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Charudatta Kelkar - a humble servant of words

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    रंग

    इंसान देखता है कई रंग ज़िंदगी के
    कभी ग़म कभी खुशी के

    खुशियाँ कभी बरसती, लहरें कभी हैं ग़म की
    कभी नूर है मेहर का, कभी रात है सितम की
    सुर्खी हो या सियाही ये रंग हैं इसी के

    नफरत हो या मोहब्बत, हो टीस या चुभन हो
    धोखा हो या वफा हो, हो उन्स या जलन हो
    हर रंग में रंगे हैं जज़्बात हर किसी के

    इंसानियत के रंग में, ढल जाएँ हम सभी जो
    शिकवे गिले भुलाकर, मिल जाएँ हम सभी जो
    प्यार और अमन के रंग में, रंग जाएँ दिल सभी के
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    रंग

    बेरंग मेरी दुनिया, रंगों से सजाई है
    उम्मीद बुझे दिल में तूने ही जगाई है

    इक रेत की आँधी में उजड़ी थी मेरी बगिया
    तूफान उठा था इक बिखरी थी मेरी दुनिया
    वीरान बयाबाँ में खुशियाँ अब छाई हैं

    त्योहार है रंगों का, रंग दे तू मुझे प्रीतम
    बाहों में ज़रा अपनी भर ले तू मुझे प्रीतम
    रुखसारों की वो सुर्खी अब लौट के आई है

    इक दूजे के रंग में हम रंग जाएँ चलो दिलबर
    हर ग़म को भुला दें हम तारों में बसें चलकर
    होली अब खुशियों की सौगात जो लाई है

    कुछ और करीब आओ, लग जाओ गले दिलबर
    सुर्खी मेरी ले लो कुछ, होठों को मेरे छू कर
    आँखों में तेरी मुझको जन्नत नज़र आई है
    ©servant_of_words_csk2

  • servant_of_words_csk2 149w

    @writerstolli #writerstolli @hindiwriters #hindi #holihai_wt #mirakee

    ��इसे केवल एक रचना की दृष्टि से देखें ��

    है ठोकर हर कदम पर क्यों जहाँ इतने सहारे हैं
    चराग़-ए-दिल बुझा है क्यों फलक पे तो सितारे हैं

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    वहाँ है जश्न रंगों का यहाँ ग़म की सियाही है
    सनम की बेवफाई से मची दिल में तबाही है
    बयाबाँ में झुलसता हूँ न साया और न रहबर है

    मुकद्दर

    ये तन्हा ज़िंदगी मेरी उदासी का ही मंज़र है
    न साथी है न मंज़िल है यही मेरा मुकद्दर है

    है ठोकर हर कदम पर क्यों जहाँ इतने सहारे हैं
    चराग़-ए-दिल बुझा है क्यों फलक पे तो सितारे हैं
    कहीं खुशियों के मेले हैं यहाँ ग़म का समंदर है

    कभी जिनकी परस्तिश की, नहीं अब वो पनाहों में
    वफा का है दिया तोहफा, वो हैं गैरों की बाहों में
    लबों पे मुस्कराहट है, नज़र में तेज़ खंजर है
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    "He's Literally Begun to Dance Attendance On Her"

    Suave, sophisticated and soft spoken, he was known for his punctuality and professional competence. His colleagues loved him and his seniors genuinely appreciated him. Indeed a perfectionist he was... He was charming without a shred of doubt but a womaniser he wasn't.
    One of his female colleagues who had recently got married would openly say that she had married a bit too early...
    And then he was joined by a fresher, a girl who had just completed her master's from a noted "B" school. She was to assist him in a certain project and they were supposed to spend a lot of time together... She had barely spent a month in the office when they were assigned the task. She didn't talk much in working hours, in fact she would always keep to herself.

