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  • rangkarmi_anuj 5w

    लकड़बग्घा

    आज भी वो तलाश करते हैं
    मेरा आपका हम सबका खून,
    वो ढूंढते हैं हमारी पहचान
    वो सूंघते हैं हमारे निशान
    हमारी तासीर को छूना
    चाहते हैं हवा में नाक
    को चिपका कर, आसमान की
    आवारा पतंग की तरह।

    कभी कभी वो होते हैं
    इर्द गिर्द और आस पास,
    हम पहचान नहीं पाते हैं
    आँख होते हुए भी देख नहीं पाते हैं,
    कभी अंदर में बसा हुआ लगता है
    तो कभी हमारे परिचित में
    धुंधला धुंधला दिखाई देता है,
    मैं और आप एक दूसरे को
    शक की निगाहों से देखते हैं।

    रात में डरावना हो जाता है
    आक्रामक आक्रोश से भरा,
    अकेला भी है वो झुंड में भी है
    हम भले ही अकेले हों
    पर झुंड में हम भी वैसे ही हैं,
    हम इंसान सच में इंसान हैं
    ये सवाल चुभता है बार-बार
    क्या हम भी शहर के जंगली हैं,
    ये सवाल ख़ुद कहता है
    लकड़बग्घा सब जगह पर है।
    ©अनुज शुक्ल "अक्स"
    ©rangkarmi_anuj

  • rangkarmi_anuj 6w

    खण्ड काव्य

    यदि वो प्रेम करती है तो उसकी घृणा की
    तीव्रता भी बहुत प्रबल रहेगी,
    जितना प्रेम के लिए समर्पित
    उतना ही दुःख ज्वलंत,
    वह पुरुष को सुरक्षित
    रखने में सक्षम है
    हाँ आँचल में छुपाकर
    पुरुष को शिशु बना सकती है,
    परन्तु पुरुष उसकी छत्र छाया बनकर
    स्त्री के सम्मान को हृदय में संचित
    करके रख लेगा,
    जैसे वरदान में मिले थे
    कर्ण को कवच और कुंडल।

    दोनों का परस्पर आकर्षण चुम्बक की भाँति है,
    कभी आलिंगन में मग्न रहकर
    चिरनिद्रा में चले जाना,
    कभी पृथक हो कर वियोग
    में विरह में एक दूसरे का
    स्मरण करके अश्रु गिराना,
    उत्तर दिशा और दक्षिण दिशा
    एक में कुबेर तो दूसरे में यम,
    अर्थात प्रेम से मान है तो
    प्रेम से मृत्यु भी है।

    हाँ कभी स्त्री अव्यक्त प्रेम करती है
    हाँ कभी पुरुष उसे व्यक्त कर देता है,
    जो स्त्री कभी कुछ नहीं कह पाती है
    तो उसका पुरुष मन्तव्य पढ़कर उसके
    मन के अपठित गद्यांश को उसे
    बता देता है,
    स्त्री भी उसके सारांश और मर्म को
    अपने प्रेम रूपी उपसंहार को
    नयनों और शांत होठों से बता देती है,
    पुरुष और स्त्री स्वयं में
    एक खण्ड काव्य लिपि हैं परस्पर के।
    ©अनुज शुक्ल "अक्स"
    ©rangkarmi_anuj

  • rangkarmi_anuj 6w

    प्रेम की प्रतीक्षा करने के लिए
    जीवन के शून्य का समर्पण आवशयक है,
    तब जाकर प्रेम का तन
    शून्य से प्रारंभ की ओर यात्रा करेगा।
    ©rangkarmi_anuj

  • rangkarmi_anuj 6w

    पोइ

    एक पँछी इंतज़ार कर रहा था
    मैना का इश्क़ की डाल पर,
    वो डाल उसका आशियाना था
    वो उसकी मोहब्बत का बसेरा था,
    वो था मैना का आँगन जिसके इंतज़ार में
    पँछी इश्क़ के डाल पर बैठा हुआ था।
    मैना नहीं आ सकती थी
    उसे बंद कर दिया था क़ैदख़ाने में,
    उसका ज़ुर्म इतना ही था कि उसने
    चुराए थे पोइ के फल से महावर
    जिसे पैर में लगाकर पँछी की डाल पर
    बैठने वाली थी।

