rudraaksha

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Customs Officer loves Palmistry, Photography, Poetry , Bike riding

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Reposts
  • rudraaksha 36w

    इस सृष्टि की सभी "मां " को उनके त्याग, प्रेम और श्रृष्टि के सुंदर निर्माण के असंख्य योगदान के लिए , शत शत नमन।
    @neha_netra @succhiii @rani_shri @parle_g

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    मां

    सहस्त्र वर्षों , सैकड़ों पीढ़ियों
    अनेक सभ्यताओं की
    असंख्य रचनाओं
    शोधों ,शास्त्रों , और
    अति विशिष्ट कृतियों के
    इतिहास के बाद भी
    असमर्थ है सृष्टि ,
    और सभी विदोत्तमा
    विहीन हैं उन शब्दों से
    जो "मां " के सामर्थ्य
    त्याग, प्रेम, बल,
    इक्षाशक्ति , वैभव, और
    मातृत्व का इक अंश भी वर्णन कर सकें।
    ©rudraaksha

  • rudraaksha 39w

    @soulful @raaj_kalam_ka@mirakee @rekhtaa

    पढ़िए और स्पर्श करिए इस कविता को
    शायद ये आपको भीतर तक
    स्पर्श कर जाए ।

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    मन के तने पर
    लिपटी हुई ख्वाहिशों पे
    मनाही के नाखूनों के निशान होते हैं।
    जैसे किसी लड़की को
    दहलीज से बाहर धकेल देते हैं ।
    किसी और की चौखट पे
    एक लम्बी अग्निपरीक्षा के लिए।
    सिर्फ और सिर्फ उम्र और समाज
    की दकियानूसी सोच के पाबंद होकर ।
    ©rudraaksha

  • rudraaksha 41w

    बगावत

    सरफिरों के हाथ जो सफ़ीना लग गया ,
    हुकूमत को नींद आने में महीना लग गया ।
    समन्दर से दरिया ने जबसे हिसाब मांगा है,
    बुदबुदाता था जुलाहा कि कोई पश्मीना ले गया ।
    किसने कहा कि भट्ठी में सिर्फ रोटियां सेंको तुम,
    जला दो हवेलियां शहर की , गर हक छीना गया ।
    ©rudraaksha

  • rudraaksha 42w

    मुंतजिर नयन पथरीले हो गए होंगे ,
    सजन की आस में , कई दफा गीले हो गए होंगे,
    इन खतों में लिखी सब कोरी बातें थीं,
    दहलीज पे अब पांव बर्फीले हो गए होंगे।


    @rangkarmi_anuj @succhiii @soulful @loveneetm @mirakee

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    वायदा

    मुझसे तू संवरने के कायदे ना पूछ ,
    बेवजह इश्क़ करने के फायदे ना पूछ ।
    बिंदिया, नथ , बाली और सौ श्रृंगार
    पिया कितने तोड़े, वो वायदे ना पूछ।
    ©rudraaksha

  • rudraaksha 44w

    दस्तखत

    अकसर उसी दराज़ से
    हां उसी काग़ज़ात पे
    दर्ज़ करता हूं एक और तारीख ।
    इक और उम्र ,
    किसी हाशिए के दूजी तरफ ।
    जहां से कोसों पहले
    कोई शख़्स छोड़ गया था
    अथाह उंस मुझमें पिरोकर ।
    रूह बर्फ कर , जिस्म को पत्थर,
    फिर कभी लौटा ना हो ,
    कोई आखिरी दस्तखत कर ।
    ©rudraaksha

  • rudraaksha 45w

    सहरा का दरख़्त

    बीहड़ सहरा में ,
    इक दरख़्त ने हाथ खीचा था
    रात जड़ों में लेटी थी
    इक किस्सा सदी सा था ।
    मेरा झोला , मेरा बिस्तर
    थोड़ी स्याही , थोड़ा अलाव भी था
    इक परिंदे कि ज़िद ऐसी
    कि दरख़्त का घाव , ना देखा था ।
    ©rudraaksha

