shivimishra

अपने वजूद की तलाश में

Grid View
List View
Reposts
  • shivimishra 36w

    मेरे मन मे विचारों का बवंडर छोड़ कर करुणा चली गयी. मुझे भी बहुत सारी भूली बिसरी बातें याद आने लगी, कई बार मैंने खुद को एक कैद मे पाया था. सामाजिक कायदे का पिंजरा, संस्कारो का पिंजरा, उल्टी पुल्टी कुरीतियों का पिंजरा. कितना आसान होता है पुरुष के लिए ये कहना मैंने तो अपनी पत्नी को पूर्ण स्वतंत्रता दे रखी, अरे भाई नौकरी भी करने देता हूँ फ़िर भी इन औरतों का रोना खतम नही होता. मन होता है पूछ लूँ, स्वतंत्रता देने यदि आपके हाथ मे है, तो निश्चित ही आप अपने को उससे ऊँचा समझते हैं, यदि बात बराबरी की है, तो परमिशन की ज़रूरत ही क्यों. जानती हूँ कई लोग इस बात से सहमत नहीं होंगे, अरे आज औरतें अंतरिक्ष पर पहुँच गयीं और मैं दहलीज की बात कर रही, जी हां वही दहलीज लांघने के लिए उस औरत ने कितनी लंबी लडाई लड़ी है केवल वो औरत जानती है. बेटे और बेटियों को बराबरी का दर्जा देने वालों की कमी नहीं है किंतु बेटियों को कोख मे मार देने वालों की गिनती मे भी तो इजाफा ही हो रहा है.

    Read More

    Independence day- 2

    कहाँ आज़ाद हैं औरतें, यदि घर वाले रोक नही लगते तो बाहर की दुनिया तो है ही उनकी उड़ान रोकने के लिए, उनका दायरा तय करने के लिए! रोज़ लड़कियों के साथ होने वाली अप्रिय घटनाएं मन को व्यथित करती हैं. और मैं खुद से पूछती हूँ कब मिलेगी औरतों को आज़ादी, इन त्रासदियों से. रही बात मेरी मैं पढ़ी- लिखी आत्म निर्भर हूँ, कभी कभी रिश्तों के लिए थोड़ा adjustment करने को मैं गुलामी नही समझती. किंतु जब समर्पण को समझौता मान लिया जाए तो, अपना ही अस्तित्व को बौना नगण्य लगने लगता है!बात सिर्फ वाणी के घर नहीं जाने की या मेरे मन को मारने की नहीं है . शादी के पहले मैंने nonveg को हाथ भी नही लगाया था, परंतु शादी के बाद ससुराल वालों के दबाव मे सब सीखा. आज भी मेरे चिकन मटन को हाथ लगाते मेरे हाथ कांपते हैं. ना मैं अपनी इच्छा किसी पर थोपना नही चाहती किंतु कभी किसी ने मेरे इस प्रयास की सराहना नही की, फ़र्ज़ का नाम दे दिया गया.
    उफ्फ मैं भी कितना सोच रही, पर सोच पे तो किसी की पबंदियाँ नहीं होतीं ना. अरे मुझ पर ही पाबंदी क्यों है? समाज, लोग इनकी फ़िक्र मुझे क्यो है. शायद मैंने ही अपने अस्तित्व का गुलाम बना रखा है. मन ही मन मैंने कुछ सोचा और पास के एक रेस्तरां को फोन लगाया, "हाँ मेरा एक ऑर्डर नोट कर लीजिये.... "
    थोड़ी देर बाद मैं तैयार हो के नीचे आई, और बाहर निकलने से पहले मैंने मिट्ठू का पिंजरा खोल दिया, और उसे उड़ाते हुए बोली
    "हैप्पी इंडिपेंडेंस डे"
    (समाप्त)
    #shortstory #shiviwrites #hindikahani
    ©shivimishra

