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  • rajput_pankaj 12w

    बड़ी मनमोहक बड़ी सुहानी
    है ये राधा श्याम की प्रेम कहानी
    मिलन अधूरा एक दूजे का
    पर फिर भी है राधा प्रेम दिवानी
    बड़ी मनमोहक बड़ी सुहानी
    है ये राधा श्याम की प्रेम कहानी

    राधा है रानी बरसाने की
    श्याम स्लोना लाडला मईया का
    दिन भर जप्ती रहती है राधा
    नाम सांवले कृष्ण कन्हैया का
    होई फिरत है प्रेम मस्तानी
    बड़ी मनमोहक बड़ी सुहानी
    है ये राधा श्याम की प्रेम कहानी

    बांसुरी वाला रंग का है काला
    पर मीरा का श्याम बड़ा मतवाला
    एक बोल में चली आये गइयाँ
    ऐसा जादूगर है यशोदा का नंदलाला
    जाने कैसा जादू डाले सब पर रूहानी
    बड़ी मनमोहक बड़ी सुहानी
    है ये राधा श्याम की प्रेम कहानी

    हर पल गोपियों को बहुत सताता
    गोकुल का नन्द फिर भी सबके मन भाता
    मधुर बांसुरी की धुन गूंजे वृन्दावन में
    प्रेम जगाये जो हर जन के तन मन में
    ब्रिज की होली देख हुई हर रूह दिवानी
    बड़ी मनमोहक बड़ी सुहानी
    है ये राधा श्याम की प्रेम कहानी
    ©rajput_pankaj

  • rajput_pankaj 13w

    भारत माँ

    मैं तेरी मिट्टी से बना
    एक अदना सा पुतला हूं भारत माँ
    चुभती हो दुश्मन को तेरी ये सादगी बेशक
    मगर बस्ता है तेरे भीतर हमारा तो पूरा जहान
    मैं तेरी मिट्टी से बना
    एक अदना सा पुतला हूं भारत माँ

    अथाहा प्रेम मिलता है
    तेरे इस महोब्बत के दामन में
    हर गली हर कुंचा अपना सा लगता
    खूब चाहत भरी है तेरे इस प्यारे आँगन में

    रंग बिरंगे तेरे ये रूप कितने न्यारे लगते हैं
    बेशक ना हो एक माँ के मगर सब लोग प्यारे लगते हैं
    सुबह का सूरज उगते ही चह चहाना ये चिड़ियों का
    रात के दामन में खूबसूरत ये चाँद सितारे लगते हैं

    अलग अलग है बोलियां बेशक
    पर प्यार की एक ही भाषा आती है
    नफरतों के इस दौर में भी यहां सबको
    मिल जुल कर रहने की अदाएं भाती हैं

    कभी कभी घर से दूर रह कर भी
    यहां अपने पन का एहसास रहता है
    बुरा हो वक़्त चाहे कितना भी
    साथ हैं तेरे अपना सा यहां हर शख्स कहता है

    एक है भारत कश्मीर से ले कर कन्या कुमारी तक
    रंक की झोपड़ी से ले कर राजा के तख़्त हजारी तक
    खुदगर्ज से ले कर किसी ईमानदार की खुद्दारी तक
    वाक़िफ़ हैं दुनिया पूरी ज्ञान की कला हमारी तक

    कहीं पहाड़ो से शुशोभित है तेरा प्यारा बदन
    विशाल बगीचों से महका है तेरा प्यारा चमन
    सीमा पर खड़े हैं रक्षा को तेरी कहीं सपूत तेरे
    सिर कटाने को त्यार हैं तेरे खातिर मेरे प्यारे वतन

  • rajput_pankaj 14w

    दुनिया में चली एक रित निराली
    बात बात में देते है गाली
    वहां कैसे बेटी होगी सुरक्षित
    जहां चोर बैठे हैं पैसों की रखवाली

    श्याम बिना अधूरी है राधा
    कहां राम बिन पूरी है सीता
    हनुमत बिना क्या रामायण होगी
    कृष्ण बिना अधूरी है गीता

    भाई बिना क्या रहना जग में
    बहन बिना क्या राखी की महिमा
    माँ बाप की सेवा ही प्रभु सेवा है
    रिश्तों से ही घर की शोभा है

    अपने पन बिन है ईंटो की चार दीवारी
    प्यार से सजा के जो घर है बनता
    बेटी होती है शोभा ख़ुशहाली की
    धन्य है वो घर जो बेटी को है जन्नता
    ©rajput_pankaj

  • rajput_pankaj 14w

    औरत

    ए औरत तु महारानी है
    जग में तेरी अलग कहानी है
    कभी धरा की तु माँ जननी है
    कभी दरिंदो की नजर में तेरी जवानी है
    ए औरत तु महारानी है

