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  • shubhamshrivastava 26w

    रातें ख़त्म होती हैं, पर बात ख़त्म नहीं होती,
    पैमाने ख़त्म होते हैं, पर मुलाक़ात ख़त्म नहीं होती,
    ये कैसा हुस्न-ए-सितम है मेरे यार का साथियों,
    के उनकी बाँहों में नेमतों की, करामात ख़त्म नहीं होती,
    ©shubhamshrivastava

  • shubhamshrivastava 31w

    ये शब सजा रक्खी थी हमने जिनके इंतेज़ार में,
    वो ख़ुद भी मद में चूर थे, सनम किसी के प्यार में,
    क्यों इस क़दर खफ़ा हई है आज हमसे ज़िन्दगी,
    के साँसें चल रहीं या तो कट रहीं उधार में,
    ये शब सजा रक्खी थी हमने जिनके इंतेज़ार में,
    फ़नाह हुई है आबरू न जाने किस ख़ुमार में,

    ©shubhamshrivastava

  • shubhamshrivastava 117w

    सुकून की तलाश में कोशिशों का हर कोना,
    सलीके से देख लिया,
    ज़िन्दगी के गम जो तजुर्बे बने बेशक,
    उन्हें भी तरीके से सीख लिया,
    ©shubhamshrivastava

  • shubhamshrivastava 156w

    चंद रोशनी के छींटे आज बरस पड़े मेरी कमीज पर,
    उन्हें छू कर देखा तो अहसास हुआ किसी टूटे हुए ख्वाब के बिखरे किसी टुकड़े का,
    चंद रोशनी के छींटे आज बरस पड़े मेरे ज़मीर पर,
    उन्हें छू कर देखा तो अहसास हुआ किसी अधूरे गीत के बिखरे किसी मुखड़े का,
    क्या रू-ब-रू मैं उस कतरे से हूँ? जो आज बिन बुलाए बरस पड़ा है,
    या वो एक मोह है अदृश्य सा, जो सुनहरे लिबास में उस ओर खड़ा है,

    ©shubhamshrivastava

  • shubhamshrivastava 165w

    Ye baarish ki boondein kai raaz chhupaye zameen par garti hain,
    Tanhaai ke aansuo ki aawaz chupaye zameen par garti hain,
    Inhe hateli pr rakh kr kabhi mehsoos kiya,toh laga, jaise kai puraane khwabon ki parwaz chhupaye aasman se girti hain,
    Kabhi palkon p girkar ashkon se mil jaati hain,
    Toh kabhi paaton p girkar motiyon sa khil jati hain,
    Ek madham si dheemi se aawaz m kuch kehti hain,
    Ye baarish ki boondein kai raaz liye behti hain,

    Ek saundhi si khushboo zehen m ghol deti hain,
    Hawaon m ishq ke rangon se bol deti hain,
    Uske ghar ki khidki se dabe paon jaana,
    Uske chehre ki madhaam si hasi chura laana,
    Wo hasi wo rang,jo indradhanush banayenge,
    Aasman k raaste do dilon ko milayenge,
    Aaisi kai baatein wo chup chap mujhse kehti hain,
    Ye baarish ki boondein kai raaz liye behti hain,



    ©shubhamshrivastava

  • shubhamshrivastava 166w

    ज़िंदगी आग की लपटों सी,हो रही जो हर पल धुआँ धुआँ,
    वक्त के दामन से सिकुड़कर,हर लम्हा जैसे रुआ रुआ,
    ये शुष्क गर्म धुआँ धुआँ,रहता जो बे आवाज़ है,
    हर पल ये कुछ सिखलाता है, हर पल ये कुछ दिखलाता है,
    बहता सदैव ये जा रहा,मंज़िल को ये परवाज़ है,
    मैं भी हूँ आग,मैं भी धुआँ,जीना का ये अंदाज है,
    ©shubhamshrivastava

  • shubhamshrivastava 166w

    आग की लपटों में जैसे,हैं छिपे कई राज हैं,
    ये शुष्क गर्म धुआँ धुआँ,रहता जो बे आवाज़ है,
    बहता सदैव ये जा रहा,मंज़िल को ये परवाज़ है,
    मैं भी हूँ आग,मैं भी धुआँ,जीना का ये अंदाज है,
    इस आग की लपटों में जैसे,हैं छिपे कई राज हैं,
    ©shubhamshrivastava

