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  • ritusinghrajput 17w

    चाँद रोज़ उतरता है झील में
    मौत की ख़ातिर
    लहरें पूरी शब मौत का झूला झुलाती हैं
    उसे अपनी गोद में रख कर
    और सुबह तक फेंक देती है बाहर
    मर जाता है चाँद का एक हिस्सा
    मैं भी रोज़ जाती हूँ झील में
    तीन सीढ़ी नीचे उतर के बैठ जाती हूँ
    बहा देती हूँ आँखों से कुछ यादें
    आँखों से गिर कर वो डूब जाती हैं
    मौत हो जाती है उनकी
    सुबह लौट आती हूँ
    रोज़ मौतें होती हैं झील में
    कोई नहीं देखता
    किसी को लाशें नहीं मिलती
    मिलती है तो बस मुर्दे के शरीर की ठंडक
    झील के पानी में !

    ©ritusinghrajput

  • ritusinghrajput 94w

    पेश है ग़ज़ल!
    @hindiwriters @hindi #hindiwriters

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    ग़ज़ल

    मिरे हालात पे दुनिया तरस खाया नहीं करती,
    सुना के हाल अपना सो मैं ग़म ज़ाया नहीं करती।

    कि गुल ख़ुद ही सिमट जाता है ढ़लता देख के सूरज,
    फ़लक की रौशनी पैगाम भिजवाया नहीं करती।

    कहीं पर आज़ रोया है बिना आहें भरे कोई,
    वगरना बिन हवा बारिश कभी आया नहीं करती।

    मुझे इक लम्हा मेरे यार का हासिल नहीं होता,
    ग़म-ए-दिल इक यही है जो मैं बतलाया नहीं करती।

    वो कहता है अगर हिम्मत दिखाओ छोड़ के मुझको,
    कहो उससे मुझे तो याद तक आया नहीं करती।

    कि अब तो "रीत" से अहबाब आएँ पेश कैसे भी,
    वो उनको दोस्ती का लहजा सिखलाया नहीं करती।

    ©ritusinghrajpoot

  • ritusinghrajput 96w

    बस यूँ ही ���� इन दिनों ऐसे ही ख़याल आते हैं।

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    लाॅक डाउन में तो हर शय की कमी अपनी जगह,
    पर दोस्तों से मिल न पाने की बेबसी अपनी जगह।

    इन दिनों घर पर हैं जबसे हमें याद होटल आता है,
    घर का खाना ठीक है पिज्जा की कमी अपनी जगह।

    काश मैं भी घूम आती दोस्तों के साथ में पर,
    है मरज़ अपनी जगह और दोस्ती अपनी जगह।

    एक से है इश्क़ तो क्या अब दूसरा देखें नहीं,
    इश्क़ की अपनी जगह है औ' दिल्लगी अपनी जगह।

    चाँद दिन में शब में सूरज क्यूँ नज़र आते नहीं,
    इन सवालों में हर इक की तिश्नगी अपनी जगह।

    ऐ ख़यालों इन दिनों क्यूँ बंद आना कर दिया,
    माना "ऋतु" बीमार है पर शाइरी अपनी जगह!

    ©ऋतु सिंह राजपूत

  • ritusinghrajput 97w

    सुनों जानाँ कि अब तो आ भी जाओ ना
    तुम्हारे आने से पहले गर उसने तोड़ा दरवाज़ा
    और मुझको ले गई तो फिर तुम्हें अफसोस होगा ना!
    मगर जानाँ अगर वो ले गई मुझको तो तुम अफ़सोस मत करना
    मेरी मज़ार पे जाना, वही इक नज़्म तुम पढ़ना
    जो मुझे अक्सर सुनाते थे
    " हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम
    हर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैं "
    जौन की नज़्म जानाँ, तुम्हें तो पसंद थी ना
    मुरीद थे तुम जौन के, उन जैसा ही बनना था!
    मगर जानाँ मुझे सिगरेट अच्छी नहीं लगती
    करो वादा कि मेरी मज़ार पे होगी तुम्हारी आख़िरी सिगरेट,
    तुम्हारे होठों पे जँचती नहीं है वो।
    मज़ार पे देखा है सब फूलों को चढ़ाते हैं
    मगर तुम सिगरेट की उन राखो को चुनकर
    चढ़ा देना मज़ार पे
    और वहाँ से लौटते वक़्त मुड़ के मुझको देखना न तुम!

