rasiika

मझधार हूं । || 22 ||

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  • rasiika 8w

    बचा है क्या अंदर मेरे मरने को कुछ और
    तूने मेरी कसम खाई ; जा मैंने यकीन किया |
    ©rasiika

  • rasiika 8w

    अर्ज़ है के कोई बचा ले अब मुझको
    कुछ ऐसा मै आज काम कर आयी हूं |

    ऐलान-ए-ईश्क मै सरेआम कर आयी हूं
    माशूक़ बताकर मेरा उसे, मै उसको बदनाम कर आयी हूं |

    बीच सड़क में गले लगाकर उसको
    हैरान मैं सारी आवाम कर आयी हूं |

    कोई दुआ करे उसके लिए खुदा उसका हाफ़िज़ अब
    मै छूकर उसे उसका मजहब हराम कर आयी हूं |

    शक था उसको मुझपर के बे लिहाज़ हूं मै
    शक की गुंजाईश को ही मै तमाम कर आयी हूं |
    ©rasiika

  • rasiika 13w

    तुम नहीं होते तो शायद हम हम नहीं होते
    रवैये नम नही होते, इतने ग़म नहीं होते |

    हो ना हो इतना तो जान गए हम ज़रूर
    उल्फ़त से बेहतर और कोई सितम नहीं होते |

    सहकर भी और कहकर भी ये दर्द कम नहीं होते
    सच ही कहते है ; हर जख्म के मरहम नहीं होते |

    तुम ठहरे मसरूफ़ और फुरसती हम नहीं होते
    कभी कभी हो शायद ; हरदम नहीं होते |

    चलो मान लिए तुम्हारे सारे लंबी मुलाकातों के वादे
    पर हमारी मानों तो चंद लम्हे भी कुछ कम नहीं होते |
    ©rasiika

  • rasiika 16w

    दहलीज पर हमारी देखो तो आकर खडा है कौन
    आइये ना मेहेरबा मेरा अदब भरा आदाब दू |

    अक्स है, क़मर है, कायनात है या इलाही !
    शेर चीज़ क्या है तुमपर तो लिख कोई किताब दू |

    सुना है तुमको आई है तलब फिर बेहोशी की
    देर ना करो बताने मे अब शराब दू या शबाब दू |

    यूं तो मेरी कई राते उधार रही तुमपर
    बैठो जरा आराम से तुम्हे एक एक का हिसाब दू |

    नशा, ज़हर, फरेब, खता ; हम तो है उलझन मे
    बताईये ना हुजूर आपको कौनसा खिताब दू |

    इनकार जो कर दिया तुमने गले लगाने से मुझको
    बेकाबू सी धड़कनों को बोलो क्या जवाब दू |

    रास नहीं आता मेरे मकान को आना किसी फरामोश का
    तुम बताओ नकाब तुम्हारा काफ़ी है या हिजाब दू ?

    ©rasiika

  • rasiika 24w

    विसरू कशी सांग मला मी,होती एक रात्र अशीही
    एकाच ज्या रात्रीत माझा, जन्म जणू साकार होता ..

    आर्ततेला तुझ्या माझ्या, चांदणे आधार होता
    ओठ तुझे कपाळी माझ्या, इतकाच काय तो श्रुंगार होता..

    निषाद मी 'काफी' चा, तू ही कुणी गंधार होता
    हलकाच वार तो पण वार आरपार होता..

    बोचरा तो श्वास तुझा,विस्तवात गार होता
    ह्रदयात तुझ्याही माजला,वेगळाच हाहाकार होता..

    घायाळ तो जीव माझा,तुझ्या नजरेचा मार होता
    सुटलाच जो त्यातूनही,तो हुंदक्याने ठार होता..