    जिस घुंघट को तु कहे बंदिश
    कभी वही तेरे हुसन की रौनक थी
    तेरी लाज शर्म से यहां शुशोभित
    कभी तेरे बाबा की चौखट थी
    जिस्म की नुमाइश ने घेरा ऐसा
    संस्कारों की कहां बाकि निशानी है
    ए औरत तु महारानी है

    लाज शर्म के वो गए ज़माने
    बे-हया हुई आज की पीढ़ी है
    कभी जिस शर्म के खातिर जौहर किया
    आज वही बेशर्मी की पहली सीढ़ी है
    अब वफ़ा का कोई नाम बचा ना
    हर बाजी राव की अनेको मस्तानी है
    ए औरत तु महारानी है

    भूल गयी तु शक्ति खुद की
    अब बहकी बहकी रहती है
    कभी झाँसी की रानी थी जो
    जाने कितने सितम आज वो सहती है
    भूल गयी अब वो लाज शर्म तु
    कभी जिस के खातिर दी जिंदगी की कुर्बानी है
    ए औरत तु महारानी है
    जग में तेरी अलग कहानी है
    ©rajput_pankaj

  • rajput_pankaj 14w

    बेटियां

    नशीब वालों के घर पैदा होती हैं बेटियां
    बदनसीब होती है वो कोख जो खोती है बेटियां
    जरा सी तकलीफ जो हुई पिता को कभी
    फिर दिल की गहराईयों से रोती हैं बेटियां
    बहुत सी ख्वाहिशेँ नहीं रखती बस जीना चाहती हैं
    भाई की कलाई पर राखी देख ख़ुश होती हैं बेटियां
    अगर मिले परवरिश अच्छी तो बेटा नाम रोशन करता है
    मगर बिना किसी ज्ञान के भी बुद्धिमान होती हैं बेटियां
    बचपन में बाबा के आँगन की रौनक होती हैं बेटियां
    भाई की इज्जत की शान होती हैं बेटियां
    शादी के बाद ससुराल में पति का मान होती हैं बेटियां
    कभी माँ बाप कभी भाई कभी सास ससुर
    तो कभी पति की जान होती हैं बेटियां
    बदनसीब होती है वो कोख जो खोती हैं बेटियां
    मगर सच्च पूछो तो ख़ुशी की पहचान होती हैं बेटियां
    चाँद पर जाने का हुनर भी रखती हैं बेटियां
    जिंदगी के खट्टे मीठे एहसास भी चखती हैं बेटियां
    युद्ध के मैदान में दुश्मन को भी घेरती हैं बेटियां
    दुनिया चाहे कुछ भी सोचे इनके बारे
    पर कहां कभी अपनों से मुँह फेरती हैं बेटियां
    आँगन को महकाने वाली फुलवारी हैं बेटियां
    जग में खुदा की बनाई मूर्त न्यारी हैं बेटियां
    ©rajput_pankaj

  • rajput_pankaj 14w

    बेटी

    ज़ब उसने पिता से पूछा तो उन्होंने आरती को कहा के बेटा ये तो समाज के लगाए रीती रीवाज है, निभाने ही पड़ते हैं.मगर आरती को कहीं ना कहीं ये बात अंदर ही अंदर झकझोर गयी थी,के एक बेटी होना भी गुनाह है.माँ बाप चाहे कितना भी काबिल बना दे मगर लड़की की हैसियत और इज्जत सिर्फ दहेज़ से तय की जाती है.
    और आज ज़ब आरती को खुद के घर बेटा पैदा हुआ,तो उसको बेटा पैदा होने की ख़ुशी से ज्यादा कहीं ना कहीं उस बेटी के बाप की फ़िक्र सता रही थी,जो अपनी बेटी की शादी के लिये फिर से एक बार टूटेगा.घर में बेटा हो या बेटी ख़ुशी दोनों के जन्म पर एक समान होती है.मगर बेटी बोझ तब लगती है ज़ब ये नकली समाज अपने झूठे दिखावे के लिये लड़की के बाप से अच्छे खासे दहेज़ की उम्मीद करता है.
    इसी वजह से घर में बेटा पैदा होने की जितनी सबको ख़ुशी थी, कहीं ना कहीं आरती को उतना ही भय सता रहा था.इसी लिये उसका मन व्यथित था, व्याकुल था,किसी गहरी सोच में डूबा किसी बेटी के भविष्य की कल्पना कर रहा था.
    ©rajput_pankaj