  • shivimishra 36w

    Independece day
    "विनय मैं सोच रही थी, तो आज शामअपनी फ्रेंड वाणी से मिल के आ जाऊँ! कुछ दिन से उसकी तबियत ठीक नहीं है और फ़िर lockedown के बाद से मैं कहीं बाहर भी नहीं निकली. "
    मैं ने देखा विनय अभी भी मोबाइल मे आँख गड़ाये बैठे थे, हमेशा की तरह, मेरी बातों पर उनका कोई ध्यान नही था.
    "तो मैं जाऊँ ना, इस बार मैंने थोड़ी तेज़ आवाज़ मे कहा!
    "कहाँ? कब? विनय की नज़रे अभी भी फोन पे थी.
    "आज शाम, वाणी के घर" मैने अपने स्वर को भरसक संयत करने का प्रयास किया.
    "अरे, यार , कोई कोरोना के टाइम मे किसी के घर जाता है क्या? आज independence day की छुट्टी थी, तो मैंने शाम को अपने कुछ दोस्तों को dinner पर बुलाया है! तुम ना अपनी स्पेशल वाली बिरयानी बना लेना ज़रूर से, बाकी मेनू अपने हिसाब से देख लो ! Dessert मे मैं गुलाब जामुन मंगवा लूंगा.
    मैं आवक सी उन्हे देखती रही,
    "और हाँ वाणी को वीडियो काल कर लो, इतना तो आता होगा ना तुम्हे, उन्होंने हँसते हुए कहा और किसी का नंबर डायल करते हुए बाहर निकल गये.
    मैं कुछ पल तक खड़ी रही, फ़िर चुप चाप कुर्सी खींच कर बैठ गयी. मेरे होंठों पर बेबसी भरी मुस्कान आ गयी, " इंडिपेंडेंस डे, हुँह "मैंने धीरे से कहा!

    Read More

    Independence day -1

    सामने पिंजरे मे बैठे मिट्ठू ने मेरी नकल उतारी " इंडिपेंडेंस डे" और मैं हंस पड़ी! एक यही तो है पूरे घर मे जिससे मैं अपनी दिल की बात कर सकती हूँ!
    "मेमसाब, आज मैं घर थोड़ा जल्दी जा सकती हूँ क्या? " मेरी मैड करुणा ने मेरे विचारों को विराम लगा दिया.
    "अरे आज तो काम ज़्यादा है, मैं तो तुझे रोकने वाली थी, कुछ urgent है क्या तेरा जाना"
    Urgent क्या मेमसाब, मेरे पति की आज छुट्टी है ना, वो आज 15 अगस्त है ना, तो शाम को चिकन खाना मांगता उसको. उसके आवारा दोस्तों को भी बुलाया है, बोलता है सिलीबरेट करेगा! "
    सिलीबरेट नही रे सेलिब्रेट कहते हैं! मैने हंस के उसे सुधारा!
    कहे का सिलीबरेट मेमसाब उसने उदास स्वर मे कहा!
    "आज के दिन आज़ादी मिली थी ना हमे"
    औरत को भी आज़ादी मिलती है क्या मेमसाब, इतनी मेहनत करती हूँ, एक पैसा खुद पे खर्चा नहीं कर पाती, ऊपर से घर के कामो की ज़िम्मेदारी भी मेरी, किसी से हंस बोल लूँ तो पति को लगता है मेरा चक्कर है उससे, पिछले 6 महीने से अपनी पथरी का ओपरेशन टाल रही मैं, क्योंकि राजू की फीस बढ़ गयी है, और मेरे पति को दावत करनी है! मेरे को तो रोज़ का वही है, मेमसाब, दिन भर काम करो और रात को शराब के नशे मे धुत्त पति से मार खाओ! मेरे लिए कौन सी आज़ादी, उसने अपने आँसू पोछते हुए कहा! "
    (क्रमशः)
    #shortstory #hindikahani #yqtales #hindi #shiviwrites
    ©shivimishra

  • shivimishra 44w

    ग़ुम है पहचान मेरी कोई पता दे!
    आईना गर दिखाता वजूद हो,दिखा दो!!
    ©shivimishra