    थकलेली रात्र ती,तिजवर सुखाचा भार होता
    तेवण्याची माझ्या जाणीव मला,करून देत अंधार होता....
    ©rasiika

  • rasiika 26w

    लिखा जाएगा ऐसेही तुझे बार बार मेरे यार
    करने को मुझे और कुछ यहा फिलहाल नही है |

    कहते तो थे बडी खुशीया मनाओगे मेरे जाने के बाद
    आंगन मे क्यू फिर आज तेरे गुलाल नही है |

    बताया नही है किसीको मैने तू लगता क्या है मेरा
    फिक्र ना कर रूतबे पर तेरे कोई सवाल नही है |

    सुना है मेरे ना होने का असर नही कुछ खास
    चर्चे जरूर है थोडे पर कही बवाल नही है |

    पुछा नही हाल तुमने पर सोचा बता दू
    ठीक तो हूं मै पर जिंदगी खुशहाल नही है |

    जान लो ये भी के बहुत याद आते हो तुम
    इसके उपर कुछ कहने की मेरी मजा़ल नही है |

    कह दे आंखो मे आंखे डालकर बस एक बार
    के मेरे ना होने का तुझे कोई मलाल नही है |

    कहना ये भी तुम्हारे लिये कोई बडी बात तो नही
    बेरहमी की तेरे, ऐ जालिम,कोई मिसाल नही है |

    मै कैसे मान लूं के तुझे इंतजार है मेरा
    बुरी है हालत माना पर इतनी भी बेहाल नही है |

    पुकार ना ले जब तक अब तू मेरा नाम
    लौट आने का तब तक मेरा कोई ख़याल नही है |
    ©rasiika

  • rasiika 28w

    @iamankyt
    आपकी एक रचना को पढ़कर ये लिखनेका मन हुआ :)
    शायद कुछ लफ्ज़ भी आपकी नज्मों से मिलते जुलते हो ..
    आपकी लिखावट जितना खुबसूरत ना सही
    उससे प्रेरीत होकर कुछ लिखने की कोशिश समझ लीजिए..
    आपका बहुत शुक्रीया ��

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    पूछते हो हसरते मेरी अब क्या ही बताऊ तुम्हे
    यकीन मानो मिजाज़ मेरा शायराना ही ठीक है |

    रखती हूं हसरत सूनाने की, सुनना ना चाहे लेकिन कोई तो
    ऐसी ग़ज़ल को लिखकर फिर काग़ज को छुपाना ही ठीक है |

    मिल भी गए तुम अब तो कहेंगे क्या तुमसे
    तुम्हारा वो मसरूफि़यत का बहाना ही ठीक है |

    क्या पता तेरी गली मे अब आऊ ना आऊ कभी
    रहने को मेरे ये जमाना ही ठीक है |

    बना ले जो महबूब को मज़हब भी खुदा भी
    खुदा से फिर जरा खौ़फ खाना ही ठीक है |

    लड़ जाए जो कोई खुदा तक से इस कदर
    वफा़ओ को उसकी फिर ना आजमाना ही ठीक है |

    बस चले मेरा तुमसे नजर तक ना हटाऊ
    जलसे मे तेरे मेरा ना होना ही ठीक है |

    ऐसे मे क्या कहे कही लडखडा गए कदम
    बैठने को मेरे फिर कोई मयखाना ही ठीक है |

    बात तेरी भी सही है, मचा दे जो तबाही
    ऐसी शमा को वक्त पर बुझाना ही ठीक है |

    रस्म-ए-उलफ़त को निभाना ही ठीक है
    मै करू इंतजार ; तेरा ना आना ही ठीक है |

    तसव्वुर मे मेरे और क्या क्या है क्या बताऊ
    छोडो किसी को कुछ ना बताना ही ठीक है |
    ©rasiika

  • rasiika 38w

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  • rasiika 39w

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  • rasiika 39w

    There is a thing about art that does not want to be admired. I have always been madly curious about galaxies. Well, who isn't ? But what makes me curious is not only the infinite emptiness that it holds but the mysterious anonymity of its creator.
    The artist nobody has seen but witnessed.
    The thing about art that does not demand attention is that it attracts attention.The fact that the creator is not trying to be recognized illuminates the infinite possibilities of existence.
    A painting doesn't stop being beautiful because you don't know who created it and a man behind the piano need not always be seen.
    A poem with its poet not known is not poetry,it is art.
    An artist creating masterpieces without trying to be well known is not an artist,he himself is an art.
    Knowing and not knowing an artist behind the creation does make a lot of difference.
    // When you know the creator, you admire his art.
    When you don't, you worship the creator.//

    @rasiika

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    ©rasiika