    गर हो सके ये तुमसे तो सुनों ठीक है वर्ना
    गर ये भी न हो सके तो सुनों रंज न करना!
    मेरे घर पे तुम जाना
    मेरे कमरे में मेरे बिस्तर के सिरहाने पे कुछ ख़त पड़े होंगे
    जो मैंने लिखे थे तुमको मुहब्बत में
    मगर क़ासिद से भिजवाए नहीं थे सोच कर के ये
    कहेंगे यार क्या तुमको, बहुत तुमको चिढ़ाएँगें
    कहीं शक हो गया उनको कि कभी तुमको मुहब्बत थी
    तुम्हारी ये अना फिर टूट जाएगी!
    सो वो ख़त मैंने यादों में महफूज रखे हैं!
    तुम उनको पढ़ना और फिर सोचना
    मुझे कितनी मुहब्बत थी
    वो जिसका यकीं मैं तुमको हर वक़्त दिलाती थी!
    मगर अफसोस उस दिन मैं न मिलूँगी!
    तुम सारे ख़त जला देना!

    सुनों तुम जब भी लौटो घर से
    कानों पे हाथ रख लेना
    मेरे घर की दीवारें जब कोई पायाम देंगी
    उन्हें तुम अनसुना करना।
    वो जो पायाम में होगा वो मेरी सिसकियाँ होगीं।
    मुझे डर है उन्हें सुन के कहीं आवाज़ न खो दो।
    सुनों जानाँ मुझे तुम याद आते हो
    सुनों जानाँ मुझे तुम याद आओगे!
    सुनों अफ़सोस मत करना
    सुनों ख़याल तुम रखना!
    - ऋतु सिंह राजपूत

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    नज़्म

    एक अरसे बाद आज़ मैंने आईना देखा
    न जाने पड़ रहा है कैसे मेरा ज़र्द ये चेहरा
    ये मायूसी इन आँखों की और इनपे गर्द का पहरा
    गर्द यादों की इनपे धीरे धीरे जम रही है अब
    गर कोई साफ़ करता है तो फिर बूँदे टपकती है!

    मेरे दरवाज़े के बाहर खड़ा है कोई,
    जो बारहा दे दस्तकें मुझको बुलाता है,
    कभी दर खटखटाता है, कभी वो खिलखिलाता है
    कभी बच्चा कोई बन के , कभी बन के कोई काफ़िर
    मगर मैं घर के कोने में दोनों हाथों को बाँधे
    कहीं चुपचाप बैठी हूँ कि कोई सुन न ले कहीं सिसकियों को।
    सुनों जानाँ कहीं वो तोड़ के दरवाजा अब अंदर न आ जाए
    मुझे शक है वो मेरी मौत ही होगी
    बनके हबीब मेरी वो मुझे ले ही जाएगी
    उसे जल्दी बहुत है मुझसे मिलने की
    मुझे डर लगता है पर उससे मिलने में।

    " आगे अनुशीर्षक पढ़ें"
    ©ऋतु सिंह राजपूत

  • ritusinghrajput 98w

    कोशिशें कब तक की जा सकती हैं
    शायद ताउम्र !
    पर जहाँ कोई उम्मीद हो।
    जहाँ उम्मीद न हो कोई
    वहाँ सिर्फ़ दुआ की जा सकती है।
    पर जहाँ ख़ुदा बुत बन गया हो
    वहाँ दुआ कैसे क़ुबूल होगी
    वहाँ किस आसरे पे कटेगी ज़िंदगी।
    न ख़्वाहिश किसी की
    न शिकायत किसी से
    न जुस्तजू किसी की
    न बगावत किसी से
    एैसी ज़िंदगी पहली भी तो जी है मैंने
    कोई नया दर्द तो नहीं मिला है इस दफ़ा।
    हर दफ़ा पुराना ही दर्द क्यूँ
    कि बेज़ार हो गए हैं ज़िंदगी से।
    तन्हा कर दिया है लोगों ने।
    इस दफ़ा नया दर्द क्यूँ नहीं
    ख़ुद ही तबाह करते हैं ज़िंदगी को।

    ©ऋतु सिंह राजपूत

  • ritusinghrajput 98w

    एक संवाद दिल और दिमाग़ के बीच। @hindiwriters @hindi #hindiwriters @_mrigtrishna_ @meenuagg @vishalprabtani @riya_expression

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    • वो क्या कहेगा? गर मैं चाहूँ उससे फिर से बातें करना, वो मान जाएगा, या मना लेगा मुझे?