    But he realised that he had misjudged her... She loved to talk a lot and she had been gifted with a silver tongue. And before he realised it, he had fallen into her silver trap... When they worked on the project, he was the boss and she was his subordinate, but there were times and places where their roles would be reversed...
    They mostly worked outdoors, and needed frequent refreshments. At certain cafes, there would be no table service. She would relax in her chair and he would fetch her snacks and beverages... She lived at her uncle's, and it was a good 15 kilometres from his flat, but he would drive her home every day... She loved coconut water and it would be a 10 minute-drive to the nearest vendor. None of these developments escaped the attention of some of his hawk-eyed colleagues. "He has literally begun to dance attendance on her!" gossiped they...
    No, she wasn't a gold digger... She was a girl with immense potential who believed in self-reliance...Nor did she try to exploit him in any which way, but he pampered her... And who doesn't like to be pampered?
    One fine day(just after they had successfully completed their project) they announced that they were going to be engaged.
    "And let me tell you guys, she's the most fascinating person I have ever met in my life." he added.
    "The feeling is mutual. " she said.
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    @writerstolli #writerstolli # @hindiwriters #hindi


    AFTERMATH

    (ये दो अंतरे (caption) आपके एक 2-liner से प्रेरित हैं :
    @roothi_kalam ) As you have mentioned in your post, love can't be "deliberate", it's supposed to be a natural feeling... but what if it becomes a habit?... And then all of a sudden your love-life takes a crooked turn... You're deprived of it... (But... By then you've got addicted to it... )

    आदत जो बनी उल्फत
    तन्हाई ये चुभती है
    वो इश्क की शम्मा अब
    हर पल ही सुलगती है
    न सुकून है अब दिल को
    न तो चैन रहा यारो

    तन्हाई के आलम में
    कुछ इश्क ही कर लूँ मैं
    खाली हैं गली दिल की
    इसको क्यों न भर लूँ मैं
    दस्तूर मोहब्बत का
    कुछ ऐसा बना यारो

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    Ecstasy and Agony

    Ecstasy and Agony

    तन्हा ही चला था मैं
    तुम साथ चले आए
    और साथ हसीं से कुछ
    जज़्बात चले आए

    फिर प्यार हमारा जब
    परवान चढ़ा जानम
    महका मेरा हर लम्हा
    साये में तेरे हमदम
    साये में तेरे हमदम
    खुशियों का लिए तोहफा
    दिनरात चले आए

    फिर से हूँ अकेला बस
    यादों का सहारा है
    नज़रों का मेरी अब तो
    ना कोई नज़ारा है
    ना कोई नज़ारा है
    नज़राना लिए ग़म का
    हालात चले आए

    AFTERMATH

    आदत जो बनी उल्फत
    तन्हाई ये चुभती है
    वो इश्क की शम्मा अब
    हर पल ही सुलगती है
    न सुकून है अब दिल को
    न तो चैन रहा यारो

    तन्हाई के आलम में
    कुछ इश्क ही कर लूँ मैं
    खाली हैं गली दिल की
    इसको क्यों न भर लूँ मैं
    दस्तूर मोहब्बत का
    कुछ ऐसा बना यारो

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    @writerstolli #writerstolli @hindiwriters #hindi


    अभागन (revised) (A girl who has to nip her love in the bud)

    असबाब - सामान, चीज़ें (goods), आहन - iron
    आहन - लोहा, मुजस्समा - statue

    अभागन

    शहनाई नहीं ये, मेरी तबाही की पुकार है
    साज़ नहीं है ये, मेरी बर्बादी की झंकार है-
    क्या गुनाह किया मैंने जो मोहब्बत की
    क्या कोई पाप किया, कोई जुर्रत की-
    मेरे प्यार से क्यों आपने नफरत की
    बेटी को असबाब समझ ये तिजारत की-

    आप दोनों ने बहुत प्यार दिया है मुझे
    कितना सुख, कितना दुलार दिया है मुझे-
    मेरी खुशी में ही अपनी खुशी देखी हैं
    मेरी मुस्कान में ही अपनी हँसी देखी है-
    आपके ही साये में पलकर बड़ी हुई
    नन्ही थी, अब अपने पैरोंपर खड़ी हुई-
    आप ही ने उँगली थामकर चलना सिखाया
    मेरे आँसू पोंछे, मुस्कराना सिखाया-
    मज़बूत किए हैं आप ही ने हाथ मेरे
    पग-पगपर चले आप दोनों साथ मेरे

    इस छोटे से जिस्म में एक नाजुक सा दिल है
    इस मोम से पुर्जे को संभालना मुश्किल है-
    इस नाज़ुक दिल की इक खूबसूरत मंज़िल है
    इस कागज़की कश्ती का भी कोई साहिल है

