shaabie

Just another woman with words

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  • shaabie 7w

    क्या कीजिये

    खून तो खौला मगर क्या कीजिये,
    एक शब्द भी न फूटा क्या कीजिये।

    सड़क लंबी थी साथ देर तक मिलता,
    आप ट्रैन-पसंद आपका क्या कीजिये।

    सिक्के के तो केवल दो ही चेहरे,
    आपके हज़ारों का क्या कीजिये।

    दीवारों के सदमें हसी से लीप दिए,
    ज़ख़्म-ए-दिल जावेदाँ क्या कीजिये।

    थक के हुईं रवाना महफ़िल मेरी
    छुटे अशआर इनका क्या कीजिये।

    ©शाबी

  • shaabie 11w

    I always struggle to write on oceans and seas. So why not start with writing about not being able to write about oceans?

    #hindi #ocean #sea #hindiwriters @hindiwriters #fish #fisherman #crab #birds #shell #waves #poem #pod #writersnetwork #hindiurdu #river #kavita #sher

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    अब तलक

    कल कलाती नदियाँ निकली कितनी सारी अब तलक,
    निकला नहीं कोई समंदर इस कलम से अब तलक।

    रेती रेती करते करते सब रेती को ही मिल गए,
    वही बंद एक सीपी थी, देखा नहीं किसी ने अब तलक।

    भोर के सुनहरी राहों में डूबे या मछली पकड़े मछुआरा,
    फ़लसफ़े पकड़ने से भला पेट भरा किसी ने अब तलक?

    भरती लहरें, झुलसाती रेत, ऊपर से चील की आँखें तेज़,
    बीच ज़मीन केकड़े मुहाजिर, कैसे खैर मनाये अब तलक?

    वो कैद आवाज़ शंख है 'शाबी', लहरें तो आज़ाद होती है,
    लहरे बटोरे ऐसा कोई पैदा हुआ न इस ज़मीं पे अब तलक।

    - शाबी

  • shaabie 13w

    And one on the summer flowering trees of Delhi that were giving me some major nostalgia.

    @hindiwriters @writersnetwork

    #may #summer #hindi #amaltas #kachnar #palas #january #pod #love #ishq #rain #hindiwriters #dy

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    मई

    बूंदों को जो तरसे मई, तू बारिश की आस होना,
    लूँ परेशां रात काटते इश्क़ में अमलतास होना।

    स्याहि-पन्ने रूठे सभी तो कचनार के सूखे पत्तों पर लिखना,
    लाल गेरु के शब्दों से पहली फुहार की सौंधी मिठास होना।

    छोटी बड़ी ख्वाइशें साँची, जैसे सपने वैसे ढलना,
    टूटी छुटी नींद के तकिये में सेमल का कपास होना।

    कोयलों से हो धुँआ बस, और बुझा सा हो जुनूं 'शाबी',
    फूल से तू उधार लेना शम्मे, बीहड़ में भी पलास होना।

    जनवरी में अब कहाँ ये गुल सारे फिर खिलेंगे,
    आँखों में तू होना मई बाहर चाहे जमी ओस होना।
    ©शाबी

  • shaabie 17w

    Inspired by events - old and fresh.
    On the new drafts and notifications which flood us, one by one, so very often.
    .
    बहुत शुक्रिया @hindiwriters ❤️

    #jungle #hindi #government #forest #rights #notification #law #resistance #people #pod #justice #satire

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    कागज़ नया आया है

    मौसम वही पुराना है, आज कागज़ करारा आया है,
    हुकमी तहज़ीब वही पुरानी है, बस कागज़ नया आया है।

    सफेद कुर्ता खाकी जैकेट और एक तरफ को चिपड़े बाल,
    कागज़ी महकमों का कागज़ी फरमान लिए नौकर नया आया हैं।

    "अरे! बाबू दफ्तरी,  कुछ ही जंगल बाकी हमारे, थोड़ा ही पानी बकाया है",
    "अरे! बिकाऊ है ये सब जो भी बकाया है, तभी तो कागज़ नया आया है।"

    "सोचो ज़रा, जंगल चीर रास्ते होंगे, सफर तुम्हारे सस्ते होंगे,
    नैया तुम्हारी छोटी भैया, काम बड़े करने का वक़्त अब आया  है।"

    "दरख्तों पर दर-ब-दर खुदे आ रहे किस्से, हर शाख का पंछी वाकिफ़ हैं,
    जंगल टूट बनती बस कुर्सियां हैं, और वही से ये कागज़ भी आया है।

    नैया छोटी सही हमारी, बड़े वायदे बस जालसाज़ी हैं,
    जेबें तुम्हारी भर के भारी, हिसाब टिकाने को कागज़ ये आया है।"

    "हाय! इतनी तल्खियां, इस आग-बगावत को ज़रा रखो संभाल,
    ये चंद एकड़ की नुमाइश बस, अभी पहचान आज़माइश का भी कागज़ आया है।"

    ©शाबी

  • shaabie 25w

    Woodwork

    Flex, slash, hurl,
    Faster!
    Flex, slash, hurl.

    Lines are getting longer
    Waiting halls are full,
    Can these heaps of logs,
    Make for enough pyres?

    Chuck a little sandal,
    Add the cow dung,
    Some smokey wet wood,
    And even the stubble,
    Hide the stench,
    Soak the spew,
    And keep this misery,
    In semblance of a bubble.

