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  • scintillating_shikha 51w

    हर दिन के साथ मेरी ख्वाहिशें रोज परवान चढ़ती है,
    अरमान है दिल में बहुत मगर हर शाम मोम की तरह जिंदगी ढलती है।


    शिखा सिंह ' प्रज्ञा '✍️

  • scintillating_shikha 51w



    मेरे ख्वाबों के फूल खिलते गए,
    धीरे-धीरे हम उनसे मिलते गए।

    एक राह है, सौ बातें थी,
    बस ऐसी हमारी मुलाकातें थी,
    उनका हंसना हंस के सताना मुझे,
    है रुलाकर उनका मनाना मुझे,
    वो धीरे-धीरे मुझसे जुड़ते गए,
    मेरे ख्वाबों के फूल खिलते गए।

    एक रात रही , कई वादे सही,
    कुछ ऐसी जुड़ी उनसे जज़्बातें रही,
    उनका कहना कहकर भूलना मुझे,
    संग बुलाकर उनका बैठना मुझे,
    देखकर उनको हम संभलते गए,
    मेरे ख्वाबों के फूल खिलते गए।

    शिखा सिंह ' प्रज्ञा '

  • scintillating_shikha 52w

    ग़ज़ल

    एकतरफा मोहब्बत का इज़हार कर लिया,
    हमने भी आज उनसे फिर प्यार कर लिया।

    वो कहते रहे तेरे पास ना आयेंगे,
    बिना कहे उनके हमने इक़रार कर लिया।

    छुपी ख़ामोशी जो उनके चेहरे पर थी,
    मत पूछो कैसे उनपे ऎतबार कर लिया।

    एक सिकन माथे पे ना हमने आने दिया,
    खुदी को चुपचाप मैंने तैयार कर लिया।

    कोई शिकायत नहीं की कभी मैंने उनसे,
    हमने अपनी जिंदगी को बेकार कर लिया।

    गम की चादर ताने यूं हम सोते रहे,
    ये गुनाह प्रज्ञा फिर से एक़बार कर लिया।

    शिखा सिंह ' प्रज्ञा '

  • scintillating_shikha 52w

    ग़ज़ल

    ये रूह जिस्म से अब निकलना चाहती है,
    तू साथ दे बाहों में पिघलना चाहती है।

    यूं तो शिक़ायत नहीं है मुझे जिंदगी से,
    पर ये आज बस तन्हा जलना चाहती है।

    कोई दरिया का समंदर तो बह जाए आज,
    ये आँखें आज फिर से बहलना चाहती है।

    मालूम नहीं क्या ख़लिश है जिंदगी में, हर बंदिश आज फिर सम्हलना चाहती है।

    खूब कहा किसी ने कि जाना सबको एकदिन,
    हर रंजिश तेरे साथ टहलना चाहती है।

    मेरे ख़्वाबों का दिया भी बुझ सा रहा है,
    ये बस एकबार "प्रज्ञा" मिलना चाहती है।।

    शिखा सिंह ' प्रज्ञा '

  • scintillating_shikha 55w

    दर्द के मुशायरा पर मुस्कुराना मना है,
    दर्दे- गम में तड़पकर घबरा जाना मना है।

    इश्क़ के राह में तेरा बच पाना मना है,
    अजनबी के वार से संभल पाना मना है।

    आशिक के गुरूर में झुक जाना मना है,
    मुज़रिम बनकर इश्क में ठहरना मना है।

    गुज़ारिश में इश्क के सोंचना मना है,
    महबूब की गलियों में झुकना मना है।

    खूबसूरती की तारीफ़ में डरना मना है,
    इल्म़ ना हो नजरों का तो देखना मना है।

    खामोशी भर निगाहों से चाहना मना है,
    हुकूमत दिल पर है जब यूं छोड़ना मना है।

    शिखा सिंह
    ©scintillating_shikha

  • scintillating_shikha 55w



    मेरे चांद सा रौशन चेहरे का
    मुस्कान सा साथी बन जा रेे..

    नयन भर तुझको देखूं मेरी
    पहचान सा साथी बन जा रे..

    प्रेम बेला की उपवन सा तू
    मेरे हृदय में खिल जा रे...

    साथ निभाऊं सात जनम मेरे
    साथ ही साथी रह जा रे..

    मेरे चांद सा रौशन चेहरे का
    मुस्कान सा साथी बन जा रे..

    ख्वाब देखूं दिन - रात तेरा मैं
    मेरे नाम सा साथी जुड़ जा रे..

    है श्याम सा रंग तेरा
    राधा सा मुझको रंग जा रे..

    बैठ प्रेम की छयियां में बंसी
    तू भी बजा जा रे..

    छेड़ के मन का तार मेरे
    मेरी गीतों में साथी समा जा रे..