    प्यार का वो खूबसूरत अहसास मुझे भी हुआ
    जब उसने करीब आकर इस दिल को छुआ-
    मेरी ज़िंदगी का हर लम्हा खुशनुमा हुआ
    अरमाँ मचलने लगे, हुई दिल की उमंगें जवाँ

    मजबूर तो मुझे कर दिया है आपकी दीवारों ने
    इन आहन की सलाखों ने, सर्द-बेदर्द ज़ंजीरों ने-
    अपने प्यार को रौंद रही हूँ आपकी खातिर
    अपने जज़्बात कुचल रही हूँ आपकी खातिर-
    मैं भी एक मुजरिम हूँ किसी का दिल तोड़ा है
    मजबूरी में ही सही, सफर में तनहा छोड़ा है-
    चाहने पर भी खुद को मिटा नहीं सकती
    एक और पाप का बोझ उठा नहीं सकती-
    डोली में मैं नहीं, इक मुजस्समा होगा
    रूह पत्थर की होगी, दिल नदारद होगा

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    अभागन(Read in Caption)


    अपने प्यार को रौंद रही हूँ आपकी खातिर
    अपने जज़्बात कुचल रही हूँ आपकी खातिर-
    मैं भी एक मुजरिम हूँ किसी का दिल तोड़ा है
    मजबूरी में ही सही, सफर में तनहा छोड़ा है-
    चाहने पर भी खुद को मिटा नहीं सकती
    एक और पाप का बोझ उठा नहीं सकती-
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    @writerstolli #writerstolli @hindiwriters #hindi

    अहबाब - दोस्त

    �� This is a light-hearted composition. It is not meant to be taken seriously. I don't subscribe to the views expressed in it. ��

    �� यह केवल एक हास्य-रचना है। इसे गंभीरता से न लें।
    यह मेरे व्यक्तिगत विचार नहीं हैं। ��
    (Charudatta Kelkar)

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    जाम

    जाम

    अब तो मैखानों में ही शाम हर गुज़रती है
    जाम टकराते हैं महफिल भी सजी रहती है

    है मुबारक ये मय भी चीज़ बडी मान भी लो
    ग़म भुलाने की दवा है ये हसीं जान भी लो

    जाने क्यों इसको ज़माने ने है बदनाम किया
    है मुकद्दस ये आब जाहिलों पहचान भी लो

    होंठ छूती है पहले दिल में फिर उतरती है
    राजा और रंक में ये फर्क नहीं करती है
    जाम टकराते हैं...

    बेवफा हुस्न हुआ शीशे का दिल तोड़ गया
    मेरा हमराह मुझे बीच सफर छोड़ गया

    ग़म भुलाने के लिए जाम सा अहबाब मिला
    इसका एहसान न लफ़्जों में कभी होगा बयाँ

    इसकी इक बूँद भी हलक से जो उतरती है
    ग़मज़दा रूहों में यारों हँसी बिखरती है
    जाम टकराते हैं...
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    @writerstolli #writerstolli #mirakee

    N. B. : Mirakee is a platform for creative souls. . The "social sites" referrred to in this post do not include Mirakee. Only those sites where the emphasis is on sharing photos, videos or certain real life(शोबाज़ी) activities etc. have been taken into consideration.

    Some of the facts mentioned in the article are my own observations. I have also culled imformation from various sources which include books, magazines and the internet.