  • shivimishra 44w

    By unknown Year 2020 has been depressing since starting after burning from riots due to CAA and NRC, we are fighting the toughest battle of life, with covid 19!
    And today when ppl have realized the importance of hygiene and health it's high time to focus on mental health. With cut throat competetion in every field, in world of fake ppl, life full of thums up and hearts every person somewhere is extremely lonely as he is scared of being judged! It's ok to be anxious about uncertainities of life, it's okay to be scared of your insecurities and it's perfectly okay to face failure and criticism.
    Covid was cruel, it took away so many lives, so many died due to corona, so many due starvation and many more due to poverty. Overall this entire phase was/is quite depressing.
    I remember when I read about suicide of Preksha, the relatively unkown tv actress I was in utter shock, she died due to fear of unemployment, she was just 26! Was suicide only option for her? She was 26 she could have done something else, but she decided to quit!
    And today I really froze when I heard about Sushant's suicide, it was an utter shock, with shaking fingers I googled his name hoping for the news to be a hoax, unfortunately it wasn't. I am none to judge his pain, his struggles, but he had everything, he made us believe, if you can dream you can achieve!
    What made him die, might not ever be cleared all I know is, my favorite actor, was not a real hero. He felt left out, he was depressed, but don't we all get depressed at some period of our lives? Imagine the cindition of his old father! Why he did not think about him even once?
    Sarfaraz dhokha de ke chala gaya hai, aur piche chor gaya h anginat sawal aur anginat baatein!
    I pray to God, he finds peace where he went! I feel horrible I lost two of my favorite actor in few days, one did not have time to live, one did not wanted to live!!
    I want to tell you all, depression is common, it's generally disguised, behind the smiling faces, there might be utter emptiness! Please don't ignore, if you feel you are someone is not okay! The solution of all problem lies in just talking sometimes. If you are sad or depressed reach out for help! Go see a psychatrist if you cannot confine, lean on someone!
    Life is short, don't ruin it! Do something productive, draw, paint, write, act, sing, cook, play do anything that makes you happy! Medidate, channelize your negative energy into art! Meditate, or workout, it acts as stress buster! Be positive, always remember best thing about bad time is it too passes!
    Finally, I would like to conclude by saying remember, if u have no1 to talk, please talk to me m there to listen to u!!
    Om Shanti! Sushant apki atma ko wo shanti mile jiski apko talash thi!!!
    ©shivimishra

    Read More

    RIP Sushant

  • shivimishra 46w

    महुआ कुछ कहती उसके पहले ही उसे बाहर से कुछ शोर सुनाई दिया, भागते हुए बाहर आई तो देखा, चार लोग महेश को एक खाट पर लाद कर ला रहे थे, पता चला किसी विषैले सांप ने डँस लिया है! सुनते ही उसे काठ मार गया, पिता की ये हालत भाई को कुछ हो गया तो। महेश बेहोश था, लोगों ने बताया रामदीन काका के खेत मे, उसके मवेशी घुस गए थे, जब वो उन्हे हांकने गया तो उसमे बैठे भुजंग ने डंस लिया।
    ला कर लोगो ने महेश को घर मे लिटाया और भुल्लन कुन्हार को बुला भेजा। वो ज़ेहरीले से जहरीले सांप और बिच्छु का ज़हर उतारने का मंत्र जानता था। महुआ ने अपना दुपट्टा उतार के महेश के पैर मे बांध दिया, ज़हर से उसका पैर नीला पड़ रहा था। माँ का रो रो बुरा हाल था। पिता अपनी बीमारी को कोस रहे थे। महुआ बेचारी कभी महेश को संभलती कभी उनको। भुल्लन ने आते ही काली मिट्टी से ज़हर उतरना शुरू किया, और आधे घंटे तक कुछ बुद्बुदाने के बाद एक पुड़िया मे से राख जैसा कुछ निकाल के महेश के मुह मे डाल दिया। "आज की रात भारी है बिटिया, भुल्लन ने गम्भीर स्वर मे कहा, यदि आज इसे होश आ गया तो सब ठीक वरना।
    " हाय मुई चिड़िया हमारे बच्चे को खा जायेगी मा ने रोते हुए कहा!
    क्या मुई चिरिय्या? भुल्लन ने चकित होते हुए कहा।
    दरसल मुई चिरैय्या का बोलना अप्सकुन होए है बिटिया, यम की दूत होवे है वो मुई, जब ही बोलत है कोई ना कोई को खा जाती है। उसके बोलने का मतबल जरूर कछु अनहोनी होने वाली है! "भुल्लन ने चिंतित स्वर मे कहा, हमाए काका के मरने से पहले भी डायन हमाए छत पे बोलती रहती थी। "
    क्या कोई उपाय है जानने का, किसकी मौत का संदेसा लाई है वो? महुआ ने अचनाक पूछ लिया।
    "उपाय तो है बिटिया, पर उसमे बहुत खतरा है।"
    कैसा उपाय? कौन सा खतरा!
    "कहते हैं, भोर के तीन बजे, मुआ चिरिय्या पीली नदी किनारे पानी मे घूरती बैठी होती है, अगर कोई दबे पाँव पानी मे दूर से देखे तो उसे मरने वाले का चेहरा दिखाई देता है। "
    "इसमे कौन सा खतरा काका? ई तो कोई भी कर सके है, महुआ ने उत्सुकता वश कहा!

