Grid View
List View
Reposts
  • subhagabhatt 55w

    जापान में चाय पीने की एक विधि को चा-नो-यू कहा जाता है। एक छोटी सी पर्णकुटी में केवल 3 लोगों के बैठने की व्यवस्था होती है जिसमें से एक व्यक्ति स्वयं इस चाय को बनाता है चाय में कोई विशेष बात नहीं बल्कि इसके पीने की विधि में विशेषता है। इस चार घूँट की चाय को करीब डेढ़ घंटे तक बूँद-बूँद के रूप में पिया जाता है। इसकी प्रक्रिया केवल व्यक्ति को वर्तमान में जीने के लिए प्रेरित करती है कि वह क्या है?और क्या कर रहा है? मानसिक बीमारी से ग्रस्त होते जा रहे लोगों के लिए यह एक सीख होती है कि व्यक्ति को भूत की शंका एवं भविष्य की आशंका से दूर रहकर अपने वर्तमान को जीना चाहिए।

    Read More



    आज भी कहाँ सीख पाए हैं सलीका जीने में!
    तेरे हर ज़ख्म को संभाल कर रखा है सीने में।

    © सुभागा भट्ट ‌✍️

  • subhagabhatt 55w

    Saved my work✍️ No need to comment

    Read More

    वक्त

    ये वक्त भी क्या वक्त लाया,
    तेरे हालातों पर रोना आया।

    भूले थे ख़ुद को ज़िंदगी की रेल में,
    बहुतों को ख़ुद से ख़ुद को मिलवाया।

    सदियों तक माज़ी याद आते रहेंगे,
    कुछ ने क्या खोया कुछ ने क्या पाया।

    कितनी सस्ती थी मौत यहांँ दावतों में,
    कुछ फ़रिश्तों ने अपना फ़र्ज़ निभाया।

    ये ताक़ीद है ए-आदम ज़ात तुमको,सोचना!
    कि उस परवरदिग़ार ने तुमको क्यों बनाया?

    © सुभागा भट्ट

  • subhagabhatt 55w



    कौन कमबख़्त यहांँ लिखने आता है....
    हम तो आते हैं कि अपना दर्द मिटा सकें,
    तुम्हारा ग़म उधार ले सकें।
    वो साक़ी वो पैमाना,सब मुबारक़ हो आपको।
    एक हमनफ़स बस मेरी कलम काफ़ी है।
    थोड़ी-सी फ़ुर्सत हो,और ख़्याल किसी का,
    अब वफ़ा और जफ़ा में क्या जंग करना।

    कौन कमबख़्त यहांँ लिखने आता है.....
    हम तो आते हैं कि ज़हन में ज़िंदा रह सकें।
    हम आते हैं अल्फ़ाज़ों में घुलने के लिए,
    ताकि बाद-ए-सबा भी हम मुस्कुराते रहें।

    © सुभागा भट्ट ✍️

  • subhagabhatt 55w

    #Covid19 #Pandemic
    तख़लिया - खाली कराना, तन्हाई, खल्वत

    Read More

    यूंँ तो रुख़सती किसे अच्छी लगती है भला!
    ग़र साल ऐसा हो तो !!
    तख़लिया, तख़लिया,‌ तख़लिया.....

    © सुभागा भट्ट

  • subhagabhatt 63w

    कैसे भूल बैठा ये क़तरा भला औकात अपनी,
    लोग दिल में तो क्या आँखों में भी जगह न दें।

    Read More

    क्या लिखूंँ ?

    लिखना है पर क्या लिखूंँ.....✍️

    लोगों की भूली-बिसरी माज़ी लिखूंँ,
    या हारे हुए लोगों की बाज़ी लिखूँ।

    या लिखूंँ कोई ख़ूबसूरत-सी ग़ज़ल,
    या झील में उगता कोई हसीं कंवल।

    ज़िंदगी का मलाल लिखूँ,
    या अनसुलझा सवाल लिखूँ।

    अपना हाल-ए-दिल लिखूंँ,
    या किसी का मुस्तक़बिल लिखूँ।

    मेरे लिखने से कुछ बदले ये भी ज़रूरी नहीं,
    जैसे हम ज़रूरी होकर भी उतने ज़रूरी नहीं।

    अपना दर्द लिखूंँ या फ़िर तुम्हारा मरहम,
    दुनिया का फ़रेब लिखूंँ या ग़रीबों का ग़म।

    ज़माने की भागदौड़ या फ़िर इंसां की तन्हाई लिखूँ,
    अरसे से पसरे अंधेरों के लिए मसीही रोशनाई लिखूँ।

    किसी की हार लिखूंँ या फ़िर किसी की जीत,
    किसी की फ़कीरी लिखूंँ या किसी का मनमीत।

    लिखना है तो फ़िर ठीक है,लिखती रहूंँगी....
    पर लिखने के लिए क्या इतना सहती रहूंँगी!

    मेरी आवाज़ दबा तो दोगे पर अल्फ़ाज़ नहीं,
    अंज़ाम तक पहुंँचना है सबको मग़र आगाज़ नहीं।

    शोहरत के लिए या फ़िर क्रांति के लिए बिकूँ!
    लिखना है, पर सोचती हूंँ आख़िर क्या लिखूंँ..✍️

    ©सुभागा भट्ट

  • subhagabhatt 64w

    #Sharad_Purnima ��
    @d_shubh सबके साथ होने पर ही हम पूरे होते हैं।
    माता-पिता, भाई-बहन, मित्र, प्रियजन। ��

    Read More



    क़ाबिल तो मुझे दुनिया ने बनाया,
    जो करो क़ामिल तो कोई बात है।

    ©सुभागा भट्ट

  • subhagabhatt 64w



    बहुत अंधेरा है, इस वीराने में यारों,
    चलो!
    मिलकर चंद जुगनुओं को उड़ाया जाए।

    ©सुभागा भट्ट

  • subhagabhatt 64w

    #SundaySpecial #Halke_Phulke

    रचना की दृष्टि से बिल्कुल भी न पढ़ें।
    'मांँ' सहित सभी प्रियजनों को समर्पित।

    Read More



    न ताना है, न बाना है।
    न ठौर है, न ठिकाना है।
    न उलझना है, न उलझाना है।
    न आना है, न जाना है।
    न समझना है, न समझाना है।
    न बोलना है, न जताना है।
    फ़िर भी कुछ बताना है,
    सुनो!
    हर जन्म में सिर्फ़ और सिर्फ़
    बस तुमको ही सताना है।

    ©सुभागा भट्ट

  • subhagabhatt 65w



    हे मांँ अंबे! जय जगदंबे,
    कलयुगी-दुष्टों का संहार हो।
    हो मनुज, मनुज का अवलंब,
    हाँ,अब सुखी यह संसार हो।

    ©सुभागा भट्ट

  • subhagabhatt 75w

    कमी मेरे वतन में नहीं, वतन के 'कुछ' लोगों में है।

    ���� 'जय-हिन्द' ����

    Read More



    आशिक़ी कुछ ऐसी उन आशिक़ों ने निभाई होगी,
    चूमकर वतन की मिट्टीअपने माथे से लगाई होगी।

    ©सुभागा भट्ट