    पँछी सब बातों से बेख़बरअपने सपने में गुम
    पत्ती जमा कर रहा था जाड़े से बचने के लिए,
    सपने में उसने ऊन की
    छत भी पक्की कर ली,
    उसमें से सिर्फ़ धूप आएगी,
    ठंडी हवा के लिए कोई भी कोना
    नहीं दिया, क्योंकि
    उसकी वजह से मैना को तकलीफ़ होती,
    पँछी के सपने सुनहरे थे
    पर मैना की आरज़ू घने कोहरे जैसे,
    वो ऐसी जगह पर फंस गई थी
    जिससे निकलने के लिए
    तेज़ धूप की ज़रूरत होती थी
    जिससे वो कोहरा छट जाए,
    पर पोइ के फल से महावर चुराना
    उसके लिए बहुत महंगा साबित हुआ।

    पँछी इश्क़ की डाल पर
    बैठ कर जाड़े से लड़ेगा,
    क्योंकि वो घर के बाहर सोता है
    मैना का इंतज़ार करता है,
    मैना या तो मर जाएगी या
    पँछी का इंतज़ार करेगी,
    जिससे उसका वो हाल देख सके
    पर इंतज़ार दोनों कर रहे हैं
    पँछी अपनी डाल पर
    और मैना अपने पिंजड़े पर
    जिसका जुर्म था पोइ के
    फल से महावर चुराना।
    ©अनुज शुक्ल "अक्स"
    ©rangkarmi_anuj

  • rangkarmi_anuj 6w

    3 दिसंबर

    नन्हें जिस्म को नमक के कब्र में सुपुर्द ए ख़ाक कर दिया गया था,
    रात में माँ के सीने से लग कर सोए थे
    और सोते रह गए माँ के साथ,
    कुछ तो पेट में ही दफ़्न हो गए थे
    जिनका इंतज़ार माँ कर रही थी,
    वो बुज़ुर्ग न दफ़्न हो सके
    न ही किसी को दफ़्न कर पाए।

    रात के अंधेरे में जीते जी लील गई काली मौत,
    इतना सन्नाटा की शोर भी गूंगी थी
    चीख, मातम, भगदड़, अफ़रा तफ़री
    बदहवासी, लाचारी, सब के सब तमाशबीन थे
    उस डरावनी, दर्दनाक, बेरहम मौत के आगे।

    कब्रिस्तान में कब्र कम पड़ गए
    शमशान घाट में लकड़ियां,
    नमक की बोरियां कम पड़ गईं
    बिछाने के लिए कफ़न कम पड़ गए,
    दफ़नाने वाले कम पड़ गए
    दफ़्न होने वाले कतार लगा कर पड़े हुए थे
    रास्तों में, अस्पतालों में, घर में, मोहल्ले में
    कोई उठाने की कोशिश कर रहा था कोई उठने की,

    नज़ारा ऐसा था जैसे बसी हुई बस्ती को तूफ़ान उड़ा कर ले गया
    चारों तरफ बस मुर्दे ही मुर्दे थे इंसानों के जानवरों के,
    कुछ तड़प रहे थे, कुछ दर्द से जल रहे थे, कुछ बिना कहे
    सोने थे, तो कुछ समझने की कोशिश कर रहे थे।

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    उस रात की कराहती हुई आवाज़ आज भी आती है
    कब्र से बच्चे रोते हैं, औरतें पेट को टटोलती हैं आदमी को
    पुकारती हैं, बुज़ुर्ग बेटों को बुलाते हैं, जवान डॉक्टर से जान
    बचाने की गुहार लगाते हैं, पर कोई भी नहीं सुन पा रहा है
    जो ज़िंदा हैं और जो मर गए हैं।

    मवेशी पँछी ऐसे गिरे ज़मीन पर जैसे सूखे पत्ते
    गिरते हैं, पल भर में मौत एक मौका भी नहीं मिला
    बचने के लिए, उस हवा के झोंके ने अपने आप को ज़हरीला
    कर लिया था जो भी सामने आया उसे सुलाता गया,
    उस सर्दी में आग लगी हुई थी
    तबाही की, बर्बादी की, चिताओं की, लापरवाही की
    बग़ावत की, मरे हुओं की आबादी की, अंधी होती आँखों की।

    सबका सब जैसे बार बार सामने नज़र आता है
    वो मौत की आवाज़ सुनकर दिल सिहर जाता है,
    रोज़ रात में अंधा बच्चा रोता है अपनी कब्र से
    कहीं खानदान का हिस्सा फिर से बिखर जाता है।

