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  • rangkarmi_anuj 14h

    तितली

    जब तुम एक दिन
    तितली बनकर उड़कर
    मेरे पास आओगी उस दिन
    से तुम्हारी थकान कम हो जाएगी,
    जब तुम एक दिन
    मेरे बगीचे में आओगी
    तब सारे गुलाब फिर से खिल जाएंगे।

    उड़कर आना जब
    तब तुम्हारे पसीने को पोछ
    दूँगा अपने हाथ से जो
    रुका होगा ओस बनकर माथे पे,
    कोशिश यह करना
    उसे हवा में उड़ने नही देना
    वरना मैं खाली हाथ
    रह जाऊँगा।

    मेरा कंधा
    तुम्हारे लिए है,
    उसपर सिर रख देना,
    कभी अपने पर रखकर सो जाना,
    मैं हल्के हाथों से सहला कर
    तुम्हारी थकान को
    गमले की मिट्टी में
    डाल दूँगा, और उसमें से
    अंकुरित होगा फूलों का
    गुलदस्ता जो तुम्हें मैं
    तुम्हारी नींद पूरी हो जाने के बाद दूँगा।

    जब तुम एक दिन
    तितली बनकर उड़कर
    मेरे पास आओगी उस दिन
    से तुम्हारी थकान कम हो जाएगी।
    ©अनुज शुक्ल "अक्स"
    ©rangkarmi_anuj

  • rangkarmi_anuj 5d

    तुम तसल्ली से जी लो, मैं मुश्किल से मरता हूँ
    मौत बेशकीमती लगती है मुझे, मैं जीने से डरता हूँ

    कितने समंदर देखकर तुम डर से पानी में नहीं उतरे
    मैं तो बग़ावत और ज़लज़ले के समंदर में उतरता हूँ

    यूँही कोई मौजिज़ा नहीं कर गया था मेरी ज़िदंगी पर
    आज भी ज़िंदगी और मौत के बीच मैं तैरता हूँ

    उठाने वाले जीते जी मेरा ज़नाज़ा उठा लें बिना कहे
    मौका जब भी मिलता है मैं भी कफ़न भरता हूँ

    चिराग़ हमेशा बुझाने में लगे रहते हैं वो लोग मेरा
    लेकिन मैं उनके चिराग़ के लिए हमेशा दुआ करता हूँ

    मुझ से नफ़रत कर के क्या मिलेगा ज़माने के इंसानों
    आज कल तुम्हारी नफ़रत को भी मोहब्बत का बरता हूँ
    ©rangkarmi_anuj

  • rangkarmi_anuj 1w

    चाँद का बंटवारा

    चाँद का भी बंटवारा हुआ
    आधा गया पूर्णिमा के पास
    आधा गया अमावस के पास,
    एक उसका प्रेम है
    तो दूसरा पहरेदार है,
    कभी आज़ाद घूमता है आसमान में
    कभी कालेपानी की सज़ा काटता है।

    उसका बंटवारा जब हुआ
    उसे बताया नहीं गया कभी,
    वह साल भर में कितनी दफ़ा तो
    ग्रहण में फंस ही जाता है
    जैसे दंगे में फंसते हैं मासूम सितारे,
    इतना सताया जाता है उसे
    पर वो बग़ावत नहीं करता है,
    बस चुपचाप सहन करके
    कहीं दूर जा कर समुद्र के पास
    बैठकर, ज्वारभाटा और किनारे से
    अपना दुखड़ा सुनाने लगता है।

    उसके हिस्से में खुशी की
    झोली तीज त्योहार में खुलती है,
    और ग्रहण पर उसकी झोली में
    सूतक नाम का ताला लगा दिया जाता है,
    कभी कभी सोचता है कि
    यह सब सूरज को भी बताए
    पर सूरज सुबह से शाम
    अपनी लालटेन जलाकर
    जमीन पर लगी घास और भुट्टे को सेंकते रहता है,
    गरम चश्मा लगाकर चांद को रोशनी की उधारी देता है
    इसलिए चाँद उसका आधा ग़ुलाम भी है।

