suryamprachands

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  • suryamprachands 1w

    जिनका शोणित धधक उठा
    तो सत्तावन संग्राम उठा
    अमर सिंहनी झपट पड़ीं वो
    मुक्ति युद्ध अभिराम उठा

    उर में उनके जागीं काली,
    वीरभद्र विकराल उठे
    बजरंगी बलवान हो गए
    महाराज महकाल उठे

    गौरव का अध्याय लिखा था
    जन्मी अमर कहानी ने
    अरि-दल नष्ट-भ्रष्ट कर डाला
    उन लक्ष्मी मर्दानी ने

    माँ ने निज भुज-बल के बल पर
    मुक्ति का आह्वान किया
    शस्त्रों से श्रृंगार कर लिया
    प्राणों का बलिदान किया

    साक्षी है रणक्षेत्र अभी तक
    लक्ष्मी की तलवारों का
    चपला सी उस चपल शक्ति का
    उनके भीषण वारों का

    माता फ़िर अवतार धार कर
    भारत का उपकार करो
    हर बाला में शक्ति भरो तुम
    ऊर्जा का संचार करो

    शून्य पड़ा रणक्षेत्र अभी है
    आ कर के अधिकार करो
    हे माता इस आतुर सुत की
    शब्दांजलि स्वीकार करो

    ©Suryam Prachands

    माता लक्ष्मी बाई के जन्मदिवस पर उनकी पवित्र स्मृतियों को प्रणाम.....��

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    लक्ष्मी बाई

  • suryamprachands 2w

    बहुत दिनों बाद पूरी तरह निष्क्रिय पड़ी कलम ने आज फ़िर सदैव की तरह कुछ बेसुरी,टूटी-फूटी तुकबंदी गढ़ने के प्रयास में थी,सो ये आया.....��

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    यूँ ही

    माँ अभी तक रो रही है,बाप रो कर सो गया
    पुत्र गाए जा रहा है वीडियो में,
    आज दावत इश्क की है,जमाँ-दस्तरखान पे
    शर्म खाए जा रहा है वीडियो में,

    तार पे बच्ची खड़ी थी,हाथ में लाठी लिए
    भीड़ ताली दे रही थी वीडियो में,
    भीड़ पागल थी खुशी में,करतबों पर भूख के
    भूख गाली दे रही थी वीडियो में,

    अभी देखा जंग होती,बात से और हाथ से
    साफ़ वहशत पल रही थी वीडियो में,
    जाम पी कर नाचते थे,नाच कर पी रहे थे
    जान कुछ यूँ जल रही थी वीडियो में,

    मर रही थी साँस पूरी,लोग छू भी ना सके
    सिर्फ कोशिश हो रही थी वीडियो में,
    एक बस असरार देखा,अस्ल में कुछ यूँ हुआ
    आदमीयत सो रही थी वीडियो में

    जो हुआ था वो ना आया,ना हुआ जो आ गया
    झूठ सच्चा दिख रहा था वीडियो में,
    ये दिखा जो छोड़िए,जो अब दिखा वो सोंचिए
    वृद्ध बच्चा दिख रहा था वीडियो में