    - महज़ बातें ही तो कम करता था वो , इतनी सी बात पर क्यूँ ख़फ़ा हो गई , क्यूँ सारे तअल्लुक़ात ख़त्म कर दिये?
    • पर सुनता भी तो नहीं था वो मेरी , नज़र अन्दाज़ भी तो करता था वो मुझे।

    - बातें तो जमीं आसमाँ भी नहीं करते।
    • पर बरसता है आसमाँ जब जमीं को जरूरत होती है।

    - वो भी तो बरसा होगा कभी तुमपे, वही बरसात जिसके न मिलने पे आज तुम्हारी आँखों से बरसात हो रही हैं।
    • क्या मैंने नहीं की उसपे मुहब्बत की बरसात , क्या मैंने उससे कभी कोई
    शिकायत की।

    - गर आसमाँ एक दिन न बरसे तो जमीं उसे बददुआ नहीं देती। पर तुम तो कह आई हो उसे कि तुम्हें कभी मुहब्बत न मिले। इश्क़ एकतरफ़ा तो था ही नहीं तुम्हारा, वरना उसकी आदत कैसे लगती।

    • क्या अब चीज़ें बिगड़ गई, क्या अब सब कुछ ठीक नहीं हो सकता।
    - शायद अब अना की दीवार खड़ी हो गई है दोनों के बीच।

    • पर मैं तोड़ दूँगी इस दीवार को, मैं माफ़ी मागूँगी उससे।
    - पर क्या सब कुछ ठीक हो जाएगा?

    • हाँ शायद मैं ठीक कर लूँ, पर अगर चीज़ें फिर पहले जैसी हुईं तो?
    - इस दफ़ा शायद बहुत तकलीफ़ होगी।

    • मैं रह नहीं पा रही हूँ उसके बिना। मेरा दम घुट रहा है। मुझे तकलीफ़ हो रही है। मुझे उसकी आवाज़ सुननी है। मुझे नहीं सुननी उसके सिवा किसी की आवाज़।
    - अपने कान बंद कर लो हमेशा के लिए।

    • पर अगर वो लौट के आया तो?
    - उसकी आँखें पढ़ना, उसे महसूस करना, उसे सुनना मत।

    • पर मैं तो सिर्फ उसे सुनना चाहती हूँ।
    - मुहब्बत को सुनोगी , देखोगी तो महसूस नहीं कर पाओगी।

    • तो क्या करूँ अब मैं।
    - कान बंद कर लो अपने और ख़ामोश हो जाओ।

    • क्या इससे सब कुछ ठीक हो जाएगा
    - शायद....!!!!

    ©ritusinghrajpoot

  • ritusinghrajput 98w

    वज़्न- 1212/1122/1212/22
    @hindiwriters @hindi #hindiwriters

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    ग़ज़ल

    गुलों का ख़ार की ख़सलत से लेना देना क्या,
    मुहब्बतों का तो नफ़रत से लेना देना क्या।

    नक़ाब फ़ेंको शराफ़त से लेना देना क्या,
    करो तुम ऐश मलामत से लेना देना क्या।

    भले हो कोई भी मौसम ख़िज़ा है आँगन में,
    तो फिर बहारों की रंगत से लेना देना क्या।

    जबाँ पे अपने कई उज़्र तुम समेटे हो,
    है गर पता तो शिकायत से लेना देना क्या।

    वफ़ा निभाना तुम्हारे तो बस की बात नहीं,
    तुम्हें किसी की मुहब्बत से लेना देना क्या।

    फ़रेफ़्ता हुए तुम पर मुग़ालता था मेरा,
    तुम्हें वफ़ा की नफ़ासत से लेना देना क्या।

    यक़ीन पूरा मुहब्बत पे अपने दिल से है,
    मुझे रक़ीब की चाहत से लेना देना क्या।

    धरा से "रीत" निभाए जो "भास्कर" भी तो,
    परिक्रमा करे संगत से लेना देना क्या।

    ©ritusinghrajpoot

  • ritusinghrajput 98w

    Happy holi ❤❤������ ये ख़त कल लिखा था। पोस्ट करने का समय नहीं मिला। तो सोचा आज कर दूँ।
    #hindiwriters @hindiwriters

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    सुनों जानां!