    मेरे चांद सा रौशन चेहरे का
    मुस्कान सा साथी बन जा रे।।

    शिखा सिंह

  • scintillating_shikha 55w

    हां मैं बदल गई हूं✍️


    हां मैं बदल गई हूं,

    क्यूंकि तुम्हारे चेहरे पर चढ़े

    नकाब के पीछे के इंसान को पहचान गई हूं..।


    हां मैं बदल गई हूं,

    क्यूंकि तुम्हारे चेहरे पर दिख रहे झूठे

    मुस्कान के पीछे के राज को जान गई हूं..।


    हां मैं बदल गई हूं,

    क्यूंकि तुम्हारे दिल बहलाने वाले मीठी

    बातों के पीछे के सच्चाई को समझ गई हूं..।


    हां मैं बदल गई हूं,

    क्यूंकि तुम्हारे आँखों में जो मुझे नोच लेने

    की गन्दी चाह छुपी है ,उस चाह को जान गई हूं..।


     तुम्हारे धोखे और ढोंग भरे दिलोशों

    के माया जाल में अब नही आती

    शायद इसलिए मैं बदल गई हूं...।


    हां तुम सही हो मैं बदल गई हूं,

    क्यूंकि तुम्हारे गन्दे इरादों को 

    तुमसे ज्यादा मैं समझ गई हूं..।


    तुम्हारे झूठी प्रशंसा के

    पीछे छिपे हर इरादे को भांप गई हूं,

    शायद इसलिए आज मैं बदल गई हूं...।


    हां मैं बदल गई हूं,

    क्यूंकि एक लड़की होने का 

    मतलब मैं बखूबी समझ गई हूं,

    कल तक जो थी एक मासूम गुड़िया

    आज मैं बड़ी हो गई हूं,

    कैसे रहना है तुमसे बचकर

    उस बचाओ को सीख गई हूं,

    इसलिए मैं बदल गई हूं

    हां ये सच है, मैं बदल गई हूं...।


    शिखा सिंह

  • scintillating_shikha 55w

    जिंदगी रहस्य है


    तुझे समझते-समझते ऐ जिंदगी,
    हैरान हूँ मैं, क्या कहूँ कितनी परेशान हूँ मैं।
    यूँ तो सिखाया तूने मुझे,
    हर बार गिर कर चलना,
    फिर भी रहस्य है, तू मेरे लिए।
    यूँ तो दे जाती है तू,
    हर बार एक नयी सीख मुझे,
    फिर भी अनजान हूँ, मैं तुझसे अभी।
    हर बार नए रंग दिखाती है,
    टूट जाऊँ अगर मैं खुद से,
    मुझे मुझसे फिर से मिलाती है,
    रुलाते-रुलाते तू मुझे,
    खुश रहने की कोई वजह दे जाती है,
    मेरे चेहरे पर रोज नए फूल खिलाती है।
    हाँ जी तो लिया तुझे कितने साल,
    पर अब भी तू मेरे लिए रहस्य बन जाती है।।

    शिखा सिंह

  • scintillating_shikha 55w

    फिर ना आऊंगी

    एक पल में बिखर गई मैं
    सपने सारे चुर हो गए
    मैं आज एक दरिंदे के आगे मजबुर हो गई
    जिसको जाना था डोली में बापू के घर से
    आज जा रही वो कफन में बंध कर

    कहां गया वो कानून अब
    जो लड़ने लिए कहता था
    लड़कियों के लिए
    कहां गए अब वो रक्षक
    जो मेरे आबरू बचाने के लिए
    लांखो वादें करते थे

    कहां गए वो लोग अब
    जो लड़कियों की रक्षा
    की बाते करते थे।


    मैं तो नन्ही बच्ची थी,
    मुझे भी ना छोड़ा दरिंदो ने
    मेरे साथ तो हैवानियत की
    हदे पार कर दी सरियों से मारा मुझे
    टूट गई मेरी भी सांस
    हार गई मैं जीवन की जंग
    मुझे तो जला जिंदा जला दिया उन्होंने
    करना चाहती थी बेजुबान जानवरों
    की सेवा मुझे ही बेजुबान कर दिया उन्होंने,
    उन्होंने मुझे तो शर्मसार किया
    ना छोड़ा मेरे प्रिय जनों को
    कट गई ये जीभ
    बोल भी ना पाई मैं
    दबा दिया मेरा गर्दन दरिंदो ने
    रीढ़ की हड्डी भी ना रही मेरी
    छोड़ दिया मुझे खेत में
    तड़पती रही मैं लाचार
    पैर तोड़ा पीठ भी
    बेहोशी की दवा दि
    मरता हुआ
    छोड़ गए मेरे घर के आगे
    कहती रही मां मुझे बचा लो..।

    सांस कुछ पल की थी बस
    टूट गया मेरा दम
    मानवता को शर्मशार करके भी
    खड़े है सब सिना ताने
    अब ना आऊंगी इस जग में
    बसते नहीं यहां इंसान
    कह दूंगी उस रब से जाके
    फिर बनाना ना मुझे एक नन्ही जान..।

    Shikha singh✍️

  • scintillating_shikha 56w



    तुम भी बेटी मैं भी बेटी
    कहां जाऊं इस संसार को छोड़कर,
    छुप जाऊं मां की गोद में,
    या बैठ जाऊं छिप के
    पापा के पीछे,
    ना देख ले ये संसार हमे
    बैठ जाऊं अपने घर में छिपकर..

    बिटिया जन्म लिया था,
    तब तो पूजा हमे देवी की तरह,
    देवी कहकर पूजने वाले
    आज हमें ही नोचना चाहे..

    मनीषा,निर्भया या कहूं
    तुम्हे शिखा मैं ,
    तुम भी बेटी मैं भी बेटी
    कहां जाऊं इस संसार को छोड़कर..

    कौन सुनेगा हमारा दर्द,
    किससे कहूं हमें न्याय देदो,
    सरकार से कहूं या कहूं
    उस मां को जिन्होंने जन्म
    दिया ऐसे पुत्रों को,
    या उस ईश्वर को कहूं
    जिन्होंने बिटिया का जन्म दिया हमे...


    तुम भी बेटी मैं भी बेटी
    कहां जाऊं इस संसार को छोड़कर,
    तुम तो चली गई बहना
    अपने दर्द लिए आँखों में,
    तड़पती मां का आंचल
    पुकारे बेटी तुम कहां हो,
    पिता की आँखें ढूंढे है
    बेटी तुम कहां हो..,

    तुम भी बेटी मैं भी बेटी
    कहां जाऊं इस संसार को छोड़कर।।

    Shikha singh✍️