sramverma

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मेरे विशुद्ध भावों की अभिव्यक्ति है मेरी कविताएं; या यूं कहूं की मेरे पुरूषत्व के अंदर कहीं छुपी स्त्री है मेरी कविताएं।

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Reposts
  • sramverma 13h

    Date 21/04/2021 Time 3:34 PM #SRV #ramnavmi

    हे राम हे राम हे राम हे राम,
    चारो तरफ मचा है कोह राम,
    और कैसे लें हम तुम्हारा नाम;
    अब तो सुध लो हमारे प्रभु राम;
    हे राम हे राम हे राम हे राम !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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    ,

  • sramverma 1d

    Date 20/04/2021 Time 6:40 PM #SRV #astik

    मैं नास्तिक ही अच्छा हूँ ,
    ये धर्म की ठेकेदारी तुम ही रख लो ;

    तुम जो आस्तिक होकर ईश को ;
    बेचते फिरते हो उन्हें तुम ही रख लो !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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    ,

  • sramverma 2d

    Date 19/04/2021 Time 10:06 PM #SRV #ehsaas

    कुछ तो है जिसके
    खो जाने का एहसास
    इस क़दर गहरा है;
    वो अभी मिला भी नहीं है
    और बहुत कुछ है
    जो अभी मेरा नहीं है
    मगर उस के खो जाने का
    एहसास इस क़दर गहरा है
    एहसास जो मुस्कुराती हुई
    आँखों में भी आँसू ले आते है
    और सरशारी के लम्हों में भी
    गहरी उदासी का रंग भर जाते है
    वा'दा किया था कि प्यार सदा
    हम एक दूजे से करते रहेंगे
    ये जानते हुए भी कि एक दिन
    हम ही नहीं रहेंगे
    ना रोक सकेंगे
    ना ही रुक सकेंगे
    हक़ीक़त यही दुनिया की है
    फिर भी दिल क्यों ग़मगीं है
    कुछ ऐसा है जो अभी
    तक खोया नहीं है !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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  • sramverma 3d

    Date 18/04/2021 Time 7:45 PM #SRV #खुदा

    न पुछो मोहब्बत की काबिलियत तुम हम से,
    जिसको मिलती है खुदा मिलता है आकर के उस से।

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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  • sramverma 4d

    Date 17/04/2021 Time 7:23 PM #SRV #dard

    दर्द के गहरे सन्नाटे में
    देह के बंद किवाड़ पर
    कोई तो दस्तक दे कर
    पूछे कि कैसे जिन्दा
    रह लेते हो ?

    सुन्न पड़ी देह पर
    हल्की सी सरगोशी
    कर के कोई तो पूछे
    कि इस बेजान सी
    देह के साथ कैसे
    जीवन बसर कर
    लेते हो ?

    हिज्र के गहरे सन्नाटों
    में खुद से बिछड़े लोगो
    तुम ये तो बताओ कि
    अकेले कैसे ज़िंदा रह
    लेते हो !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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  • sramverma 5d

    Date 16/04/2021 Time 7:53 PM #SRV #nadi

    प्यासी अल्हड़ नदी को नमक पीला रहा हूँ मैं ;
    या यूँ कहूं कि उसको समंदर से मिला रहा हूँ मैं !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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  • sramverma 1w

    Date 15/04/2021 Time 7:26 PM #SRV #aurat

    एक औरत के दिल की तड़प तो
    सिर्फ़ एक औरत ही समझ सकती है ;

    मर्द तो बस अपनी ख़्वाहिशों को ;
    औरत पर थोप दिया करते है !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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    ,

  • sramverma 1w

    Date 14/04/2021 Time 7:27 PM #SRV #husn

    तुम कैसे कह देते हो एक कविता लिख दो ,
    नहीं पता तुम्हे मुझे ख़ून जलाना पड़ता है ;

    हर्फों से दो दो हाथ करने में ना जाने कब ,
    अपनी नब्ज़ों का धागा कटवाना पड़ता है ;

    पुरानी यादों के नुकीले नश्तरों से बार बार ,
    अपने दिल पर वो नाम गुदवाना पड़ता है ;

    अपने सीने के सियाह हुए काग़ज़ पर ,
    ख़ंजर बन खून से सब मिटाना पड़ता है ;