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    Social Media Depression

    While it's true that this is not an "official" (or recognized/approved) medical condition, no one can dispute its existence. Obviously, psychiatrists or clinical psychologists haven't come up with a comprehensive definition of Social Media Depression. Social media is a potent instrument. It is incredibly fast and effective. It enables us to connect with scores of people - known and unknown. We can communicate with several people invariably at the same time...
    We come across a number of strangers and get to read and watch their "posts." The more one suberges oneself into it, the more addictive it gets.
    It is noteworthy that we get to know what some of these people show us and what they want us to know about them. We have no way to find out what they hide from us(and that shouldn't be our concern). Usually, we get to see the bright(er) side of their life(there are rare exceptions). We get to know about their outings, their parties and celebrations, their restaurant visits and any other activity that they wish to make public.
    They succeed in creating a general impression among the viewers that their life is absolutely trouble-free (and they're living life to the fullest). A few viewers start developing a negative self-image after watching these "HAPPY" souls for a sustained period. They are led to believe that their own life is devoid of enjoyment and they're being "left out." In fact, they actually start believing that they're the only ones afflicted.
    All of us have heard the question, " How come his/her dress is brighter than my dress? " It assumes various forms and begins to haunt us.
    Those who mislead others may be responsible for this to some extent( but it's their life and it's their prerogative to decide what to share and what to conceal), but those who develop a negative self-image of themselves are the ones to blame. This is a kind of digital or virtual(but it's real) inferiority complex.
    After you are registered on a site, you start following certain people or pages. You're also followed by some (Sportspersons, media houses, entertainers, politicians and other celebrities have their own pages and their fan following is in millions. These personalities are not part of our discussion).
    Slowly, but surely, some(or many?) members start comparing themselves with others. Their focus is on increasing the number of their followers by presenting their best photos, videos or ideas/thoughts. There are also a select few who come up with something sensational to gain publicity and become "popular" overnight. Here, it is pertinent to mention some "un-asked" questions:
    1. How many followers do I have?
    2. How many people/pages do I follow?(They are also led into believing that the larger the deficit between the number of their followers and that of those followed by them, the greater the "achievement")
    3. How many likes do I usually get for my posts?
    4. What type of comments and compliments do I normally get?

    When they actually start believing that their ability and potential are defined by the number of their followers or the number of likes and comments fetched by their posts, be sure they have entered an invisible race.
    When their growth/progress(?) doesn't match their expectations, a complex(as mentioned earlier) develops.
    Who falls prey to this? Is it the excessive use of social media that leads to this? Do only "those "vulnerable" individuals who have a natural inclination towards depression" suffer?
    These individuals refuse to believe that nobody is trouble-free or problem-free. They refuse to admit that the problems that they face in their life are faced by others(the intensity/magnitude may vary) too. Their low self-esteem can become a cause for concern.
    Actually social media is a powerful tool that enables us to stay connected with the rest of the world. It has no age barriers. It's the quickest and the most effective medium for expression and exchange of ideas/thoughts.
    ☺ Using social media can be a refreshing and rejuvenating experience. Moderation is the key. It becomes toxic and venomous when one starts linking one's personal life and digital/virtual life. The problem assumes dangerous proportions when one actually starts living an "independent" digital life.
    Possible consequences?
    Some of the possible consequences of taking one's virtual life a bit too seriously are :
    1.Moving away(mentally) from those who actually matter in one's daily life
    2.Not communicating enough at home or at one's workplace(simply...NOT BEING THERE)
    3.Getting upset because of certain things that happen in one's virtual life(this is an independent topic which needs to be covered separately)

    Remedies?
    Ways to minimize one's involvement with social media
    1. Using social media in moderation even if on a regular basis(Though it's not obligatory to use it, it should be used in moderation if it's inevitable)
    2.Staying active on only 1 or 2(it will never end if you say... Okay, just one more...) social sites
    3. Devoting enough/more time to sports and indoor/outdoor recreational activities. This would depend a great deal upon one's age, inclination and fitness level
    4.Watching something "worthwhile" on small screen or on the web(again it may differ from person to person)
    5. Reading books and periodicals
    5. Spending more time with one's family members and friends/acquaintances
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    @writerstolli_ #writerstolli #marathi

    @shubhangiokhade @jyotibonge @raaj_kalam_ka @baat_kalam_ki
    @dhanashreeparab16 @pallavi_b @lavanya_nukavarapu
    @_suruchi_ @sharmee_m


    वही तुम थे, वही मैं थी, हमारे मिलने की जगह तय थी - I
    बेचैन हो उठता था जब दिल तुम्हारे इंतज़ार में
    लम्हा लम्हा लगता था सदियों सा लंबा प्यार में - I
    नन्हा सा एक फूल भी तोहफे में लेकर आते
    पलभर में ढेर सारी खुशियाँ तुम दे जाते - I
    न भूख थी दौलत की, न चाह थी शोहरत की
    दरकार थी दिल को बस बेपनाह मोहब्बत की - I
    आशियाने के लिए तिनका तिनका चुन रही थी
    अरमानों के धागों से सुनहरे ख्वाब बुन रही थी - I

