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Reposts
  • reenaa_ 112w

      

    धूल कितने रंग बदले डोर और पतंग बदले
    जब तलक ज़िंदा कलम है हम तुम्हें मरने न देंगे

    खो दिया हमने तुम्हें तो पास अपने क्या रहेगा
    कौन फिर बारूद से सन्देश चन्दन का कहेगा
    मृत्यु तो नूतन जनम है हम तुम्हें मरने न देंगे।

    तुम गए जब से न सोई एक पल गंगा तुम्हारी
    बाग में निकली न फिर हँसते गुलाबों की सवारी
    हर किसी की आँख नम है हम तुम्हें मरने न देंगे

    तुम बताते थे कि अमृत से बड़ा है हर पसीना
    आँसुओं से ज्यादा कीमती है न कोई नगीना
    याद हरदम वह कसम है हम तुम्हें मरने न देंगे

    तुम नहीं थे व्यक्ति तुम आजादियों के कारवाँ थे
    अमन के तुम रहनुमा थे प्यार के तुम पासवाँ थे
    यह हकीकत है न भ्रम है हम तुम्हें मरने न देंगे.
    "Neeraj"
    रीना राजीव शुक्ला

  • reenaa_ 115w

    कुछ न होगा तैश से या सिर्फ़ तेवर से,
    चल रही है, प्यास की बातें समन्दर से ।

    रोशनी के काफ़िले भी भ्रम सिरजते हैं,
    स्वर आगर ख़ामोश हो तो और बजते हैं,
    अब निकलना ही पड़ेगा, गाँव से- घर से

    एक सी शुभचिंतकों की शक्ल लगती है,
    रात सोती है हमारी नींद जगती है,
    जानिए तो सत्य भीतर और बाहर से ।

    जोहती है बाट आँखें घाव बहता है,
    हर कथानक आदमी की बात कहता है,
    किसलिए सिर भाटिए दिन- रात पत्थर से ।

  • reenaa_ 116w

    रात के चौथे पहर में
    नींद उचटी, फिर न आई
    वेदना संवेदना की गोद में 
    फिर सो न पाई।

    स्वप्न में संसार जैसे 
    दुख समेटे चल रहा था
    आंख में दु:स्वप्न कोई
    रात से ही पल रहा था

    पीर ज्यों पिछले जनम की
    चेतना में कसमसाई।



    भीड़ सिर पर दर्द की
    गठरी समेटे चल रही थी
    सूर्य का रथ तप रहा था
    धरा नीचे जल रही थी

    देख जिसको नियति की भी
    आँख जैसे डबडबाई

    खेत औ खलिहान निर्जन
    बालियां खुद झर रही थी
    दूर भूखी नीलगायें
    फसल सारी चर रही थीं

    एक सिसकी-सी फिजां से
    उठ रही थी कुनमुनाई।

    नींव के पत्थर थे जो
    इतिहास लिखना था जिन्हें 
    दब गए वे सब, सुनहरा
    प्रात रचना था जिन्हें

    दुःख से भीगा हृदय जब
    आँख तब तब छलछलाई

  • reenaa_ 119w

      

    क्या दुख है समुंदर को बता भी नहीं सकता 
    आँसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता

  • reenaa_ 119w

    अब जुदाई के सफ़र को मिरे आसान करो
    तुम मुझे ख़्वाब में आ कर न परेशान करो
    - मुनव्वर राना

  • reenaa_ 120w

    बिछड़ के तुझ से मुझे है उमीद मिलने की
    सुना है रूह को आना है फिर बदन की तरफ

  • reenaa_ 120w

    पर, न जानें, बात क्या है !
    इन्द्र का आयुध पुरुष जो झेल सकता है,
    सिंह से बाँहें मिलाकर खेल सकता है,
    फूल के आगे वही असहाय हो जाता ,
    शक्ति के रहते हुए निरुपाय हो जाता

  • reenaa_ 120w

    कब ठहरेगा दर्द ऐ दिल कब रात बसर होगी 
    सुनते थे वो आएँगे सुनते थे सहर होगी 

  • reenaa_ 122w

    हे सृष्टिनियन्ता जगमाते पालनकररणी आनन्दकरणी ।
    जग के संताप मिटा दो माँ , हरो शोक रोग संकटहरणी ।।
    हम सब संतान तुम्हारी हैं जन -जन की त्रास मिटाओ माँ ।
    माँ अभयदान दो जन-जन को भय दूर करो हे भयहरणी ।।
    वात्सल्यमयी हे कृपामयी संतति की पीड़ा दूर करो ।
    भय व्याप्त हुआ सारे जग में ,भय दूर करो हे विश्वजननि ।।
    जब-जब जग में आसुरी शक्ति ,सबको पीड़ा पहुँचाती है ।
    माँ तू ही दौड़कर आती है ,बच्चोंं के कष्ट मिटाती है ।।
    तेरे आँचल की छाया में संतति तेरी सुख पाती है ।।

    माँ तू ही तो सुखदाता है ,इस जग की भाग्यविधाता है ।
    तेरी ही दया से हे माई , यहाँ जन-जन पोषण पाता है ।।
    तू अन्नपूर्णा है माते ,तू ही है माँ मंगलकरणी ।।
    हे सृष्टिनियन्ता जगमाते ........... ..
    ©reenaa_

  • reenaa_ 124w

    संघर्षों की रण-भूमि में है धैर्य सुह्रद हितकारी ।
    विप्र सुदामा दीन-हीन ने पाये कृष्ण मुरारी ।।
    धरा धीर पांचाली ने ,केशों में लहू दुःशासन का ।
    धीरज धरा जो मात सीय ने ,हुआ अन्त अधर्मी शासन का ।।
    धर कर धीरज पाषाणी ने रूप मानवी का पाया।
    पद -रज पाकर पालनहार की ,रोम-रोम अति हरषाया ।।
    ©reenaa_