    कल होली है जाने कैसे गुजरेगा मेरा दिन। पता नहीं, आपकी याद आएगी भी या नहीं। हो सकता है दिन यूँ ही कामों में, रंगों में गुजर जाए। हो सकता है आपको एक पल भी याद न कर पाऊँ या हो सकता है कि आपको हर पल याद करूँ। पर इतना यकीन है जब हाथों में गुलाल लूँगी तो ये ख़याल आएगा कि काश पहला रंग आपके गालों पर लगाती। आपको तो पता है कान्हा से मेरी बनती नहीं है। उनके दर पर जाना बहुत कम होता है। पर कल सोचा है जाऊँगी, उनसे मिलना भी हो जाएगा और आपके नाम का गुलाल भी उनके गालों पे लगा दूँगी!

    सुनों जानां कल सफेद शर्ट या सफेद कुर्ता पहन लेना। वैसे तो आप पर नीली काली और लाल रंग की शर्ट बहुत ज्यादा जँचती है पर कल आप सफेद पहनना आपपे हर रंग जँचता है। और हाँ सुनों कल मेरे नाम का गुलाल भी अपने गालों पे लगा लेना वैसे तो आपके लाल गालों को किसी रंग की जरूरत नहीं पर कल होली है ना तो रंग जरूर लगा लेना। और पता है मेरे नाम का रंग आप अपनी नाक पे लगाना। अगर मैं होती तो आपके नाक पे सबसे पहले रंग लगाती , आपको पता है ना आपके पूरे चेहरे में सबसे ज्यादा आपकी नाक पसंद है मुझे। सुनों दोस्तों के साथ ज्यादा मत घूमना। कुछ उल्टा सीधा मत खाना। सिर्फ़ घर पे ही खाना जो भी खाना।
    बहुत याद आ रही है आपकी काश आप मेरे पास होते। ख़ैर कोई बात नहीं मुझे खुशी है आप घर पे हो अपने। अपना ख़याल रखना। बहुत मुहब्बत आपको।
    आपकी जान!
    ©ritusinghrajpoot

  • ritusinghrajput 98w

    वज़्न - 122/122/122/122

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    ग़ज़ल

    हँसी बन चुकी सिसकियाँ कौन जाने
    यही इक है उसके निशाँ कौन जाने।

    नहीं मिलता हमको शब-ए-वस्ल में भी
    सुकूँ इश्क़ के दरमियाँ कौन जाने।

    यही सोच के करती हूँ इश्क़ उससे
    बिछड़ जाए वो कब कहाँ कौन जाने।

    हूँ मैं जब तलक साथ तो साथ रह लो
    मैं मर जाऊँ कब औ' कहाँ कौन जाने।

    ये जो तीरगी में भी दिखती नहीं है
    हैं वो मेरी परछाईयाँ कौन जाने।

    © ऋतु सिंह राजपूत

  • ritusinghrajput 99w

    पेश है एक ग़ज़ल
    वज़्न- १२२२/१२२२/१२२२/१२२२
    @hindiwriters #hindiwriters @_mrigtrishna_ @naushadtm @riya_expression @azmisaud

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    ग़ज़ल

    कभी आती दरीचे से कभी छत पर बुलाती है,
    सदा देकर ये उसकी याद अक्सर आज़माती है!

    छलक जाएं मेरे आँसू है मुमकिन बार से उसके,
    मिरे मन में बसेरे को अगर तनहाई आती है!

    उसे कह दो न आए यूँ भी मिलने बारहा छत पर,
    मैं हूँ बदनाम इसमें कितने ये कपड़े सुखाती है!

    है ख़्वाहिश आए उसका फोन औ' फिर रोके वो बोले,
    सुनों अब लौट आओ ना तुम्हारी याद आती है!

    न जाने किस अना में छोड़ा था मैंने भी घर अपना,
    मिरी माँ अब भी मेरे हिस्से की रोटी बनाती है!

    कि अरसा हो चुका मुझको सुकूँ की गोद में सोए,
    मुझे भी घर बुला लो माँ तुम्हारी याद आती है!

    सुना है इश्क़ वाले बिछडें तो पागल हो जाते हैं,
    मुझे भी लोग कहते हैं ये ख़ुद में बड़बड़ाती है!

    © ऋतु सिंह राजपूत