    @mirakee @mirakeeworld @hindiwriters

    Read More

    महुआ (अंतिम भाग)

    " खतरा ई है बिटिया, ऊ वकत, वो चिरैय्या साक्षात यम होवे है, अगर किसी ने थोड़ा भी सोर किया और चिड़िया ने पलट के देख लिया, उसकी मौत उसी पल निश्चित है।खैर हम देवी मैया से महेश के लिए प्रार्थना करेंगे, तुम जैसे ही उसे होश आए, ये पुड़िया पानी मे डाल के पिला देना। कह कर, भुल्लन उठ खड़ा हुआ। महुआ वही बैठी रही। ज्यूँ ज्यूँ रात बढ़ रही थी, महुआ की बेचैनी बढ़ रही थी। पिता की तबियत भी आधी रात बिगड़ने लगी, उनके दिल की धड़कने तेजी से बढ़ रही थी और इधर महेश की क्षीण हो रही थी। ढाई बजे के लगभग जब सबकी आँख लग गयी, महुआ की बेचैनी ने उसे एक फैसला लेने को मजबूर कर दिया, उसके पाँव स्वतः ही पीली नदी की तरफ बढ़ने लगे! हल्की बारिश हो रही थी, चाँद बादल से अठखेलियाँ कर रहा था, थोड़ा थोड़ा उजाला तो था, किंतु रात के सन्नाटे को चीरति झींगुरों की आवाज़ माहौल मे दहशत पैदा कर रही थी पर उसे परवाह ना थी, उसको यकीन था, कोई चिड़िया नही होगी सारी बातें बेबुनियाद हैं। लाल आँखो वाली मुई चिड़िया महज एक साधारण पक्षी है, गौरैया, कौव्वा और मोर की तरह।
    नदी के किनारे पहुँचने पर उसकी आँखे आश्चर्य से फैल गयीं! नदी की तरफ़ मुँह किये हुए एक विशाल पंछी बैठा था, उसकी पीठ महुआ की ओर थी। महुआ दबे पाँव आगे बढ़ने लगी, धीरे. .धीरे, उसे अभी भी यकीन था नदी मे उसे बस चिड़िया की ही परछाई दिखेगी। वो लगभग चिड़िया के करीब पहुंची ही थी कि गीली मिट्टी पर उसका पाँव फिसला और वो धम्म से नीचे गिर पड़ी, उसके गिरते ही चिड़िया ने पंख फैला दिये, और उसके ऊपर आ कर बैठे गयी, उसकी बड़ी बड़ी लाल आँखो से मानो क्रोध बरस रहा हो। उस चिड़िया ने पल भर के लिए महुआ की भयभीत आँखो मे घूर कर देखा और एक भयानक आवाज़ करती हुई उड़ चली। महुआ ने राहत की सांस ली और उठने की कोशिश करने लगी, किंतु यह क्या, उसके हाथ पाँव जड़ हो रहे थे, उसकी सांस धीमी पड़ने लगी थी, आँखे बंद होने से पहले, उसे याद आया , उसने मुई चिरैय्या की आँखो मे एक चेहरा देखा था... उसका खुद का चेहरा।(समाप्त)