    © Suryam Mishra

  • suryamprachands 4w

    Rachanaprati

    आप समस्त से सादर क्षमा-प्रार्थी हूँ,मैं अत्यधिक अस्वस्थ था जिसके कारण मैंने परिणाम घोषित करने में बहुत विलंब कर दिया।
    मित्रों आप समस्त की "राम" शीर्षक पर अत्यधिक अद्भुत रचनाएँ प्राप्त हुई। आप समस्त जानते हैं कि "राम" जैसे अत्यधिक अद्भुत और जनमानस प्रिय विषय पर रची गई कोई भी रचना कितनी अद्भुत होगी.. आप समस्त ही विजयी हैं। आप सबकी रचनाओं से काफ़ी कुछ सीखने को भी मिला। @anusugandh मैम के श्री राम ने मर्म को स्पर्श किया, @loveneetm भैया के रघुवर हृदय में घर कर गए, @happy81 ने राम के अद्भुत व्यक्तित्व का बड़ा ही मनोहारी चित्रण किया, @shayarana_girl की रचना सदैव ही मुझे अत्यंत प्रिय होती है और इस बार तो और भी अद्भुत है, @rangkarmi_anuj भैया की साकेत रचना में राम स्वरूप अवध का जो मनोहर चित्रण है वो हृदयजई है, @anshuman_mishra के राम चंद्र हृदय में घर कर गए, @goldenwrites_jakir भैया की रचनाओं में राम के अक्स ने सिद्ध कर दिया की राम किसी विशेष धर्म अथवा जाति के नही बल्कि संपूर्ण भारतीय संस्कृति के सार और जनक हैं, @ajnabi_abhishek जी के लिखे व्यंग को शायद मैं समझ ना सका, मेरे अत्यंत प्रिय और आदर्श मान्यवर @anandbarun जी के मेरे राम ने न सिर्फ मन मोहा बल्कि हृदय में अवधपति की अत्यंत अनुपम छवि भी उत्कीर्ण की, @abr_e_shayri के राम को आह्वान पे हृदय मुग्ध हो गया...
    मैं #rachanaprati103 के विजेता के रूप में संयुक्त रूप से अनीता दहिया मैम (@anusugandh), हर्षिता शुक्ला "हैप्पी" (@happy81) अत्यंत प्रिय साजिद भाई (@goldenwrites_jakir), प्रिय आनंद सर (@anandbarun), प्रिय भ्राता अनुज शुक्ल "अक्स" (@rangkarmi_anuj), आदरणीय भ्राता लवनीत मिश्र (@loveneetm), प्रिय भ्राता अंशुमान मिश्र (@anshuman_mishra), छोटी बहन अनुष्का जैन (@shayarana_girl) और श्रुति सिंह "शायरा" (@abr_e_shayri) जी को मैं विजेता घोषित करता हूँ और #rachanaprati104 के संचालन का भार संयुक्त रूप से अपनी दोनों बहनों अनुष्का जैन और श्रुति सिंह को हस्तांतरित करता हूँ।
    यदि कोई त्रुटि हुई हो तो क्षमा करें..

  • suryamprachands 4w

    आप में से अधिकांश ने ये पढ़ा होगा, किंतु यहाँ से प्रथम बार होगा
    #rachanaprati103

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    राम

    नमो रामाय,राग-रागाय,राज-राजाय धीमहि
    रामचन्द्राय, राम-भद्राय, राम-रामाय धीमहि

    नमो पाराय पराकाशाय प्राप्तिपर्वाय धीमहि
    धर्म-अर्थाय,धर्म-खंडाय,स्वयं धर्माय धीमहि

    नमो जैत्राय,जितामित्राय,प्रियंमित्राय धीमहि
    सूर्य-वेशाय,सूर्य-अंशाय, सूर्य-वंशाय धीमहि

    नमो लोकाय,लोक देवाय,देवलोकाय धीमहि
    त्रियंनूपाय, त्रियुगरूपाय,त्रिपुरभूपाय धीमहि

    नमो सत्याय,सत्यश्रेष्ठाय,श्रेष्ठ-सत्याय धीमहि
    अवधईशाय,अवधदेशाय,अवधपुत्राय धीमहि

    नमो यज्ञाय,यज्ञकर्माय,यज्ञ-यज्ञाय धीमहि
    वेद-वेदाय, वेद-साराय, वेद-पाराय धीमहि

    नमो पुंजाय,परं-धामाय,परं-ब्रह्माय धीमहि
    शूर-शूराय, शूर-वीराय, शूर-धीराय धीमहि

    नमो रामाय,राम-रामाय,राम-रामाय धीमहि
    नम: रामाय,राम-रामाय राम-रामाय धीमहि

    !नम: राम: ईश्वरम अस्य,रामस्य ईश्वरम च!

