saroj_gupta

मेरी कलम से✍️.....

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  • saroj_gupta 2w

    @anita_sudhir didi ����

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    दीदी अनिता

    गरिमामयी व्यक्तित्व से,करती हमेशा दंग हैं ।
    गागर में सागर वो भरें, भावों की निर्मल गंग हैं ।।
    हैं कलम की वो धनी,सारी विधा में दक्ष हैं ।
    दीदी अनीता वो मेरी, परिवार की वो यक्ष हैं ।।
    दीदी नहीं इक शब्द है,ममता का इक पर्याय ये ।
    लेखनी से है जुड़ा,अद्भुत सा इक अध्याय ये ।।
    मनभावनी व्यक्तित्व है,रस छंद की इक धार हैं ।
    दीदी हैं सबकी प्यारी वो, परिवार की आधार हैं ।।
    ये जन्मदिन शुभकामना, स्वीकार करिए आप अब ।
    अनुजा बधाई दे रही, करिए नमन स्वीकार अब ।।
    ©saroj_gupta

  • saroj_gupta 4w

    पुत्रियों पर तो बहुत से लेख और कविताएँ पढ़ने को मिलती हैं,परंतु पुत्र पर या पुरुष पर बहुत कम लेखन दिखाई देता है,मैने पुत्रों के लिए कुछ लिखने का प्रयास किया है, बहुत दिनों बाद कुछ लिखना हुआ यदि कहीं कुछ त्रुटि हुई हो तो अवश्य इंगित करिएगा ��☺

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    पुत्र

    पुत्र के भी वेदना को जानिए,
    कष्ट होता है उसे भी मानिए ।
    मन में चिंतन भाव लेकर वो रहे
    घावों को उसके भी तो पहचानिए ।।

    यदि इन्हें हम इक उचित आकार दें,
    प्रेम औ....कर्तव्य के संस्कार दें ।
    राष्ट्र के आदर्श नायक ये बनेंगे
    यदि उचित मूल्यों भरा परिवार दें ।।

    उत्तराधिकारी यदी वो पितृ का,
    साथ में बोझा लिया दायित्व का ।
    निर्वहन करने की खातिर वो चला
    छोड़ कर सुख गेह औ अपनत्व का ।।

    ग्रीष्म, वर्षा, शीत सह हर वेष में,
    प्रेषित न कर वो दुख किसी संदेश में ।
    बस दिखाता है खुशी हर रोज अपनी
    चाहे दुख लाखों सहे परदेश में ।।

    भाई है वो बहना का पहरेदार बन कर,
    बेटा है वो माँ बाप का पतवार बन कर ।
    जब देश के हित में चला लड़ने लड़ाई
    माँ भारती का इक सिपहसालार बन कर ।।

    होते नहीं हैं पुत्र सारे व्याभिचारी,
    ये भी होते हैं....बड़े ही संस्कारी ।
    क्यूँ भला थोंपे सदा हम दोष इन पर
    इनको गढ़ना है हमारी जिम्मेदारी ।।
    ©saroj_gupta

  • saroj_gupta 4w

    प्रिय बहन दीप्ति जी को जन्मदिन की अशेष शुभकामनाएँ एवं बधाई ������������❤❤❤❤

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    सनेह जिनके स्वभाव में है
    सरस्वती.....कंठ में विराजे,
    सशक्त जिनसे है लेखनी ये
    या लेखनी कर में उनके साजे ।
    प्रदीप्ति करती सभी के मन को
    वो लेखनी की दिया अलौकिक,
    जनम दिवस की है धूम घर में
    बधाई ये.....आँगना में बाजे ।।
    ©saroj_gupta

  • saroj_gupta 5w

    आप सभी को हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ एवं बधाई ����������������

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    भारत माँ के माथ की बिंदी
    ऐसी अपनी भाषा हिंदी
    आओ सुदृढ़ करें हम इसको
    पहुँचाएँ जन जन तक हिंदी
    ©saroj_gupta

  • saroj_gupta 6w

    लेखनी परिवार

    है परिवेश अनेक हमारे, प्रांत अनेक से आये हम,
    उम्र, लिंग या जाति की सीमा, से ऊपर उठ आये हम ।
    बने लेखनी के परिजन हम, लिखना सबका ध्येय यहाँ,
    सीखें सिखलाये यहाँ सभी, यूँ एक कुटुबं कहलाये हम ।।
    मन में संशय तनिक नहीं, सब खुल कर रखते बात यहाँ,
    परिवारिक सम्बन्ध सरीखे, पुत्री, पुत्र और तात यहाँ ।
    सुंदर गीत, गज़ल, छंद , हर भाव विधा की धार बहे,
    है यही कामना ईश्वर से, चिर आयु ये परिवार रहे ।।
    ©saroj_gupta

