  • trickypost 20w

    ख़्वाब

    वो ख़्वाब ही तो थे, ख़्वाब ही रह गए
    जो समाया था दिल में साँझ बन गए।
    देकर आह! जाम थमा दिया हाथों में
    जान थे वो, जान का ज़ख़्म बन गए।
    वो ख़्वाब ही तो थे...

    यक़ीन नहीं, हाथों की इन लकीरों पर
    यकीनन कुछ सहेजने को है बचा नहीं।
    ग़ैर कुछ यूँ हुए है की गुमनाम हो गए
    शाम थे वो, मैख़ाने की शाम बन गए।
    वो ख़्वाब ही तो थे...

    तहज़ीब से है रिश्ता अब खलने लगा
    यादों की मायूसी ख़ाली काम बन गए।
    ठहरी है बेताबी मायूस हो साहिल पर
    ख़फ़ा जिस्म कफ़न का दाम बन गए।

    उनके इश्क़ की तालीम गवारा ही नहीं
    इश्क़ में इश्क़ की वो क़ब्रगाह बन गए।
    इल्म भी इल्म से जुदा है अब क्या कहे
    इबादत भी इल्म की पनाहगाह बन गए।
    वो ख़्वाब ही तो थे....

    साये उनके अब सिहर ज़ाया करते है
    इस क़दर साये उनके इल्ज़ाम बन गए।
    हुनर कलम का हमारी हट्ट थे जो कभी
    कलम ही कलम के गुनहेगार बन गए।

    ज़ेहन में थे जो बसे कभी मेरी रूह सी
    सर्द रातों में वो दबी-दबी साँस बन गए।
    आधि-अधूरी है इस जिस्म की रिवायतें
    साँसे गिनती है, जाने कब राख़ बन गए।
    वो ख़्वाब ही तो थे...

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  • trickypost 21w

    आठवण

    बऱ्याच दिवसांनंतर तुझी आठवण आली
    हो माहित आहे, आता प्रेम नाही.
    पण! कधी तरी आपण एकत्र होतो.
    आठवतय? नक्किच आठवत असेल.
    आपण खरच प्रेमात होतो.

    मला सतत झोपायची सवय होती
    तुला सतत बोलायची सवय,
    मी कधीही भेटायला लवकर आलो नाही,
    पण तुलाही कधी उशिर झाला नाही.

    आपण कधीही भांडलो नाही.
    पण तरीही मात्र तु रुसायचीस,
    त्या रुसण्यात तु मला इतकी आवडायची की,
    तुझ्यावर माझं प्रेम अजुन वाढत जायचं.

    तुला भेटायची एवढी सवय होती की,
    विश्वासच बसत नाही,
    तु सोडुन गेलीस म्हणुन,

    कधी विचार केला नाही, कल्पनाही केली नाही,
    की तुझी परिस्थिती अशी होती.
    तु सांगण्याचा खुप प्रयत्न केलास,
    पण मी मात्र कायम मस्करीत घेत राहिलो.

    आणि आज... आकाशात पाहिलं...
    सगळं लख्ख आठवतं...
    तु, तुझं प्रेम, मी, आणि आपलं प्रेम.

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  • trickypost 22w

    बदनुमा दाग
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    मेरी पहचान ना लिहाज़ है ना लिबास है
    मेरा मकान मेरा नहीं, यह दाग के उधार है

    गहराई तक उतरकर देखा है ईमान को हमने
    खाई है, खाई में सिवाय दाग के कुछ ना रहा है

    बदनाम गालियाँ नहीं है मेरी मेरे चौखट की
    ये तो मुसाफ़िरों के करतूतों की आरामगाह है

    यहीं तो मुख़ातिब होते है काले चेहरे हर रंग के
    वह सब तो अपनी बस्ती में धुले हुए शहंशाह है

    ग़र मुनासिफ़ हो तो एक रात यहीं रह जाना
    ख़बर मिल जाएगी किसका तंग लिबास है

    ख़ातून भी ख़बर रखते है यहाँ बड़े इत्तिमिनान से
    किन-किन के छाती पर कितना दूध का भार है

    हम सब ने कस रखी है अपने हसरतों की कफ़न
    जाना वही मेरा भी है जहां तेरा आख़िरी मक़ाम है

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