    ©shivimishra

  • shivimishra 46w

    महुआ ने आज कितनी कोशिश करी थी स्कूल से जल्दी निकलने कि किंतु कापियाँ जांचने मे देर हो गयी! "उफ़ अभी साढ़े 6 ही बजे हैं लेकिन घुप्प अंधियारा हो गया है, कातिक मे मुआ सूरज भी जल्दी छुप जाता है!" महुआ हाथ मे बंधी घड़ी देख कर बड़बड़ाई! महुआ पास के गाँव मे पढ़ाती थी, इतनी मुश्किल से मिली नौकरी छोड़ भी तो नहीं सकती थी, गृहस्थी की गाड़ी, भाई की पढाई और लकवाग्रस्त पिता का इलाज छोटी सी उमर मे ना जाने कितना बोझ था उसके कंधों पे! खुशी की बात ये थी कि भाई की पढाई भी अब पूरी हो चली थी, जल्दी ही उसकी नौकरी लग जायेगी। फ़िर वो भी मधुसूदन से ब्याह कर पायेगी, पिछले तीन साल से उसका इंतज़ार कर रहा, सोचते-सोचते उसके गाल लाल हो उठे!
    अपनी सोच मे गुम वो कब घर पहुंची, पता भी ना चला, घर मे पैर रखते ही माँ फट पड़ी, "कहाँ रह गयी थी बिटिया, हम कब से राह देख रहे थे, कान्हे इत्ती देर कर दी? तोहे पता है, आज तो मुई चिरैय्या, हमाए छज्जे पे बोल रही थी, हमार कालेज तब से धुक धुक कर रहा, जाने किसको खाने आई है ये मुई, " उन्होंने घबराये स्वर मे कहा।
    "लगता है.. हमार. बुल्लवा ..आया है, खाट पर पड़े पिता ने कराहते हुए एक एक शब्द जोड़ कर धीरे से अस्पष्ट स्वर मे कहा।
    " अरे कैसन बात करते हो बाबू जी, हम ये सब नाही मानते, आप जल्दी अच्छे हो जाओगे, हम आपको सहर के बड़े डाक्टर को दिखाएंगे! " महुआ ने बात टालते हुए कहा।
    "बिटिया.. अब डाक्टर भी.. कछु ना कर पायेगा! " कहते कहते पिता के टेढ़े मुँह से लार चुने लगी।

    #hindistory #yqdidi #kissa #gaanv #shiviwrites #folktales
    @mirakee @mirakeeworld
    #shortstory #folktale

    Read More

    महुआ(part 1)

    महुआ पास बैठ कर उनका मुँह अपने दुपट्टे से साफ करने लगी! पिता जब तक ठीक थे उन्होंने कभी महुआ और महेश मे अंतर ना किया, गाँव वालो का विरोध सह कर भी दोनो को पढाया था! कहाँ तो उसके ब पास करते ही, उसके हाथ पीले करना चाहते, किंतु तभी उनको लकवा मार गया और बिस्तर पे पड़ गए तब से सब बदल गया!
    "मै ..ठीक..हूँ बिटिया तू कपड़े बदल ले थक गयी होगी!
    पिता को अपनी चिंता करते देख महुआ की आँखे भर आईं उसने मन ही मन इनारे वाली देवी मैय्या जो कि इस गाँव की कुलदेवी थी प्रार्थना की " हे भगौती माई, किरपा करो, सब बीपत हरो, हम शुक्कर को कराही चढ़ाएंगे। "
    गाँव मे देवी माँ को विपत्ति टालने के लिए या मन्नत पूरी होने पर हलवा पूरी का भोग लगाया जाता था, इसी परंपरा को कराही चढ़aना कहते थे! महुआ उठ कर जा ही रही थी, कि बाहर मुई चिरैय्या की भयानक आवाज़ गूंजने लगी!
    (क्रमशः)
    ©shivimishra

  • shivimishra 46w

    स्त्री जब प्रेम मे होती है
    एक नही, अनेको किरदार हो जाती है
    रात भर भीग कर इंद्रधनुष के रंगो मे
    सुबह पुष्प हरश्रृंगार हो जाती है।।