  • rajput_pankaj 14w

    बेटी

    बेटा हुआ है बहुत भाग्यवान है,सब औरतें एक दूसरी के साथ दबी आवाज़ में यही बातें कर रही थी.अभी शादी को एक साल ही तो हुआ है और देखो बेटा भी हो गया,इस से ज्यादा भाग्यशाली इन्सान और क्या होगा.आस पड़ोस के सभी बधाई देने आ रहे थे आज सुबह से और रिश्तेदारों के भी फ़ोन पर फ़ोन बज रहे थे.घर के अंदर उत्सव सा माहौल बना हुआ था.सब के सब ख़ुशी से फुले नहीं समा रहे थे.कितनी भाग्यवान बहु आयी थी घर में,आते ही घर खुशियों से भर गया था.मगर एक मन व्यथित है,व्याकुल है, गहरी सोच में डूबा हुआ जाने क्या सोच रहा है.
    आरती अपने माँ बाप की 3 सन्तानो में सबसे छोटी थी.2 भाईओं की अकेली बहन.ज़ब पैदा हुई तो माँ बाप बहुत खुश हुए थे.2 बेटे होने के बावजूद एक बेटी की चाहत थी मन में वो जो पूरी हुई थी.बचपन से ही घर में सबकी लाडली थी आरती.माँ बाप भी बहुत प्यार करते और भाई भी.
    समय एक ऐसा परिंदा है,जिसका पता ही नहीं चलता कब उड़ जाता है.आरती बचपन से ही बहुत होनहार और समझदार लड़की थी.पढ़ाई लिखाई मर भी बहुत होशियार रही हमेशा ही.वक़्त अपनी चाल से चलता रहा और अब आरती पढ़ाई लिखाई खत्म करके शादी के लायक भी हो गयी थी.घर में अब उसकी शादी को ले कर अक्सर बातें होती.उसके पिता भी अब आरती के लिये एक सुयोग्य लड़के की तलाश में लगे हुए थे.और कहते हैं ना के ढूंढने से तो इन्सान को भगवान भी मिल जाता है तो उनको भी आरती के लिये एक सही रिश्ता मिल गया.जो रिश्ते में आरती के मामा ने बताया था.लड़का भी अच्छा पढ़ा लिख कर अच्छी नौकरी कर रहा था.लडके का परिवार आरती के परिवार से कुछ ज्यादा समृद्ध था. मगर आरती के पिता को लड़का पसंद आ गया और रिश्ते की बात भी पक्की हो गयी.
    अब घर में एक और नई बात चल रही थी.लडके वालों की समृद्धि की.बड़ा घर था तो शादी भी उसी हिसाब से करनी पड़ती. आरती के पिता बेटी के अच्छे भविष्य की सोच कर सब कुछ कर रहे थे. वक़्त बिता और शादी का दिन भी आ गया.सब कुछ बहुत धूम धाम से हुआ.शादी में लडके वालों को एक अच्छी खासी रकम दहेज़ में दी गयी.मगर बेटी हमेशा अपने पिता के चेहरे की मायुशी पढ़ लेती है.
    ©rajput_pankaj

  • rajput_pankaj 34w

    भिखारी

    मैं भिखारी हूं जात का
    खाता हूं मैं मांग कर
    रग रग मेरी शर्म बसी
    बिगाड़ोगे क्या लाठी भांज कर
    हूं इतना ढिट मैं
    हर रोज तमाशा नया कर बैठूं
    घर बना रहा हूं रिस्वत से
    दुश्मन से ले ले कर ईंट मैं
    कभी किसानों के नाम के हला
    कभी आरक्षण की नौटंकी करता हूं
    मुझे मतलब नहीं
    देश में होने वाले कोहराम से
    बस मैं घर अपना अपना भरता हूं
    है अनपढ़ मुर्ख लोग यहां
    जो मेरी बातों में आ जाते हैं
    अपनों के ही बन बैठे है दुश्मन सब
    अपनों के ही घर जलाते हैं
    अब बैठा हूं सड़कों पर
    नाम किसानों का ले रखा है
    पर सच्च तो ये ही है सारा
    के मैंने जमीर गिरवी दे रखा है
    मुझे फर्क नहीं किसी के मरने से
    मतलब है बस खुद की जेबें भरने से
    कभी भूख हड़ताल पर बैठूं
    कभी देश बंद का आह्वान देता हूं
    मगर मुफ्त में कहा कुछ करता हूं
    मैं देश बेचने का पैसा दुश्मनों से लेता हूं
    अपमान सहा तिरंगे ने
    वो सब मेरी ही रचि कहानी है
    तोड़ रहे थे नियम जो सारे
    वही तो भटकी हुई जवानी है
    सब चोर हुऐ है इकट्ठे एक जगह
    वास्तव में यही एक सच्चे राजा की निशानी है
    समय बदला युग बदले बदल गया माहौल भी
    दिन दूर नही रहा अब वो भी
    ज़ब खुल जाएगी चोरों की पोल भी
    ©rajput_pankaj