  • saroj_gupta 8w

    बहना एक जरूरी है

    जीवन के हर दौर में सबको
    बहना एक जरूरी है ।।

    घर आँगन के हर कोने में
    हर पल मेरे साथ जो खेले ,
    कभी प्यार दे मुझको जी भर
    और खिलौने कभी वो ले ले ।
    बचपन की आँख मिचौली में
    बहना एक जरूरी है ।।

    ब्याह के जब ससुराल से अपने
    त्योहारों पर मिलने आये ,
    घर भर जाये तब खुशियों से
    राखी जब वो बाँधने आये ।
    खुशियों के हर इक अवसर पर
    बहना एक जरूरी है ।।

    संशय हो जब कोई मन में
    शामिल रहती हर उलझन में ,
    सही गलत का भेद बता कर
    हल कर दे मुश्किल इक पल में ।
    जीवन जब संघर्ष भरा हो
    बहना एक जरूरी है ।।
    ©saroj_gupta

  • saroj_gupta 9w

    आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ एवं बधाइयाँ

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    आजादी

    जब भारत माँ थी पराधीन
    थे कष्ट भरे वो दिन कितने
    आँखों में माँ के लालों के
    बस आजादी के थे सपने ,
    जब जलियांवाला कांड हुआ
    माता की छाती छेद गया
    कितने बेटों के सीने को
    गोरी बर्बरता बेध गया ,
    माँ के बलिदानी बेटों का
    तब धीरज मन का डोला था ।
    आजादी लेकर मानेंगे
    ये बच्चा बच्चा बोला था ।।

    अठ्ठारह सौ सत्तावन में
    जब बिगुल बजाये थे मंगल
    कितने बाँके सर बाँध कफ़न
    तब निकल पड़े करने दंगल ,
    पंजाब केसरी लाला जी
    साइमन विरोध पुरजोर किये
    दामोदर, तिलक, गोखले भी
    निज सर्वस से मुख मोड़ लिये ,
    आजादी के मतवालों का
    जब रँगा बसन्ती चोला था ।
    आजादी लेकर मानेंगे
    ये बच्चा बच्चा बोला था ।।

    बिस्मिल के गीत देश हित में
    जन जन में फूँके इंकलाब
    बटुकेश्वर दत्त,राजगुरू भी
    मन में दहकाये क्रांति आग ,
    वो वीर भगत सिंह ही तो थे
    जो हँस कर चूमें फाँसी को
    लक्ष्मी बाई खुद जीते जी
    छूने ना दी निज झाँसी को ,
    प्राणों पर खेल चंद्रशेखर
    काकोरी खज़ाना खोला था ।
    आजादी लेकर मानेंगे
    ये बच्चा बच्चा बोला था ।।

    पंद्रह अगस्त सन् सैतालिस
    वो शुभ दिन कितना पावन था
    भारत माता आजाद हुईं
    वो मंज़र बड़ा सुहावन था ,
    आखिर वीरों की कुर्बानी
    बेकार नहीं होने पाई
    अम्बर में दीप जले जगमग
    नदियाँ खुशियों से लहराई ,
    तब लाल किले पर राष्ट्र ध्वजा
    फहरा के तन मन डोला था ।
    जन गण मन का ये राष्ट्र गान
    तब बच्चा बच्चा बोला था ।।
    ©saroj_gupta

  • saroj_gupta 9w

    आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ एवं बधाइयाँ ������������������������������

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    रानी लक्ष्मीबाई

    बचपन के मेरे किस्सों में
    जो बरबस मन को भाई थी ।
    वह और नहीं दूजा कोई
    बस रानी लक्ष्मीबाई थी ।।

    जब भारत की इस धरती पर
    मानवता थी दम तोड़ रही
    जब अंधियारी काली रातें
    थी देश में पूरे दौड़ रही ,
    जब सिंहनाद की जगह सियारों
    की आवाजें आती थी
    जब मानव के जीवन की बोली
    सरेआम लगाई जाती थी ,
    तब बीमार से भारत में
    इक नई जवानी छाई थी ।
    वह और नहीं दूजा कोई
    बस रानी लक्ष्मीबाई थी ।।