    प्रेम की पराकाष्ठा जब पार कर जाती है
    सब भूल कर राधा बन जाती है,
    कभी लालसा मे अहिल्या हो जाती है
    विरह की अग्नि मे जल कर
    कभी उर्मिला हो जाती है।

    यदि बात आये प्रेमी के सम्मान पर
    सबसे लड़ कर सावित्री बन जाती है
    लोक लाज से बचने के लिए
    कभी कुंती, कभी शकुंतला हो जाती है

    स्त्री जब प्रेम मे होती है
    एक नही अनेको किरदार हो जाती है
    दिन भर तप कर सूरज की आग मे
    साँझ ढले सुरजमुखी हो जाती है।

    अपने प्रेम को पाने की खातिर
    अपनों के विरुद्ध रुकमणि हो जाती है
    जात पात के बंधन को पाट कर
    इंद्र की शुचि हो जाती है।

    स्त्री जब प्रेम मे होती है
    एक नही कई किरदार हो जाती है
    श्रृंगारविहीन रहने वाली रामणी भी
    प्रेम मे गुल बहार हो जाती है!!!
    As a kid I heard a folk tale, a women once fell in love with son, when she proposed him, Sun told him if she would come closer to him, the high temperature would burn her to ashes, the stuborn woman, madly used to stare sun all the day, her gaze would rotate in the direction of moving sun, at the end one day, she turned into a flower, the ���� which blooms in the east and whithers in west, facing the direction of the sun!!! #stree #hindi #pod #shabdanchal #hindikavita #shiviwrites
    #hindikavysangam #hindikavysangam #hindiwriter #yoalfaaz #kalamkar #shabdalay @mirakee @mirakeeworld

    Read More

    स्त्री जब प्रेम मे होती है
    (Read the caption)
    ©shivimishra

  • shivimishra 46w

    ना जाने किस मिट्टी की बनी होतीं हैं औरते
    हंसती रहती है, मुस्कुराती रहती हैं
    जाने कौन से गीत गुनगुनाया करती हैं
    सुबह के अलार्म और कुकर की सीटी की लय पे
    चक्करघिन्नी से यहाँ वहाँ नाचा करती हैं।

    ना जाने किस मिट्टी की बनी होतीं हैं औरते
    टिफ़िन नाश्ता लंच की हड़बड़ाहट मे
    ठंडी चाय ठंडी आह के साथ पिया करती हैं
    अपनी नींद अपने सपनों को भूल कर
    पति बच्चो के सपने सींचा करती हैं

    ना जाने किस मिट्टी की बनी होतीं हैं औरते
    वैसे तो ख़ुद की सुध नही लेती
    पर नील चोट के निशानों को अक्सर
    पाउडर के परतों मे छुपाया करती हैं
    दर्द असहनीय हो तो भी
    होंठ भींच कर मुस्कुराया करती हैं

    ना जाने किस मिट्टी की बनी होतीं हैं औरते
    चूल्हे चौके मे अपनी साँसे फूंक देती हैं
    अपनी थाली मे बस बचा खुचा भर कर
    किसी व्यंजन की तरह ही खाया करती हैं
    होम कर देती हैं अपना जीवन परिवार के नाम पर
    एक टुकडा भी अपने नाम का
    कहाँ कभी पाया करती हैं!

    Read More

    ना जाने किस मिट्टी की बनी होतीं हैं औरते
    ©shivimishra

  • shivimishra 46w

    आज अखबार के हर वर्क में कहानी है l
    भूख बिकने लगी ये किस की महरबानी है ll

    दम तोड़ती इंसानियत और हंस रही बेईमानी है
    मुतमइन सी घरों मे बैठी तमाशबीन हुक्मरानी है।।

    मशहूर जिनपे लिखे कविता किस्से कहानी है
    उन आँसुओ की कीमत आज भी बेमानी है!!

    कातिब ने हर दर्द को लिखा फ़कत रूहानी है
    आँखों के अब्र का मर चुका मगर पानी है!!

    ©shivimishra

  • shivimishra 47w

    ना मैं मीरा सी पीर चाहूँ, ना राधा सी प्रीत!
    बस मैं बनना चाहूँ कान्हा तेरी बंशी के गीत!!!
    ©shivimishra