    ©Suryam Prachands

  • suryamprachands 4w

    राम, तुम्हारा चरित्र स्वयं ही काव्य है
    कोई कवि बन जाय, सहज संभाव्य है
    - राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त..
    #rachanaprati103

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    Rachanaprati

    आप समस्त को सूचित करते हुए अपार हर्ष की अनुभूति हो रही है कि आपके कलमकार को रचनाप्रति के 102 वें संस्करण का विजेता चुना गया है।
    आदरणीय @ajnabi_abhishek जी को बहुत धन्यवाद और प्रणाम ज्ञापित करता हूँ।
    श्रीमान द्वारा मुझे रचनाप्रति के अगले संस्करण के संचालन का सुअवसर दिया गया है।
    तो आप समस्त का अगला विषय अथवा शीर्षक जो भी कहें,वो हैं भारतीय संस्कृति की प्राणवायु,चिरंतन प्रेरणापुंज, "मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम"
    आशा है उक्त विषय आप समस्त का भी प्रिय होगा,तो आप समस्त अपनी श्रेष्ठ रचनाओं सहित प्रतिभाग अवश्य करें.
    आप समस्त अपनी रचनाएँ दिनांक 30/10/2021, दोपहर 1 बजे अवश्य साझा कर दें।

  • suryamprachands 4w

    #rachanaprati102

    इस कविता में चित्रित समस्त भावनाएँ पूर्णतः काल्पनिक हैं,इनका किसी भी वास्तविकता से कोई संबंध "संयोग" मात्र है..

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    हे प्रिय वो संयोग गज़ब था,

    मुझे देख कर वो छिप जाना
    सबसे बच कर छत पे आना
    आ कर जाना जा कर आना
    किसी तरह यदि आँख मिले तो
    दाँत दिखा कर मुझे चिढ़ाना
    फ़िर खिड़की के उस पर्दे में
    जिसमें कि सूरज चित्रित था
    अधर मध्य में उसे दबाकर
    घर में निकला चाँद छिपाना
    जीवन का वो दौर अजब था
    हे प्रिय वो संयोग गजब था

    विद्यालय में पहले आकर
    कोने-कोने धाक ज़माना
    कहीं सीट पर जमीं धूल में
    वो गुलाब के फूल बनाना
    मेरी वाली सीट साफ़ कर
    मुझे देख कर वो मुस्काना
    देख सभी को सब सा रहना
    मुझे देख कर हम हो जाना
    जीवन का वो दौर अजब था
    हे प्रिय वो संयोग गजब था

    लाल दुपट्टा चूनर वाला,जो
    लाया था मैं मेले से,
    वो छल्ले पे नाम लिखाकर,
    एक जनवरी को लाया था
    वो काला खट्टा चूरन औ इमली
    खाना खुब भाया था
    पक्के कैथे,करौंद खट्टी,अहा
    बताऊँ क्या लगते थे!!
    नमक छिपाकर तुम लाती थी
    आम तोड़ कर लाता था मैं
    बिन छिलके का तुम खाती थी
    छिलके वाला मैं खाता था
    जीवन का वो दौर अजब था
    हे प्रिय वो संयोग गजब था..

    ©Suryam Prachands

  • suryamprachands 8w

    मैं नहीं जानता कि मैंने क्या लिखा है। आप समस्त से विनम्र निवेदन है कि कृपया मेरे तर्कों और कविता का कोई गलत अर्थ ना निकालें। मैं अमर राष्ट्रपुत्र महात्मा गाँधी जी का हृदय से अत्यधिक सम्मान करता हूँ, बस इसीलिए आलोचना भी की...��

    महान राष्ट्रपुत्र महात्मा गाँधी जी को उनके जन्मदिवस पर शत-शत नमन..��

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    राष्ट्रपुत्र

    गाल पे हाथ लगाए अरि
    ऐसी वो माँ का लाल नही
    क्षमा किंतु हे राष्ट्रपुत्र अब
    वैसा कोई गाल नही

    क्यों एक चौरा-चौरी पे था
    असहयोग को रोंक दिया?
    खुद लेकर आगे आए फ़िर
    आग में सबको झोंक दिया?

