ranii0022

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  • ranii0022 2d

    उदासी है या नाराज़गी पता नही, पर आज एक अरसा हो चुका है
    खुद को समझाने में उलझी हुई हूं जैसे

    कभी शांत बैठी बस रिमझिम बारिश को देखती रहती हूं और वो बरसती हुई बारिश की बूंदें कब मेरी आँखों में भर जाती हैं मुझे पता ही नही चलता।
    कभी रात को चांद को देखते हुए घंटों खुद से बातें करती हूं
    खुद से पूछती हूं कई सवाल फ़िर जवाब भी खुद ही से देती हूं

    कभी अकेले रहना चाहती हूं कभी चाहती हूं कि बस ऐसे ही घिरी रहूं भीड़ से
    क्यूंकि अकेले होते ही सवालों का जाल बन जाता है मन में
    जिनके जवाब भी जाल ही होते हैं

    फ़िर समझ नही आता कहां से शुरू करूं

    कहते हैं आपके साथ जो होता है वो आपके कर्म हैं
    कर्म– जो निश्चल भाव से किए जाएं वो कर्म ज़रूर फलते हैं

    मुझे कभी कभी लगता है की मेरे कर्म ख़राब ही होंगे
    तभी मेरे साथ सब कुछ बुरा ही हो रहा है
    तभी मैं अपने दुख से उभर नही पा रही हूं

    फ़िर लगता है अगर ऐसा होता तो जो लोग मुझे से इतना प्रेम करते हैं वो भी मेरे पास नहीं होते
    जिस ईश्वर से मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ शिकायत ही करती रहती हूं
    उनकी एक भी कृपा मुझ पर न होती

    ख़ैर ,ये और बात है कि मैं बहुत सोचती हूं

    अब ये उदासी है या नाराज़गी पता नहीं
    पर ये जो भी है खुद से है और न जाने कब तक रहेगी
    संभल रही हूं , संभलने की कोशिश कर रही हूं, संभल जाऊंगी एक दिन

    ©ranii0022

  • ranii0022 14w

    इस हंसते चेहरे के पीछे की उदासी
    दिखाते क्यूं नही
    एक–दूसरे के दर्द महसूस कर लेते है
    फिर एक–दूसरे को बताते क्यूं नही

    मन ही मन दुआ करते रहते हैं
    रज़ा होठों पर लाते क्यूं नही

    ये दर्द–ओ–ग़म तो वक्त का हिस्सा है
    तकलीफ़ ये है.... कि तुम मेरी
    मज़ाकिया बात पर भी मुस्कुराते क्यूं नही

    माना मुझे रंग पसंद नहीं
    पर तुम्हारा मुझ पर चढ़ा रंग
    तुम देख पाते क्यूं नहीं

    मेरे सब्र की इंतहा हो चली है
    ये तुम्हारे चुप रहने का हुनर
    मुझे भी सिखाते क्यूं नहीं

    रानी
    ©ranii0022

  • ranii0022 15w

    कभी-कभी लगता है
    कि मुझ में भावनाएं है ही नहीं
    शायद मेरा व्यक्तित्व ऐसा ही है
    या इसे कठोरपन ,कठोरदिल, वगेरह नाम दिए जा सकतें हैं

    बात ऐसी है के......

    मैंने कभी खुद को आजमाया ही नहीं
    या कभी किसी के भरोसे को अपनाया ही नहीं
    लोगों के दुख सुने ज़रूर हैं
    पर....
    कभी किसी को अपना दुख सुनाया ही नहीं
    दोस्तों से बातें भी बहुत की हैं
    पर उनको अपना हाल कभी बताया ही नहीं
    शायद....
    खुद से खुद को कभी मिलाया ही नहीं
    अकेलेपन की कोई मिसाल नही मैं
    इस सच का आइना खुद को कभी दिखाया ही नहीं

    (अरे, ये तो rhyming हो गया।)

    कभी–कभी तो शक होता है
    कि भाव और दिल ये दोनों मुझ में है भी या नहीं
    क्या ? मैं सच में एक कठोर दिल इंसान हूं
    या...
    शायद मैं दिल की बात करने से डरती हूं
    डरती हूं की कहीं जो दिल की बात शुरू की तो... रो–रो कर..... कहीं बिखर न जाऊं
    डरती हूं की जिससे मैं अपने सारे दुख, सारे आसूं, सारी चिंताएं, सारे दर्द बाटूंगी...