    आँधी कुछ ऐसी उठी, ख्वाबोंकी लड़ियाँ बिखर गई
    बहाकर तिनकों को ले वह दर्दनाक लहर गई - I
    कैसी दरार आई दिलों में, कैसे घुला ज़हर
    क्या था कसूर मेरा, टूट पड़ा क्यों कहर - I
    आवाज़ मेरी तुम्हारे कानों तक पहुँच नहीं पाई
    जानलेवा वह खामोशी पैग़ाम तुम्हारा ले आई - I
    बरसों बाद आज मुकद्दर उसी जगह ले आया है
    ज़र्रा तक नहीं मोहब्बत का, अब तो मातम छाया है - I
    कुचले हुए जज़्बात हैं, बिखरे हुए अरमान हैं
    दिल तो तबाह हो चुका है, कहने को बाकी जान है - i

    English

    It was the same you and the same me,
    and fixed was the spot where we would meet...
    Waiting for you, my heart would grow restless..
    Each moment I spent waiting would feel like ages...
    Just a flower from you, however small, would fill me with loads of happiness in a jiffy...
    Neither wealth nor fame did I crave
    and just wanted all the love you gave...
    Gathering straw I was for our abode
    Weaving golden dreams with the threads of desires...
    A terrible storm rose and snapped the pearl-strings of our dreams
    A dreadful wave swept the straw away...
    A gaping chasm, filled with poison, split us..
    What had I done to deserve this fate?
    My voice didn't reach your ears, and your lethal silence conveyed your message...
    Years later, destiny has brought me to the same place
    Not a speck of love around, it's a doleful mess...
    Amidst Crushed emotions and Scattered desires,
    The heart stands devastated, the body barely lives

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    चिंधड्या (Marathi)

    चिंधड्या(This is the Marathi version of one of my recent postsYou may choose to ignore it if you have already gone through the English and Hindi posts)

    तोच तू होतास आणि तीच मी होते
    भेटण्याचे स्थानही ठरलेले होते-
    कधीकधी तुझी प्रतीक्षा करत मी बेचैन होत असे
    एक एक क्षण युगायुगासारखा भासत असे-
    तुझ्या हातात छोटं फूल पाहूनही सुखावत असे
    क्षणार्धात आयुष्यभराचा आनंद मिळत असे-
    न प्रसिद्धीचा लोभ न हाव चांदी सोन्याची
    मनी फक्त आकांक्षा तुझी राणी होण्याची-
    घरासाठी काडी काडी वेचत-निवडत होते
    आकांक्षांच्या धाग्यांनी सोनेरी स्वप्नं विणत होते

    असं भयानक वादळ आलं, स्वप्नं सारी विखरून गेली
    विनाशकारी लाटेसरशी काडी-काडी वाहून गेली-
    खाई आली मनांमध्ये, कोठून ही गरळ पडली
    काय होता प्रमाद माझा, का अशी वीज कोसळली-
    माझं रुदन काही तुझ्या कानापर्यंत पोचलं नाही
    माझ्या आर्त स्वरांनीही तुझं पाऊल थांबलं नाही-
    माझ्या विनवण्या, माझी आर्जवं हवेतच विरून गेली
    तुझी जीवघेणी निःशब्दताच तुझा संदेश देऊन गेली-
    कित्येक वर्षांनी आज नशीब त्याच ठिकाणी घेऊन आलंय
    प्रेमाचा गंध ही नाही इथं, उदासीचं साम्राज्य पसरलंय-
    तुडवलेल्या भावना आहेत, विखुरलेल्या आकांक्षा आहेत
    नावाला प्राण बाकी आहेत, मनाच्या चिंधड्या झालेल्या आहेत
    ©servant_of_words_csk2

  • servant_of_words_csk2 150w

    बूढ़ा दरख़्त (an old tree)

    कभी जवाँ रह चुका हूँ,
    अब ज़ईफ हो चुका हूँ

    मायूस हूँ, मजबूर हूँ,
    बहारों से कोसो दूर हूँ

    सूखी टहनियाँ कराहती हैं वहाँ
    कभी ममता की छाँव थी जहाँ

    अब वो घना साया कहाँ
    बस कंकाल ही बाकी रहा

    पत्तों का संग नहीं,
    फूलों की महक नहीं
    कलियों के रंग नहीं,
    चिड़ियों की चहक नहीं-

    अब तो इंतज़ार है,
    कुदरत के कहर का
    जला दे जो जड़ों को,
    ऐसे किसी ज़हर का
    ©servant_of_words_csk2