    भगत सिंह लटके फाँसी पे
    क्यूँ कुछ भी ना कर पाए?
    भारत माँ के अमर मान का
    समझौता करके आए?

    और बताने लगूँ अगर तो,
    घोर रात हो जाएगी
    छोटा मुँह है कुछ भी बोलूँ
    बड़ी बात हो जाएगी

    शांतिपूर्ण जीवन की आशा
    में अब कौन नही होता?
    पर प्रश्नों का उत्तर गाँधी
    केवल मौन नही होता

    गीदड़ जब गजराजों का
    संबोधन करने लगते हैं
    श्वान सिंह के सिर पर चढ़
    उद्बोधन करने लगते हैं

    जब सब गर्दे मिलकर
    हाटक राख बताने लगते हैं
    पटबिजने सब मिलकर रवि को
    आँख दिखाने लगते हैं

    लहू से सींची गई भूमि जब
    परती जोती जाती है
    माता के आँचल पर जब भी
    कालिख पोती जाती है

    तब-तब हे गाँधी जी हिय में
    शक्ति जुटाना पड़ता है
    जब धर्म-युद्ध ही हो जाए तब
    शस्त्र उठाना पड़ता है

    ©Suryam Prachands

  • suryamprachands 8w

    भाग-3

    अंतिम भाग..... आशा है आप समस्त को कहानी ज़रूर पसंद आई होगी.... त्रुटियों से अवगत अवश्य कराईयेगा...��

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    केशवानंदी

    अबकी बार हृदय में कोई बाँध सा टूट गया। एक बार आँसू बहना शुरू हुए, तो बंद ना हो पाए। आनंदी केशव को याद करके बहुत टूट-फूट कर रोने लगी। वो दौड़ते हुए भगवान के पास रखी श्रीरामचरितमानस के पास पहुँची जहाँ उसने केशव की एक छोटी सी फोटो छिपाकर रखी थी। फोटो में केशव का हँसता हुआ चेहरा देखकर आनंदी के हृदय में असीम वेदना उमड़ पड़ी। केशव को गुज़रे पाँच साल हो चले थे, लेकिन आनंदी कभी खुद को उससे दूर ना कर पाई। आज उसका विवाह किसी और से होने वाला था, किंतु उसके मन को ब्याह कर तो केशव कब का लेकर ऐसी दुनिया में चला गया था, जहाँ से बस उसकी चिर स्मृतियाँ ही आनंदी के शरीर तक पहुँच पाती थीं।

    रोते-रोते केशव को याद करते हुए वो जाने किस दुनिया में खो गई कि उसे समय का ज़रा भी ध्यान ना रहा। दरवाज़े पर खट-खटाहट सुनकर वो केशव की यादों से बाहर आई और फ़िर से अपने चेहरे पर एक झूठी हँसी सजा ली और फ़िर से विवाह के लिए तैयार होने लगी...

    ©Suryam Prachands

  • suryamprachands 8w

    भाग-2

    तीसरा भाग आज रात को ही अपलोड हो जाएगा.... आप सब पढ़िएगा ज़रूर... मैंने अभी तक तीन या चार कहानियाँ लिखी, वो अच्छी ना थीं तो मैंने खत्म भी कर दी..... ये पहली है.... अंत अवश्य पढ़िएगा.... आप सब जल्दी,,,जल्दी पढ़िए मैं बड़ा उत्सुक हूँ..����

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    केशवानंदी

    अब आनंदी के नहाने का वक्त हो गया था। सभी सखियों ने मिलकर उसे भलीभाँति नहलाकर उसे स्वेच्छा से कपड़े पहनने और थोड़ी देर आराम करने के लिए अकेला छोड़ दिया। आज सुबह से ही इधर-उधर में लगकर आनंदी थक कर चूर हो चुकी थी। वो थोड़ी देर चुप-चाप आँख बंद करके लेट गई। अभी सोई ही थी कि सपने में उसे उसका प्राणप्यारा दिखा। आज केशव को सपने में देखकर वो बेचारी लजा गई और कपड़े पहनने के लिए उठ खड़ी हुई।