    वो ज़हरीली रात रूह बनकर डराती रहती है
    3 दिसंबर की रात कुछ याद दिलाती रहती है,
    मोमबत्ती, मशालें अब भी जलती रहती हैं
    आज भी वो औरत अपने बच्चे को जगाती रहती है।

    यूनियन कार्बाइड याद रहेगा
    मिथाइल आइसोसाइनाइट याद रहेगा
    वो दौर वो तबाही, वो मंज़र याद रहेगा
    वो डर वो सिसकियां, वो खंजर याद रहेगा
    ©अनुज शुक्ल "अक्स"
    ©rangkarmi_anuj

  • rangkarmi_anuj 7w

    दास्तां

    महंगी हो चलीं अब रोटियां ही रोटियां
    सस्ती है जान सस्ती बोटियां ही बोटियां,
    ख़त्म हुई सारी इंसानियत भर रहा रुपिया
    ख़ुश है हुक्काम लड़ें जातियां ही जातियां।

    बिक गई इमारत बिकी पटरियां ही पटरियां
    देख रहा तानाशाह लगे बोलियां ही बोलियां,
    खून पसीना पी गया वो अकाल बहरूपिया
    मांगता हक़ किसान मिले लाठियां ही लाठियां।

    बेटी हुई सयानी घूरे अखियां ही अखियां
    वहशी नज़र में दिखे छातियां ही छातियां,
    बेटा सपने पूरा करने लिखता नई कहानियां
    बिक गई कहानी खरीदी डिग्रियां ही डिग्रियां।

    राशन को खा रहीं इल्लियां ही इल्लियां
    बिचौलिए बेच दिए हैं बस्तियां ही बस्तियां,
    बड़े बड़े मिलकर निगल गए महंगी मिठाईयां
    बेचारों को छोड़ गए मक्खियां ही मक्खियां।

    टमाटर आसमान में ज़मीन पर सब्जियां ही सब्जियां
    पेट्रोल डीज़ल बन गए शोखियां ही शोखियां,
    दाल नमक चावल तेल आदमी इनसे रोलिया
    हमारे टोपी वालो के लिए बजाओ तालियां ही तालियां।
    ©अनुज शुक्ल "अक्स"
    ©rangkarmi_anuj

  • rangkarmi_anuj 7w

    तितली

    जब तुम एक दिन
    तितली बनकर उड़कर
    मेरे पास आओगी उस दिन
    से तुम्हारी थकान कम हो जाएगी,
    जब तुम एक दिन
    मेरे बगीचे में आओगी
    तब सारे गुलाब फिर से खिल जाएंगे।

    उड़कर आना जब
    तब तुम्हारे पसीने को पोछ
    दूँगा अपने हाथ से जो
    रुका होगा ओस बनकर माथे पे,
    कोशिश यह करना
    उसे हवा में उड़ने नही देना
    वरना मैं खाली हाथ
    रह जाऊँगा।

    मेरा कंधा
    तुम्हारे लिए है,
    उसपर सिर रख देना,
    कभी अपने पर रखकर सो जाना,
    मैं हल्के हाथों से सहला कर
    तुम्हारी थकान को
    गमले की मिट्टी में
    डाल दूँगा, और उसमें से
    अंकुरित होगा फूलों का
    गुलदस्ता जो तुम्हें मैं
    तुम्हारी नींद पूरी हो जाने के बाद दूँगा।

    जब तुम एक दिन
    तितली बनकर उड़कर
    मेरे पास आओगी उस दिन
    से तुम्हारी थकान कम हो जाएगी।
    ©अनुज शुक्ल "अक्स"
    ©rangkarmi_anuj

  • rangkarmi_anuj 8w

    तुम तसल्ली से जी लो, मैं मुश्किल से मरता हूँ
    मौत बेशकीमती लगती है मुझे, मैं जीने से डरता हूँ

    कितने समंदर देखकर तुम डर से पानी में नहीं उतरे
    मैं तो बग़ावत और ज़लज़ले के समंदर में उतरता हूँ

    यूँही कोई मौजिज़ा नहीं कर गया था मेरी ज़िदंगी पर
    आज भी ज़िंदगी और मौत के बीच मैं तैरता हूँ

    उठाने वाले जीते जी मेरा ज़नाज़ा उठा लें बिना कहे
    मौका जब भी मिलता है मैं भी कफ़न भरता हूँ