    क्या वो समझेगा या समझ पाएगा मुझे??

    लगता है, ये सब अब मेरी आदतें बन गई है
    मुझे कमज़ोर करने वाली आदतें
    और ये मेरे लिए दुख की बात है

    पर एक अच्छी और ख़ास बात ये है ......... कि
    आदत बदली जा सकती है
    और अगर ये आदत है
    तो मैं ज़रूर इसे छोड़ना चाहूंगी।

    रानी
    ©ranii0022

  • ranii0022 16w

    मेरी आवाज़ को तुम्हें आवाज़ देने से दिक्कत है
    पर मेरी ख़ामोशी तुम्हें हर वक्त आवाज़ देती है

    मेरी लब तुम्हारी बात नहीं करना चाहते
    पर ख़ामोशी सिर्फ़ तुम्हारी बात करती है

    मेरा ज़ेहन तुम्हें याद करना नहीं चाहता
    पर ख़ामोशी हर पल याद करती है
    बहुत याद करती है

    पर मैं तुम्हें हमेशा टालती हूं, टालती हूं तुम्हारा पूछा हुआ हर सवाल, टालती हूं तुम्हारी हर बात
    और अब शायद टल चुकी है बात।

    ये बात भी कितनी अजीब है
    बात आंखों से पक्की हो चुकी थी
    बात लब पर आकर मुकर गई

    रानी
    ©ranii0022

  • ranii0022 16w

    मैं

    बची हूं अभी आधी तो
    अभी तो पूरी टूटी नहीं हूं

    मना ही लूंगी खुदको
    के इतना भी रूठी नही हूं

    शजर में कुछ तो जान बाकी है
    मैं जड़ समेत अभी सुखी तो नही हूं

    मुझसे ही है,मेरा खिलना और मुरझाना
    ये बात याद है मुझे मैं भूली तो नही हूं

    ग़नीमत है, मैं जिंदगी के साथ हूं
    और ख़ैर है, के जिंदगी के हाथ से अभी छूटी तो नही हूं

    रानी
    ©ranii0022

  • ranii0022 16w

    रंग

    रंगों से न लगाव न बैर है।
    बस.... पता नही क्यूं एक उदासी सी है
    कभी रंगों की तरफ ध्यान जाता ही नही
    कहने को तो अलग–अलग तरह के रंग है
    और उनका चुनाव भी बहुत सरल है।
    फ़िर भी घूम–फिर कर मुझे काला रंग ही भाता है
    बाकी रंग शायद.......
    मुझसे कुछ शिकायत रखते हैं
    पता नही क्यूं.....
    ऐसा नहीं है, की रंगों से कोई बैर है
    रंगों को मिलाकर एक नया रंग बनाया जाता है
    और कई रंगों को मिलाकर एक कलाकृति
    हां...
    काले रंग का इस्तेमाल बिल्कुल किया जाता है
    और इसकी ख़ास ज़रूरत होती भी है
    पर बाकी रंगों में उसकी रंगत फीकी सी ही दिखती है
    शायद मैंने उस काले रंग की तरह
    खुदको बना लिया है
    जो रंगों की प्लेट में होता तो है
    पर उनका हिस्सा नहीं बन पाता
    बस कहीं कोने में रहना चाहता है
    चुपचाप....
    सबकी नज़रों से बचकर
    या फिर इसे किसी प्रकार का डर भी कह सकते हैं
    वैसे कारण तो बहुत हैं....

    खैर, इंसान अपने अनुभव के अनुसार खुद को बेहतर बदल ही लेता है
    और मैं भी इंतजार कर रही हूं
    के एक दिन ...
    मैं खुद इन रंगों की तरफ अपना रुख करूंगी
    और जितने रंग समेट पाऊं
    उतने अपनी झोली में समेट लूंगी
    मुझे यकीन है....
    वो पल ज़रूर आएगा
    जब मुझे इन रंगों से प्रेम हो जाएगा

    रानी
    ©ranii0022

  • ranii0022 18w

    वो चांद कहता है।
    तुम रोज़ मुझसे एक ही सवाल करती हो।
    मैं यकीन रोज़ दिलाता हूं।
    फिर भी बवाल करती हो।