    आनंदी ने आलमारी खोलकर उसमें से वो लाल साड़ी निकाली जो उसे केशव ने दी थी और कहा था कि उन दोनों की शादी वाले दिन आनंदी वही साड़ी पहने। आनंदी ने मुस्कुराते हुए वो साड़ी उठाई और सीने से लगाकर चूम लिया। आनंदी ने साड़ी पहन कर खुद को शीशे में देखा। "तू लाल कपड़े में ऐसी दिखती है जैसे किसी ने लाल गुलाब में आत्मा डाल दी हो" लाल कपड़े में उसे देखकर केशव यही कहता था। वो थोड़ा मुस्कुराई और अनायास ही शर्म के मारे उसका मुँह लाल हो गया।

    फ़िर आनंदी को उस अंगूठी की याद आ गई जो उसने सबसे छिपाकर मंदिर वाले कमरे की ताख पर रख दी थी। वो चुप-चाप दौड़ते हुए वहाँ पहुँची और उसने झट से अंगूठी को दाएँ हाथ की तर्जनी उँगली में पहन लिया। अब उसने फ़िर से हाथ को ध्यान से देखा, "तेरे उँगली में ये अंगूठी ऐसी दिखती है जैसे कमल की पंखुड़ियों पर ओस की बूँद" याद आते ही अबकी बार वो खुद को ना रोंक पाई।

    ©Suryam Prachands

  • suryamprachands 8w

    भाग-1

    आप सब पढ़िएगा ज़रूर। प्रयास किया है, आप सभी त्रुटियों से अवगत अवश्य कीजिएगा��

    पुन: निवेदन है पूरा पढ़िएगा ज़रूर, मैं अगला भाग जल्दी ही लाऊँगा

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    केशवानंदी

    आज घर में चारो ओर बड़ी चहल-पहल थी। सब जगह से मेहमान आ रहे थे। पूरा घर मेहमानों से भर चुका था। घर के एक कोने में कुछ बच्चे बहुत तेज़ शोर करते हुए लुका-छिपी खेल रहे थे। एक तरफ़ कई औरतें बैठ कर ढोलक बजाते हुए प्रसन्नता के गीत गा रही थी। आज मानों पूरा संसार ही उत्सवमय हो चुका था,आज गोपाल काका की सबसे छोटी बेटी "आनंदी" का ब्याह जो था।

    माँ जी घर के अंदर ब्याह की सारी रस्में, पूजा-पाठ करवा रही थी। वो कभी शृंगार दान से सिंदूर लाने के लिए दौड़ती तो कभी दिया जलाने के लिए घी लाने तो कभी गाय के उपलो के आग की ज़रूरत पड़ जाती। पिता जी सभी अभ्यागतों के सत्कार में व्यस्त थे। कभी किसी को पानी पिलाने के लिए मीठा लाने दौड़ते तो कभी किसी का पाँव धुलने को परात ढूंढ़ने लगते तो कभी किसी के लिए तकिये का इंतज़ाम करने लगते। बड़े भैया बाहर हलवाई के कहे अनुसार सामाग्री उपलब्ध करवाते, टेंट की व्यवस्था में देरी पे दाँत भींचते।

    घर में ढोल और शहनाई के बाद आनंदी के सखियों की पायलों की छुन-छुन की आवाज़ गज़ब का वातावरण तैयार कर रही थीं। आनंदी की सखियाँ मधुर गीत गाकर उसे उबटन और हल्दी लगा रही थी। उसकी सखियाँ कभी-कभार बीच में आनंदी को चिढ़ाती तो आनंदी धीरे से मुस्कुराती तो उसका चेहरा शर्म से लाल हो जाता और वो मुँह नीचे कर लेती।

    ©Suryam Prachands