    नाना की मुँहबोली बहना
    उन्हीं के संग वो खेली थी
    बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी
    उसकी यही सहेली थी ,
    नकली युद्ध का खेल अनोखा
    उसको बहुत ही भाता था
    सैन्य घेर कर दुर्ग तोड़ना
    उसको बहुत सुहाता था ,
    ब्याह हुआ झाँसी नरेश से
    बन महल की रानी आई थी ।
    वह और नहीं दूजा कोई
    बस रानी लक्ष्मीबाई थी ।।

    बुझा दीप तब झाँसी का
    राजा जब स्वर्ग सिधार गये
    त्यागे आभूषण रानी ने
    धारे रण के सिंगार नये ,
    गोरों की सत्ता के आगे
    थे जब वीरों के झुके भाल
    झांसी पर संकट छाया तो
    जल उठी शौर्य की महा ज्वाल ,
    कहते थे अबला लोग जिसे
    सबला बन कर गुर्राई थी ।
    वह और नहीं दूजा कोई
    बस रानी लक्ष्मीबाई थी ।।

    पति परम धाम को चले गये
    तब आई विपदा भारी थी
    संकट चहुँ ओर से घेरे थे
    फिर भी ना हिम्मत हारी थी ,
    निज पीठ पे पुत्र को बाँध लिया
    और खड्ग लिये दो हाथों में
    रणचंडी बन जब अश्व चढ़ी
    चाबुक दाबे वो दाँतों में ,
    गोरों की सेना पर रानी
    दावानल बन कर छाई थी ।
    वह और नहीं दूजा कोई
    बस रानी लक्ष्मीबाई थी ।।

    मार काट कर रानी जब
    जैसे पहुँची सेना के पार
    नाले पर घोड़ा अटक गया
    संकट में तब घिरी अपार ,
    दुश्मन आ पहुँचे पास बहुत
    वो करने लगे वार पर वार
    एक अकेली रानी कब तक
    लड़ती भला लिये तलवार ,
    घायल होकर गिरी सिंहनी
    निज पर कृपाण चलाई थी ।
    वह और नहीं दूजा कोई
    बस रानी लक्ष्मीबाई थी ।।

    रानी भी स्वर्ग सिधार गई
    जीवन वो गौरवशाली थी
    बन कर स्वतंत्रता की देवी
    माँ दुर्गा या माँ काली थी ,
    देश प्रेम का भाव उसे
    हम सबको तो सिखलानी थी
    खूब लड़ी मर्दानी वह तो
    झाँसी वाली रानी थी ,
    इतिहास रच दिया रानी ने
    उस समय की जो सच्चाई थी ।
    वह और नहीं दूजा कोई
    बस रानी लक्ष्मीबाई थी ।।
    ©saroj_gupta

  • saroj_gupta 10w

    यादों का सावन

    ऐ री सावन क्यूँ तू आकर
    पीहर याद दिलाये ।
    माँ बाबुल के घर की यादें
    मुझको बहुत सताये ।।

    वो सखियों संग सावन गाना,
    वो मेहंदी रचवाना,
    झूले पर वो पींग बढ़ाना,
    भूल तनिक ना पाये ।
    ऐ री सावन क्यूँ तू आकर
    पीहर याद दिलाये ।।

    तीज की रौनक बहुत सुहाना,
    माँ का पकवान बनाना,
    झूले पर कजरी लहकाना,
    मन को बहुत लुभाये ।
    ऐ री सावन क्यूँ तू आकर
    पीहर याद दिलाये ।।

    अब ना रहा वो अल्हड़ सावन,
    ना त्योहार रहा मन भावन,
    त्योहारों का अर्थ वो पावन,
    अब न कहीं मिल पाये ।
    ऐ री सावन क्यूँ तू आकर
    पीहर याद दिलाये ।।
    ©saroj_gupta

  • saroj_gupta 11w

    प्रिय सौम्या को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ एवं आशीर्वाद ������������
    @maakinidhi

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    हँसी सदा हो अधर पे तेरे
    नयन में जुगनू जलाए रखना,
    है सौम्य तेरा वज़ूद जैसे
    सदा ही उसको बनाए रखना ।
    यही दुआ है हमारी तुमको
    नहीं गमों से हो सामना अब,
    कहूँ मैं ईश्वर से आज के दिन
    सदा खुशी को बनाए रखना ।।
    ©saroj_gupta