    चाँद अपने बंटवारे से ना तो खुश था न दुःखी
    क्योंकि न बादल दंगे करते हैं
    और न ही सितारे,
    जैसे करते हैं ज़मीन पर रहने वाले
    एक वो जो मुल्क का बंटवारा करते हैं
    दूसरे वो जो अपने घर का बंटवारा करते हैं,
    चाँद सबके साथ रहता है
    सबको बराबर वक़्त भी देता है,
    इसलिए उसने अपने बंटवारे पर
    न किसी को हिस्सेदारी दी
    न ही अपनी चांदी की कटोरी।
    ©अनुज शुक्ल "अक्स"
    ©rangkarmi_anuj

  • rangkarmi_anuj 1w

    सूखी जड़

    मनुष्य वो अपने खेत के केचुए को
    ज़िंदा रखने के लिए अपने पसीने और आँसू से
    सींच रहा था लेकिन सारी मेहनत बर्बाद हो गई।

    अधमरी हालत में उसकी जिंदगी है
    खेत पर सूखी फसल का श्मशान घाट है
    और घर के आंगन में घुन का कफ़न बिछा हुआ है
    उसके श्मशान घाट पर परिंदे केंचुए ढूंढते हैं
    और घर के कफ़न को सूंघते तक नहीं।

    हाथ में, पैर में, चमड़ी में,
    तलवे में, हथेली में और उंगलियों में
    ज़मीन की दरार पड़ गई है,
    क्योंकि उसकी धरती ने अपना कर्ज़ और मर्ज
    उस मनुष्य जो दे दिया है उसके आख़री वक़्त तक,
    जिसे वह कभी भी भर नहीं पाएगा।

    कुछ दिन पहले कुछ केचुओं ने
    सूखी फसल की जड़ों में फांसी लगा ली
    रात के अंधेरे में, क्योंकि मनुष्य
    रात को उन्हें देखने नहीं आता है
    वो केचुए ख़ुद कर्ज़ में थे जब से
    उसकी ज़मीन पर मुफ्त में रह रहे थे,
    खा रहे थे, पी रहे थे और उम्मीद जगा रहे थे

    पर उनसे उस मनुष्य का दुख और दर्द नहीं देखा गया,
    और आज फिर से वही हुआ इसलिए
    मनुष्य ने नमक डालकर सबको
    वहीं पर सुपुर्द ए ख़ाक कर दिया
    और घर के कफ़न पर जा कर सो गया।
    ©अनुज शुक्ल "अक्स"
    ©rangkarmi_anuj

  • rangkarmi_anuj 1w

    ओस

    रातों की बूंद जम सी जाती है
    हर सुबह घास पर
    और उसे पी जाता है सूरज चुल्लू में लेकर,

    घास जोठंड से कांप रही थी रात भर से
    वह धूप की गर्मी से गहरी नींद में सो गई।
    सूरज ने अभी तो बस एक घूँट ही पिया था
    और घास की जड़ों ने खुद को निचोड़ दिया,

    कुछ कुम्हलाई हुई घास ने हवा के
    झोंके और बूंदों से अंकुर को उठाने के लिए भेजा,
    जिससे वह उठकर धरती की चादर को
    छोड़कर उबासी को खिसका कर सूरज से
    आँख मिचौली खेलने लगें।

    पेडों की झड़ी हुई सूखी पत्तियों
    ने पर फैलाकर उड़ना चाहा और हवा ने उन्हें
    गोदी में बिठाकर आसमान की सैर कराने लगा,

    देखते ही देखते सारी पत्तियां उड़ गईं
    और सोए हुए सारे अंकुर जाग गए,
    सूरज अभी भी पानी पी रहा है
    बहुत प्यासा है और सभी घास अपनी अँजुरी से पानी
    पिलाने में उसकी सहायता कर रहीं हैं।
    ©अनुज शुक्ल "अक्स"
    ©rangkarmi_anuj

  • rangkarmi_anuj 2w

    मरीचिका

    जब जब
    तुम्हें ढूंढने का प्रयत्न करता हूँ
    मुझे तुम इंद्रजाल की
    मरीचिका लगी,
    निकट निकटतम
    तुम्हारे आया प्रत्येक क्षण
    ओझल होती गई,
    मैं ऐसे
    मरुस्थल पर स्थित हूँ
    अत्र तत्र मात्र
    तुम्हारी छद्मावरण छाया है।