  • rajput_pankaj 35w

    मेरी गुड़िया

    ज़ब वो पैदा हुई तो चारो तरफ,सुनाई देती उसकी किलकारी थी
    अजब थी वो नन्ही सी परी उसकी, उसकी सब ही बातें न्यारी थी
    फुल खिला था जिस आँगन में,वो मेरे घर की ही क्यारी थी
    बहुत दूर चली गयी आज वो नन्ही परी,जो मुझको जान से भी प्यारी थी

    कुछ समझ ना पाया कोई,इस से पहले ही वो अलविदा कह गयी
    दिल में जो हसरतें थी,वो सारी की सारी दिल में ही रह गयी
    भूल नहीं पाउँगा वो पल वो घड़ियां,जो उसने मेरे साथ गुजारी थी
    बहुत दूर चली गयी आज वो नन्ही परी,जो मुझको जान से भी प्यारी थी

    माँ के आँचल में छुप कर,उसका वो रोना याद आएगा
    कभी मासूम से चेहरे से,खिलखिला कर हंसना बहुत रुलाएगा
    अजीब सी मासूमियत थी उसमे,उसकी हर झलक सबसे न्यारी थी
    बहुत दूर चली गयी आज वो नन्ही परी,जो मुझको जान से भी प्यारी थी

    कुछ सपने बाबा के भी टूटे हैं,उसके इस कदर जाने से
    जिसकी सारी थकावट उतार जाया करती थी,बस उसके एक मिठ्ठे मुस्कुराने से
    बाबा नें उसके हर सपने को सजाने की,कर रखी हर तयारी थी
    बहुत दूर चली गयी आज वो नन्ही परी,जो मुझको जान से भी प्यारी थी

    कश ऐसा हो के फिर से खिल जाये,वही फूल बनके मेरे आँगन में
    खुशियां ही खुशियां भर से आकर,फिर से सब के दामन में
    बहुत ऊँची उड़ान भरने की,कर जिसने रखी हर तयारी थी
    बहुत दूर चली गयी आज वो नन्ही परी,जो मुझको जान से भी प्यारी थी

    नानी ने भी उसके लिये आँखों में,कुछ सुनहरे ख़ाब सजाये थे
    माँ नें भी कुछ एहसास उसके लिये,अपनें दिल में बसाये थी
    पर आज सबके दिल में,बस उसे एक बार देखने की बेक़रारी है
    बहुत दूर चली गयी आज वो नन्ही परी,जो मुझको जान से भी प्यारी थी
    ©rajput_pankaj

  • rajput_pankaj 40w

    मैं बुरा हूं

    मैं बुरा हूं इस लिये
    क्योंकि हर किसी के बुरे वक़्त में काम आता हूं
    ज़ब निकल जाये मुझसे मतलब
    फिर होके सबसे बदनाम आता हूं
    मैं बुरा हूं इस....

    हैं आदते बुरी मुझमें भी
    की मैं हर किसी की बातों में आ जाता हूं
    दिन के उजालों से मतलब नहीं ऱखता
    बनके दिया करने उजाला अँधेरी रातों में छा जाता हूं
    किसी के सुःख में जाता नहीं बिन बुलाये मैं
    मगर गमों में खुद ही चला सरे आम आता हूं
    मैं बुरा हूं इस...

    कभी कभी मुझे भी महसूस होता है
    की कोई काम ना आया मेरे ज़ब भी मन मायूस होता है
    मगर समझा लेता हूं खुद को ही
    की इन्सान ही तो हूं तभी इंसानों के काम आता हूं
    मैं बुरा हूं इस....

    मुझे आता नहीं औरों की तरह मीठा बन जाना
    मैं जैसा हूं वैसा ही खुद को दिखाता हूं
    खुद के आंसू छुपा कर आँखों में
    लोगों को हंसाने के अफसाने हर दफा सुनाता हूं
    मैं बुरा हूं इस....

    मतलब से मैंने कभी कोई रिश्ता बनाया ही नहीं
    एक कमी ये भी है के बेवजह रूठे को कभी मनाया ही नहीं
    मैं तो दिल की ख़ुशी के खातिर मिट जाता हूं
    कभी सोच कर किसी के पास कहाँ अंजाम आया हूं
    मैं बुरा हूं इस....

    दिखावे के रिश्ते समझ नहीं आये मुझे
    मैंने जलाये है सबकी राहों के दिये जो थे बुझे
    कोई लाख गिनवाये गुनाह मेरे बेशक
    मगर मैं बदले में फिर भी करके सलाम आता हूं
    मैं बुरा हूं इस....

    मैं शुक्र गुजार हूं उनका
    जिन्होंने मुझको मुझसे ज्यादा जाना है
    समझते हैं जो खुद को खुदा वो लोग और हैं
    मैं तो मिट्टी का एक कतरा हूं और मिट्टी में मिल जाता हूं
    मैं बुरा हूं इस लिये
    क्योंकि हर किसी के बुरे वक़्त में काम आता हूं
    ©rajput_pankaj