    कुछ कमी नहीं है तुम में।
    बस बहुत अच्छी हो तुम।
    दिल की सच्ची हो तुम।

    महसूस करो तो मानोगी।
    जो रोज़ तारीफ़ करता तुम्हारी।
    उस चांद पर भी दाग़ है ये जानोगी।

    उफ्फ

    फिर भी रोज़ एक ही सवाल करती हो।
    मैं यकीन रोज़ दिलाता हूं।
    फिर भी बवाल करती हो।

    रानी
    ©ranii0022

  • ranii0022 19w

    आत्मकथा थोड़ी लंबी है।
    पर आप पढ़ेंगे तो relate ज़रूर करेंगे।��

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    आत्मकथा

    आत्मकथा, जो खुद पर बीती हो।
    पर मुझे लगता है, ये हर लड़की की आत्मकथा है।
    मुझे एक लड़की का अस्तित्व क्या है, आज तक समझ नही आया, शायद समाज की नज़र में उसे हर दायरे में सिर्फ़ खूबसूरत ही दिखना है, और हर काम में निर्पुण होना ज़रूरी है।

    ख़ैर, एक लड़की स्कूल में आठवीं कक्षा भी पास नहीं कर पाती और हाथो में पेंसिल की जगह बेलन और किताब की जगह चकला आ जाता है।
    लड़की भी घर की ज़रूरत के अनुसार अपने आप को ढाल ही लेती है उस क्रम में।

    जैसे–तैसे करके बारहवीं कक्षा पास हो जाती है।
    फिर माता–पिता को चिंता सताती है शादी की।
    माता–पिता, जिनके लिए बेटी घर की रानी है
    और बेटी के लिए माता–पिता से बढ़कर कुछ नहीं।

    लड़की पढ़ी–लिखी समझदार हो तो जाती है।
    पर समाज को केवल एक लड़की ही दिखाई देती है।
    जो अब सिर्फ शादी के लायक हो गई है।
    फिर घर में रोज़ एक रिश्ता आता है ,
    लड़की को देखने।
    ये देखने का रिवाज़ भी अजीब है ,
    कहां जा रहे हैं??
    हमारे लड़के के लिए लड़की देखने जा रहें हैं। जैसे कोई वस्तु ;
    देखना, की कहीं लड़की गूंगी तो नही,अंधी तो नही, काली तो नही , मोटी तो नही, कद में छोटी तो नही और ऐसे सौ–हज़ार कारण।
    बेटा खाना बनाना आता है ,घर का काम तो आता होगा,सिलाई–बुनाई कर लेती हो और ऐसे कई सवाल ।
    मानो बोर्ड की परीक्षा में बैठे हैं।

    पर लड़की को हर बार देखना–दिखाना ज़रूरी हो जाता है ।
    जब तक एक ठीक रिश्ता न मिले ,लड़की को इन यातनाओं से गुजरना ही होगा। और ये सिर्फ शादी से पहले की यातनाएं हैं। अभी तो दूसरी जिंदगी जीनी बाकी है हमारी।

    ख़ैर, अब चिंता की कोई बात नहीं, कुछ को इन यातनाओं की आदत पड़ चुकी है, और कुछ अब भी खुद से ,और समाज से लड़ रहीं हैं।

    वैसे तो इस विषय पर पहले भी चर्चाएं हो चुकी है।
    पर सिर्फ चर्चा!


    रानी
    ©ranii0022

  • ranii0022 19w

    मैं अधूरी ही रही

    आंखों से बहती रही आस
    पलकों ने पर्दा किया
    फिर भी बहती रही आस
    आस अधूरी ही रही

    दिल से कहते–कहते जुबां पर आई बात
    जुबां कह ना पाई बात
    बात अधूरी ही रही

    आसमां में बादल घिर रहे थे
    साथ घिर आई बरसात
    पर भीगी नहीं रात
    ये रात भी अधूरी रही

    मैं अधूरी ही रही


    रानी
    ©ranii0022

  • ranii0022 19w

    एक मुस्कान ही तो जचती है तुम पर रानी
    क्यूं उसे अपने आंसुओ से तंग करती हो
    रंग नहीं जिंदगी में तो क्या हुआ।
    अपनी एक मुस्कान से तुम अपने सारे ग़म तो भरती हो।

    रानी
    ©ranii0022