    चिराग़ हमेशा बुझाने में लगे रहते हैं वो लोग मेरा
    लेकिन मैं उनके चिराग़ के लिए हमेशा दुआ करता हूँ

    मुझ से नफ़रत कर के क्या मिलेगा ज़माने के इंसानों
    आज कल तुम्हारी नफ़रत को भी मोहब्बत का बरता हूँ
    ©rangkarmi_anuj

  • rangkarmi_anuj 8w

    चाँद का बंटवारा

    चाँद का भी बंटवारा हुआ
    आधा गया पूर्णिमा के पास
    आधा गया अमावस के पास,
    एक उसका प्रेम है
    तो दूसरा पहरेदार है,
    कभी आज़ाद घूमता है आसमान में
    कभी कालेपानी की सज़ा काटता है।

    उसका बंटवारा जब हुआ
    उसे बताया नहीं गया कभी,
    वह साल भर में कितनी दफ़ा तो
    ग्रहण में फंस ही जाता है
    जैसे दंगे में फंसते हैं मासूम सितारे,
    इतना सताया जाता है उसे
    पर वो बग़ावत नहीं करता है,
    बस चुपचाप सहन करके
    कहीं दूर जा कर समुद्र के पास
    बैठकर, ज्वारभाटा और किनारे से
    अपना दुखड़ा सुनाने लगता है।

    उसके हिस्से में खुशी की
    झोली तीज त्योहार में खुलती है,
    और ग्रहण पर उसकी झोली में
    सूतक नाम का ताला लगा दिया जाता है,
    कभी कभी सोचता है कि
    यह सब सूरज को भी बताए
    पर सूरज सुबह से शाम
    अपनी लालटेन जलाकर
    जमीन पर लगी घास और भुट्टे को सेंकते रहता है,
    गरम चश्मा लगाकर चांद को रोशनी की उधारी देता है
    इसलिए चाँद उसका आधा ग़ुलाम भी है।

    चाँद अपने बंटवारे से ना तो खुश था न दुःखी
    क्योंकि न बादल दंगे करते हैं
    और न ही सितारे,
    जैसे करते हैं ज़मीन पर रहने वाले
    एक वो जो मुल्क का बंटवारा करते हैं
    दूसरे वो जो अपने घर का बंटवारा करते हैं,
    चाँद सबके साथ रहता है
    सबको बराबर वक़्त भी देता है,
    इसलिए उसने अपने बंटवारे पर
    न किसी को हिस्सेदारी दी
    न ही अपनी चांदी की कटोरी।
    ©अनुज शुक्ल "अक्स"
    ©rangkarmi_anuj

  • rangkarmi_anuj 8w

    सूखी जड़

    मनुष्य वो अपने खेत के केचुए को
    ज़िंदा रखने के लिए अपने पसीने और आँसू से
    सींच रहा था लेकिन सारी मेहनत बर्बाद हो गई।

    अधमरी हालत में उसकी जिंदगी है
    खेत पर सूखी फसल का श्मशान घाट है
    और घर के आंगन में घुन का कफ़न बिछा हुआ है
    उसके श्मशान घाट पर परिंदे केंचुए ढूंढते हैं
    और घर के कफ़न को सूंघते तक नहीं।

    हाथ में, पैर में, चमड़ी में,
    तलवे में, हथेली में और उंगलियों में
    ज़मीन की दरार पड़ गई है,
    क्योंकि उसकी धरती ने अपना कर्ज़ और मर्ज
    उस मनुष्य जो दे दिया है उसके आख़री वक़्त तक,
    जिसे वह कभी भी भर नहीं पाएगा।

    कुछ दिन पहले कुछ केचुओं ने
    सूखी फसल की जड़ों में फांसी लगा ली
    रात के अंधेरे में, क्योंकि मनुष्य
    रात को उन्हें देखने नहीं आता है
    वो केचुए ख़ुद कर्ज़ में थे जब से
    उसकी ज़मीन पर मुफ्त में रह रहे थे,
    खा रहे थे, पी रहे थे और उम्मीद जगा रहे थे

    पर उनसे उस मनुष्य का दुख और दर्द नहीं देखा गया,
    और आज फिर से वही हुआ इसलिए
    मनुष्य ने नमक डालकर सबको
    वहीं पर सुपुर्द ए ख़ाक कर दिया
    और घर के कफ़न पर जा कर सो गया।
    ©अनुज शुक्ल "अक्स"
    ©rangkarmi_anuj