    कविता गीत नज़्मों ग़ज़लों के झगड़ों से ,
    अपने ज़ख़्मों पर नमक छिड़कवाना पड़ता है ;

    वो गली जहाँ तुम पहले पहल रहा करते थे ,
    उस गली में ना चाहते हुए भी जाना पड़ता है ;

    तुम्हारे किये हर एक झूठे वादे बयाँ करके ,
    फिर उनमें से तुम्हारा नाम हटाना पड़ता है ;

    वो अक्स जिसे अब मैं शायद याद भी नहीं ,
    ना चाहते हुए भी उसे रक़्स दिखाना पड़ता है ;

    अपने तेवर साहूकार के पास गिरवी रखकर ,
    फिर उसे मुँह मांगी कीमत पर छुड़वाना पड़ता है ;

    पहले पागलपन की सारी हदें पार कर के ,
    फिर वापस घर को ही तो आना पड़ता है ;

    सारी की सारी चतुराई तब बिक जाती है ,
    जब जाकर बाहर कुछ कमाना पड़ता है ;

    आतिशबाज़ी आतिशबाज़ी कर कर के,
    उसमें फिर ख़ुद को ही जलाना पड़ता है ;

    तुम जिसे ज़ेवर समझते हो वो ता'वीज़ है ,
    इन्हे आस्तीनों में छुपा कर रखना पड़ता है ;

    तुम कैसे कह देते हो एक कविता लिख दो ;
    नहीं पता तुम्हे मुझे ख़ून जलाना पड़ता है !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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    तुम कैसे कह देते हो एक कविता लिख दो ,
    नहीं पता तुम्हे मुझे ख़ून जलाना पड़ता है ;

    हर्फों से दो दो हाथ करने में ना जाने कब ,
    अपनी नब्ज़ों का धागा कटवाना पड़ता है ;

    पुरानी यादों के नुकीले नश्तरों से बार बार ,
    अपने दिल पर वो नाम गुदवाना पड़ता है ;

    अपने सीने के सियाह हुए काग़ज़ पर ,
    ख़ंजर बन खून से सब मिटाना पड़ता है ;

    कविता गीत नज़्मों ग़ज़लों के झगड़ों से ,
    अपने ज़ख़्मों पर नमक छिड़कवाना पड़ता है ;

    वो गली जहाँ तुम पहले पहल रहा करते थे ,
    उस गली में ना चाहते हुए भी जाना पड़ता है ;

    तुम्हारे किये हर एक झूठे वादे बयाँ करके ,
    फिर उनमें से तुम्हारा नाम हटाना पड़ता है ;

    वो अक्स जिसे अब मैं शायद याद भी नहीं ,
    ना चाहते हुए भी उसे रक़्स दिखाना पड़ता है ;

    अपने तेवर साहूकार के पास गिरवी रखकर ,
    फिर उसे मुँह मांगी कीमत पर छुड़वाना पड़ता है ;

    पहले पागलपन की सारी हदें पार कर के ,
    फिर वापस घर को ही तो आना पड़ता है ;

    सारी की सारी चतुराई तब बिक जाती है ,
    जब जाकर बाहर कुछ कमाना पड़ता है ;

    आतिशबाज़ी आतिशबाज़ी कर कर के,
    उसमें फिर ख़ुद को ही जलाना पड़ता है ;

    तुम जिसे ज़ेवर समझते हो वो ता'वीज़ है ,
    इन्हे आस्तीनों में छुपा कर रखना पड़ता है ;

    तुम कैसे कह देते हो एक कविता लिख दो ;
    नहीं पता तुम्हे मुझे ख़ून जलाना पड़ता है !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

  • sramverma 1w

    Date 13/04/2021 Time 7:27 PM #SRV #husn

    लड़खड़ा जाऊँ तो सँभलना भी जानती हूँ,
    हाँ दुर्घटनाओं से निपटना भी जानती हूँ;

    आइना भी जो देख कर खुद हार मान लें,
    मैं इस कदर सजना सँवरना भी जानती हूँ;

    हाँ मेरी सादगी में भी ऐसा हुस्न छुपा है,
    कि तेरे दिल में कैसे रहना है जानती हूँ;

    तुम बस भरोसा रखना मेरी वफ़ा पर,
    मैं अँगारों पर चलना भी जानती हूँ;