    मेरे स्वेद में
    भी तुम ही दिखाई देती हो,
    इसलिए उसे अपनी
    जर्जर उंगली से स्पर्श
    नहीं किया अन्यथा
    तुम अंतर्धान हो जाती,
    और मैं
    नव कोपल की भाँति
    तुरंत कुम्हला जाता हूँ।

    तुम्हारा प्रेम
    और मेरा अपनत्व
    धरा और अंबर हैं,
    उनके मध्य में स्थित है
    विश्वास समर्पण का क्षितिज,
    मेरे हर्षोल्लास के
    जल कण से तुम हरित हो जाती हो
    तुम्हारी आँचल रूपी धानी देखकर
    मेरा मन प्रफुल्लित हो जाता है,

    मैं तुम्हें अविरल धारा में
    देखता हूँ, और जब वो
    वाष्प बनकर मेरे
    पास आती है तो
    मैं उसे अपने सिरहाने पर रखकर
    सावन की ठंडी पतंग बना देता हूँ।
    ©अनुज शुक्ल "अक्स"
    ©rangkarmi_anuj

  • rangkarmi_anuj 2w

    रेशेदार साड़ी

    कपड़ो की जगह
    एड़ी को सिलती है,
    एड़ी बंज़र ज़मीन की
    तरह हो गई है,
    क्योंकि वो बचपन से
    ज़मीन को चूमती हुई आ
    रही है।

    आज कल हाथों की
    झुर्रियां और पैर की
    झुर्रियां आपस में बात करती
    हैं, दोनों एक दूसरे को अपनी
    धागे जैसी नसें दिखाती रहती हैं,
    हाथ की उंगलियां जब पैर
    को छूती है तो पैर की झुर्रियां
    खिल उठती हैं।

    उसकी फ़टी एड़ी
    अंकुड़ा बन गई हैं,
    क्योंकि रेशेदार साड़ी बार बार
    वहीं पर जा कर फंस जाती है,

    आधा दिन उलझने और सुलझने
    में निकल जाता है और
    रात एड़ी की मालिश करते हुए
    लेकिन अपनी नहीं
    स्वामी नाम की एड़ी की
    जो उसे रेशेदार साड़ी
    हर रोज़ भेंट करता है।
    ©अनुज शुक्ल "अक्स"
    ©rangkarmi_anuj

  • rangkarmi_anuj 2w

    मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नहीं है खेल प्रिये
    तुम राजधानी एक्सप्रेस रेल हो, मैं हूँ पैसेंजर रेल प्रिये,
    तुम स्कूल में नर्सरी की टॉपर हो,मैं पांच बार नर्सरी फेल प्रिये
    मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नहीं है खेल प्रिये।

    तुम स्मार्ट सिटी की सड़क हो, मैं चूनाभट्टी की सड़क हूँ
    तुम ठहरी नेसकेफ की महंगी कॉफी, मैं टाटा टी कड़क हूँ,
    तुम पढ़ती हो ऑक्सफोर्ड विश्विद्यालय में, मैं बरकतउल्ला का विद्यार्थी हूँ,
    तुम खाती हो पांच सितारा में, मैं भंडारे का शरणार्थी हूँ।

    इस कदर तुम मिलने आओगी कैब से, मैं तो कंगाल हो जाऊँगा
    तुम्हारी वेस्पा में पेट्रोल भर भर कर, मैं तो बेहाल हो जाऊँगा,
    मुझे पसंद है इस्तिमा के रेट तुम्हें पसंद है डीबी मॉल का सेल प्रिये
    मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नहीं है खेल प्रिये।

    तुम रात की सुंदर रागिनी हो, मैं ठहरा डरावना निशाचर प्रिये
    तुम्हें सब कहते हैं मृगनयनी, मुझे बुलाते हैं आलसी खच्चर प्रिये
    तुम्हारी गाड़ी बात करती है पानी से, मेरी रहती हमेशा पंचर प्रिये
    तुम खाती हो छूरी और कांटे से, मुझे मिला जंग लगा खंजर प्रिये

    अपने पापा की तुम परी हो, मैं अपनी मम्मी का मगरमच्छ प्रिये
    तुम जाती हो स्विट्जरलैंड बाली, मैं जाता हूँ देवास सोनकच्छ प्रिये,
    तुम हो मोजीतो ब्लू लगून, मैं हूँ फ़ीका सरबत बेल प्रिये
    मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नहीं है खेल प्रिये।
    ©अनुज शुक्ल "अक्स"
    ©rangkarmi_anuj