    So all the kings can merrily assemble,
    And go about in their regular guise.
    Blocked noistrils and smoked up eyes,
    Calloused skin and perforated ears,
    Can sense nothing but praise.

    Hail the King! 
    Long live the king,
    The king will never die.
    Slash harder, hurl faster, my friend!
    As my humans die.

    ©shaabie

    #covid_19 #funeral #pyre #death #king #cremation #coronavirus #frontline #workers #wood #corona #pod #writersnetwork #ceesreposts @writersnetwork @amber_blue @poetryly @pa_luck @moitreyee @allbymyself @odysseus_2
    .....
    As the numbers mount, all our frontline workers, including the less talked about cremation workers, are working round the clock. But is their work being respected?

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    .

  • shaabie 34w

    Rapunzel??

    Nah,

    Quinzel!!



    ©shaabie

  • shaabie 43w

    Loads of stories,
    But only a data point,
    On a large page,
    Dressed in an inch of dust,
    In an even larger file.

    #life #meeting #work #hindi #story #old #women

    #hindiwriters #writersnetwork

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    तकरार

    कुछ उखड़ी ईंटे, थोड़ी उखड़ी लिपाई की दीवार थी,
    पास नदी का शोर था, पर बस सन्नाटे की ही चीख थी।

    ज़मीन ठंडी पड़ी थी, शाम का आखिरी पैगाम था,
    सोच में गुम, वो एकटक ताक़ रही थी अपना घर।

    धूमिल होती रोशनी में भी, आँखे चुप्पी लिए चमक रही थी,
    सूती साड़ी, और झुर्रियों में गुदाई हुई लकीरें साफ़ बोल रही थी।

    चाँद अब लट्टू सा चमक रहा था, पर घर का बंद था,
    मैंने हिचकिचाते हाल पूछा, हल्के से फिर वो फुसफुसाई,

    "तार कटी हैं, दिहाड़ी घर पहुंच नही पाती हैं,
    फ़ैक्ट्री की रोशनी, शाम साढ़े छे के बाद वहीं रह जाती हैं।

    इस बार बारिश ने सितम कम ढहायें, कुछ ईंटे ही उखड़ी है,
    और अभी तार कटी है, शायद अगले सावन नदी घर ही काट ले जायें",

    इतना बोल वो फिर ताक़ने लगी अपना घर।

    उसकि एकटक नज़रो की थी ज़बान-ए-कहानीकार,
    मेरी नज़रें तमाशबीन, अनचाहे भी किस्से बटोरने की गुनहगार।

    पाँच मिनिट की मुलाक़ात, पन्नो में कैद ये बात,
    दफ़्तर दफ़्तर घूम रही बस, बड़ी सी फाइल में एक छोटी सी तकरार।

    ©शाबी

  • shaabie 53w

    The places I have lived at,
    Live in me.
    .
    .

    This is an older one, but more relevant during these times- when the boundaries of what defines home are blurred. Is it where your work is, is it where your family is, is it where beloved stays, or is it where you are "caught up" right now? Probably, all of them? ��
    #hindi #ghar #home @hindiwriters @hindikavyasangam

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    घर

    शायद, वो चार दीवार,
    वो कवेलू की छत,
    हर जगह ही थी।
    शायद, वो घर का बिस्तर,
    अपना सा वो कोना,
    हर जगह ही था।
    शायद, वो ताक झाक करती,
    पत्तियों से छन के आती किरणें,
    और साथ देती शाखों की छाया,
    हर जगह ही थी।

    शायद, जिस जगह मैंने सांसे भरी,
    जिस जगह पाँव दीदार को ठहरे,
    हर उस जगह मैंने घर बसा लिया।

    शायद पूरा न सही,
    थोड़ा थोड़ा दिल,
    हर जगह दे दिया,
    थोड़ा थोड़ा घर,
    हर जगह बसा लिया।

    ©शाबी

  • shaabie 59w

    है भी और नहीं भी

    बहुत रोज़ गुज़रे अब इन मुलाकातों को, कोई अंजाम नहीं,
    इन मुलाकातों को भुलाने की हसरत मुझमें, है भी और नहीं भी।

    दिललगी समझ नकारा जाएं, ये कोई लतीफ़ा नहीं,
    पर अभी ये लक़ीर इतनी गेहरी, है भी और नहीं भी।

    अपनी रातों की बरबादी का यू जश्न मनायें, ये जायज़ नहीं,
    ये कलि कमबख्त मगर खिल रही, है भी और नहीं भी।

    तेरी हस्ती आँखों में ऐसी तराश ली है मैंने, अब तू उतना भी ज़रूरी नहीं,
    बिल्कुल जैसे हस्ती "शाबी" की, जिसकी ज़रूरत है भी और नहीं भी।

    ©शाबी

  • shaabie 65w

    मेरी गलती थी

    ख़्वाब बुनने की दुनिया में, बस रफू की आस थी,
    ज़रकारी के दुनिया में सादे मलमल की उम्मीद करना मेरी गलती थी।


    मोती जड़े लफ़्ज़ों में, चंद बूटियों की तलाश थी,
    मीनाकारी के आँचल में अमियों के छापे खोजना मेरी गलती थी।


    रंगाई के सब रंग खुशनुमा, दुपट्टे में बस एक रंग की दरख़्वास्त थी,
    पक्के दमकते रंगों में कच्चे फ़िरोज़ी की जिद्द करना मेरी गलती थी।

    ©शाबी