    मैं हरगिज़ ख़ुद-कुशी का शौक नहीं रखती,
    मगर तुझ पर मर मिटना अच्छे से जानती हूँ;

    हाँ मेरी फ़ितरत है हु-ब-हु पानी की तरह,
    मैं हर साँचे में खुद को ढालना जानती हूँ;

    गर कभी बिफर जाऊँ तो लहर बन जाऊँ,
    चटानों को अपने रस्ते से हटाना जानती हूँ;

    जुनूँ बन कर जो टकरा जाऊं दिमाग से तो,
    सारी की सारी हदों से भी गुज़रना जानती हूँ;

    दुआ-ए-सलामत पढ़ती रहती हूँ अक्सर,
    हर तरह की बलाओं से निमटना जानती हूँ;

    मुझे वो सारे के सारे हुनर आते है जानाँ,
    जिन से तेरी क़िस्मत बदलना जानती हूँ;

    सियासत करना चाहती नहीं हूँ मैं वर्ना,
    तेरा ये तख़्त-ओ-ताज पलटना जानती हूँ;

    अक्सर भुला देती हूँ मैं इन रंजिशों को,
    तब ही तो तुझसे मैं लड़ना नहीं जानती हूँ;

    वफ़ा तुम ने नहीं की मुझ से अब तक,
    लेकिन तुझे मैं अब भी अपनाना जानती हूँ;

    तेरे दिल को जो लगा लूँ अपने दिल से,
    तो तेरा दिल भी मैं बदलना जानती हूँ !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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    लड़खड़ा जाऊँ तो सँभलना भी जानती हूँ,
    हाँ दुर्घटनाओं से निपटना भी जानती हूँ;

    आइना भी जो देख कर खुद हार मान लें,
    मैं इस कदर सजना सँवरना भी जानती हूँ;

    हाँ मेरी सादगी में भी ऐसा हुस्न छुपा है,
    कि तेरे दिल में कैसे रहना है जानती हूँ;

    तुम बस भरोसा रखना मेरी वफ़ा पर,
    मैं अँगारों पर चलना भी जानती हूँ;

    मैं हरगिज़ ख़ुद-कुशी का शौक नहीं रखती,
    मगर तुझ पर मर मिटना अच्छे से जानती हूँ;

    हाँ मेरी फ़ितरत है हु-ब-हु पानी की तरह,
    मैं हर साँचे में खुद को ढालना जानती हूँ;

    गर कभी बिफर जाऊँ तो लहर बन जाऊँ,
    चटानों को अपने रस्ते से हटाना जानती हूँ;

    जुनूँ बन कर जो टकरा जाऊं दिमाग से तो,
    सारी की सारी हदों से भी गुज़रना जानती हूँ;

    दुआ-ए-सलामत पढ़ती रहती हूँ अक्सर,
    हर तरह की बलाओं से निमटना जानती हूँ;

    मुझे वो सारे के सारे हुनर आते है जानाँ,
    जिन से तेरी क़िस्मत बदलना जानती हूँ;

    सियासत करना चाहती नहीं हूँ मैं वर्ना,
    तेरा ये तख़्त-ओ-ताज पलटना जानती हूँ;

    अक्सर भुला देती हूँ मैं इन रंजिशों को,
    तब ही तो तुझसे मैं लड़ना नहीं जानती हूँ;

    वफ़ा तुम ने नहीं की मुझ से अब तक,
    लेकिन तुझे मैं अब भी अपनाना जानती हूँ;

    तेरे दिल को जो लगा लूँ अपने दिल से,
    तो तेरा दिल भी मैं बदलना जानती हूँ !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

  • sramverma 1w

    Date 12/04/2021 Time 8:30 PM #SRV #wazood

    वजूद के जो हिस्से
    वजूद की तलाश में
    खो जाते हैं ,
    उन का इंदिराज
    ज़िंदगी की किताब
    के किसी भी पन्ने
    पर नहीं मिलता ,
    हाँ उन कविताओं
    नज़्मों शे'रोँ में जरूर
    मिलता है जो आँसुओं
    की रौशनाई में
    लिखी गई हों ,
    लेकिन फिर हमें
    तारीकी को अपना
    नशेमन बनाना पड़ता है ,
    इस राज़ से ज़िंदगी
    नहीं वजूद वाक़िफ़ है ,
    और हम वजूद नहीं
    ज़िंदगी जीते हैं !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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