  • rangkarmi_anuj 3w

    खूँटा

    वो गाँव की
    औरत जो कभी बच्ची थी
    अब उसकी बच्ची है,
    वो कम उम्र में बूढ़ी हो गई
    और उसकी जवानी ने
    ससुराल की दहलीज़ पर दम तोड़ दिया,
    हाथ उसके खुरदुरे हैं
    उसपर परत जमी हैं
    गेरू और गोबर की
    घर लीपते लीपते लकीरें मिट गईं
    साथ में उसका नसीब वक़्त की तरह
    गायब हो गया।

    उसके घर पर
    एक खाली खूँटा गड़ा है
    जिसमे ज़ंजीर बंधी हुई है,
    ये ज़ंजीर उसकी गाय की थी
    जो उसके मायके से गऊदान में दी गई
    थी जो मर चुकी है क्योंकि वो मायके पक्ष
    की गाय थी इसलिए उसका भरपूर इस्तेमाल किया
    और उसे चारा के नाम पर लाठी मिली और
    ममता के नाम पर मरे बच्चे जो
    भूख से मर जाते थे, उस मरी गाय को
    भी बेचा गया उसका दाम भी लिया गया
    जिससे घर में आया नया हल।

    वो औरत
    सांसों को जाने के लिए कहती है,
    उसे घूँघट में सांस लेने में दिक्कत होती है,
    घूँघट उसका फांसी फंदा है
    जो रोज़ रस्सी पर सूखता है,
    और रात को उस औरत का
    सिंदूर जबरजस्ती उसे खींचता है,
    उसके पेट में तीसरी सन्तान है
    जो दर्द सहती है जैसे सहन किये उसके
    बड़ों ने जो तीन और एक साल के हैं,
    इसलिए खामोश सब सह गए
    पेट के बच्चे को आदत हो गई है।

    पर रात को वो औरत
    चुपके से घर के औसार में जाती है रोज़
    जहाँ पर खाली खूँटा लगा है ज़ंजीर के साथ,
    वो मौन होकर उसे देखती है
    ज़ंजीर को गले मे डाल कर
    हाथ को ज़मीन में रख कर
    घुटनो के बल बैठ कर
    सांसों को भर कर
    गर्दन को झुका कर
    ज़ंजीर को जकड़ कर
    जोर से चिल्लाती है और कहती
    है, हे परम् पिता परमेश्वर
    तू मुझे आदमी बना दे
    और घर के अंदर जो आदमी है उसे
    गाय बना दे, पता तो चले खूँटा और ज़ंजीर
    औसार में नहीं उस घर में भी गड़ा है।
    ©अनुज शुक्ल "अक्स"
    ©rangkarmi_anuj

  • rangkarmi_anuj 4w

    आभास

    सुनो,
    हम दूर अवश्य हैं
    परन्तु हम कहीं न कहीं हैं,
    जैसे भोर में तुम
    पत्तियों की ओस में हो,
    मैं तुम्हारे आँगन की
    तुलसी का फूल,
    तुम दिवस की सूरजमुखी
    मैं रात्रि का जुगनू।

    हम कहीं न कहीं
    प्रकृति में मिलेंगे
    शीत पवन तुम्हें स्पर्श करे
    तो समझना कि मैं हूँ,
    और पेड़ की छाया के नीचे
    मैं विश्राम करूँ अर्थात वो छाया तुम हो,
    पूजा घर के दीये की रोशनी तुम
    और उसका औरा मैं।

    हम हैं आस पास
    भले ही आमने सामने नहीं,
    लेकिन आभास और पूर्वाभास
    में सदैव रहती हो,
    रात्रि के जागरण का
    कारण तुम हो क्योंकि
    मैं रात्रि में ही तुम्हारे लिए
    एक नई रचना लिखता हूँ,

    और तुम उसे एकांत में
    प्रकृति की सहेलियों के
    पास बैठकर मुस्कुरा कर
    हृदय से लगाकर पढ़ती हो।
    ©अनुज शुक्ल "अक्स"
    ©rangkarmi_anuj