  • shubhamshrivastava 167w

    Kai beediyan hain,Jinhe todnga mein,(0:16)
    Kai raastein hain,Jinka rukh modunga mein,
    Haan Fikar nahi mujhe zamane ki,(0:24)
    Na zaroorat h aaj,mujhe kisi bahane ki,
    Jo Walt k ye sannaate hain hr khabar wo meri rakhte hain,
    Kuch khwab khade hain rahon mein,raah jo meri takte hain,(0:53)
    Mein akela hi nikla hun manzil ki talaash m,
    Kathinaiyon ke lehron se,nahi ho raha hataash m,
    Ek honsla mere andar h,jo hr pal mujhse kehta hai....
    Behta ja bs behta ja,tu cheer k sabhi pahadon Ko,(1:12)
    Aaj goonj uthega Jag saara,sunkar Teri dahadon Ko,(1:24)
    Mein girunga,Mein uthunga Mein bhaagunga,
    Is gehri neend se aaj mein jaagunga,(2:16)
    Aukaat banane Nikla Hun,din raat banane Nikla Hun,(1:54)
    Mere sapno ki aandhiyon se,buniyaad hilaane Nikla Hun,
    Haan Ziddi Hun mein,haan zinda Hun mein,
    Apne sapno ke aasma ka,ek aazad parinda hun mein,
    Josh jigar m himmat rakh ke,toofano ki basti m,
    Manzilein jeetne aaya hun,hoslon se bani is kashti m,
    Beparwah hun bebaak bhi hun,
    sholon se dehakti aag bhi hun,
    Kuch hasil karne aaya hun,kuch kasil krke jaunga,
    Mein kya hun or kya ban jaun,ye khud ko mein dikhlaunga,


    Saapna mera raasta mera,(3:19)
    Meri Manzil se hai bs Aab waasta mera,
    ©shubhamshrivastava

  • shubhamshrivastava 167w

    Kai beediyan hain,Jinhe todnga mein,(0:8)
    Kai raastein hain,Jinka rukh modunga mein,
    Fikar nahi mujhe zamane ki,(0:24)
    Na zaroorat h aaj,mujhe kisi bahane ki,
    Jo Walt k ye sannaate hain hr khabar wo meri rakhte hain,
    Kuch khwab khade hain rahon mein,raah jo meri takte hain,(0:53)
    Ek honsla mere andar h,jo hr pal mujhse kehta hai....
    Behta ja bs behta ja,tu cheer k sabhi pahadon Ko,(1:12)
    Aaj goonj uthega Jag saara,sunkar Teri dahadon Ko,(1:12)
    Mein girunga,Mein uthunga Mein bhaagunga,
    Is gehri neend se aaj mein jaagunga,(1:32)
    Aukaat banane Nikla Hun,din raat banane Nikla Hun,(1:54)
    Mere sapno ki aandhiyon se,buniyaad hilaane Nikla Hun,
    Haan Ziddi Hun mein,haan zinda Hun mein,
    Apne sapno ke aasma ka,ek aazad parinda hun mein,



    Saapna mera raasta mera,
    Meri Manzil se hai bs Aab waasta mera,
    ©shubhamshrivastava

  • shubhamshrivastava 171w

    आज शांत चित्त बैठा बैठा,कुछ बीते पलों को सोच रहा था,
    कुछ यादें सिरहाने रक्खी हुई थी,जिन्हें कई अरसों से खोज रहा था,
    हलकी उजियारी शामों से,कभी नज़्में चुराया करता था,
    उन पंखुड़ियों को जोड़ जोड़,तेरा चेहरा बनाया करता था,
    ये कुछ बातें हैं,जो तुझे पता नहीं,और अब में जाताना चाहता नहीं,
    किसी खुशबू के जैसे ज़हन में घुलती,उन्हें भुलाना चाहता नहीं,

    तेरे चेहरे के सुर्ख किनारों से,कुछ ज़ुल्फें इतराती थीं,
    वो धुप सी तेरे चेहरे पर,लेकिन छूकर मुझको जाती थी,
    इक मद्धम मद्धम वो झलक सी थी,एक वक़्त था जब मुझे ललक सी थी,
    तेरे घर के बाहर से गुजरने की,तेरे सीढ़ियों से नीचे उतरने की,
    एक भीनी भीनी सी खुशबू थी,इंतज़ार जो मेरा करती थी,
    तेरी गालियों से में जब गुज़रुं तो,मेरे साथ वो टेहला करती थी,
    इन किमाम सी घुलती यादों का,में नशा भुलाना चाहता नहीं,
    ये कुछ बातें जो ज़ेहेंन में ठहरी हैं,उन्हें भुलाना चाहता नहीं,

    सिलसिला ये मुसलसल होता रहा,थाम वक़्त के दामन को,
    तेरी धुप से मुतास्सिर हम होते रहे,छूकर उस ज़र्द सी चिलमन को,
    वो दरिया जो तेरा दिल हुआ करता था,न जाने कहाँ वो खो गया है?
    मेरी कलम की नोक के आँचल में, चुपचाप सा छिपकर सो गया है,
    उस आँचल में हैं अश्क़ छिपे में जिन्हें बहाना चाहता नहीं,
    वो कुछ बातें जो बड़ी गहरी हैं,उन्हें भुलाना चाहता नहीं,

    दो चार काश में, जिंदिगी के,ये वक़्त धुएँ सा लुप्त हो गया,
    कई चिरागें जला कर बैठे रहे हम,इंतज़ार भी अब तो सुप्त हो गया,
    अब तनहा बैठा मैं,सुन्न गुज़रते लमहों को पकड़ के रखता हूँ,
    तेरे कई अहसास महफूज़ जो मुझमें, उन्हें जकड के रखता हूँ,
    बस ये कुछ अहसास हैं,कुछ बातें हैं,जो तू जाने अनजाने छोड़ गई,
    मैं उन्हें गवाना चाहता नहीं,
    वो कुछ बातें जो आफ़ताब सी सुनहरी हैं, उन्हें भुलाना चाहता नहीं,
    ©shubhamshrivastava