  • rudraaksha 46w

    इस क़दर हो इश्क़ कि
    शहर सहरा बन जाए
    मगर बेखबर रहे वों
    सब कुछ खाक होने तक ।

    @sanjeevshukla_@neha_netra@succhiii @rani_shri@rangkarmi_anuj

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    काश

    तेरे दर से जो गुज़रा ,
    कोई पत्ता उठा लिया मैंने
    आने वाले नुक्कड़ पे मुड़कर
    यूंही मुस्कुरा दिया मैंने ।।

    शोर है हवाओं में ,
    कि कोई सरफिरा हूं मैं ।
    काश तुम भी अखबार पढ़ती
    कि क्या कुछ लुटा दिया मैंने ।।
    ©rudraaksha

  • rudraaksha 47w

    @neha_netra @rangkarmi_anuj @succhiii
    @aparna_shambhawi @rani_shri

    पिन्हाँ -- छुपा हुआ, (concealed, hidden)
    रिवायत -- परम्परा, (tradition, legends)
    ज़मींदोज़-- ज़मीन के भीतर या नीचे,( underground)
    मुखबिर -- सूचक, जासूस, (sneaker, tipster )

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    प्रश्न

    पिन्हाँ है क्या क्या , और जमींदोज कितना
    आईना भी है मुखबिर , ये कोई सियासत तो नहीं ।

    दरिया लेकर चलते हैं, फरिश्ते दुनिया के
    प्यासा मरता हर शख्स यहां , ये कोई रिवायत तो नहीं।

    बुलबुलों सी हैसियत , और जमींदारी के ख्वाब
    दो गज़ ही मुकद्दर आखिर, ये कोई रियासत तो नहीं ।

    माटी के पुतले सब , इस कठपुतली के खेल में ,
    तमाशों की उम्र कितनी, ये कोई विरासत तो नहीं।
    ©rudraaksha

  • rudraaksha 49w

    सच

    दरवाज़े की ज़िरह, कि शहर तक जाना है
    शहर की कसक कि , गाँव याद आता है ।
    ज़मीं की दुआ कि बादल लौटा दे कोई
    नदी की फरियाद कि समंदर बहुत सताता है ।
    उस शख़्स की ज़िद फला शख़्स को हराना है
    इक मां का दर्द कि बेटा घर नहीं आता है ।
    हुकूमत का दंभ कि उसके हाथ में चाबुक है
    हकीमों का ज़ख्म कि नासूर हुआ जाता है ।
    गरीबों को शिकवा कि दो रोटी नहीं मुकम्मल।
    रईसों की मुश्किल कि मर्ज़ हुआ जाता है ।
    तमाम मुकद्में हैं यहां लोगों के एक दूजे पे
    सुना है मुनसिफ हर रोज घर जलाता है ।
    ©rudraaksha

  • rudraaksha 51w

    कसक बगावत तो करती है ,
    मगर भीतर ही भीतर
    कितना भी टूट जाए शख्स
    कभी मरम्मत नहीं करती है ।
    @succhiii@rangkarmi_anuj @rani_shri @aparna_shambhawi
    @neha_netra

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    ठहराव

    ठहराव कचोटता है , रह रहकर
    जैसे किसी कोठरी में
    इक उम्र बसर की हो मैंने ।

    जैसे आईने पर मुखौटा हो
    नदारद हों परिंदे और घोंसले उनके
    जैसे घड़ी अरसे से वहीं खड़ी हो ।।

    जैसे डायरी धूल धूसरित कोई
    बीस बरसों से घुट रही हो
    और अर्गनियों पर टंगे हो सवाल कई
    शायद अंगीठी में , कुछ खत जले हों।

    जैसे पूस की रात हो
    और निपट अकेला मैं
    हज़ारों मील दूर जुगनूओं से
    मैं रिहाई की मिन्नतें करता रहता हूं।
    ©rudraaksha