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  • raghvendra 88w

    छोटी चिड़िया"

    मेरे घर के आँगन में एक छोटी चिड़िया रहने आई।
    जीवन में क्या बीत रहा आज तो वह कहने आई।
    मन में करुणा थी उसके और व्यथा सुनाने को आई।
    मन की पीड़ा खुद ही जाने मन में कितनी है गहराई।
    कैसे मानव ने हाथों से उसके घर को ही गिरा दिया।
    अब रहे कहाँ नन्ही सी जान जिस वृक्ष ने इसको सिरा दिया।
    काटा वृक्षों को मानव ने था प्रकृति ने जिनका श्रृंगार किया ।
    छोटी सी नन्ही जान ने था वृक्ष को अर्पण संसार किया।
    कल तक जहाँ उस नन्ही जान ने अपना संसार बसाया था।
    अपने सपनो का छोटा सा महल वहाँ एक बनाया था।
    खून पसीना बहा बहाकर दूर से तिनका लाई थी।
    न जाने कितनी यादें वह वहाँ बसाकर आई थी।
    मुझसे कहती रोती जाती अपनी व्यथा न कह पाती।
    थी मन में करुणा की नदी कोई वह आज कहीं न बह पाती।
    मन मेरा भी हुआ व्याकुल यह सुन कि मानव बदल गया।
    अपने घर की खातिर वह दूसरों के घर को बदल गया।
    हे मानव तू नन्ही सी जान को कभी दूर न कर देना।
    ये प्रकृति की सुंदरता हैं इन्हें अपने घर में घर देना।

    ©raghvendra

  • raghvendra 88w

    नींदों में आने वाले ख्वाब बन गये हो तुम।
    मेरे हर एक सवाल का जवाब बन गये हो तुम।
    कितना भी महकती कली को देख लूँ मैं।
    मेरे लिए तो खिलते हुए गुलाब बन गये हो तुम।
    ©raghvendra

  • raghvendra 88w

    *रेत पर था लिखा*

    रेत पर था लिखा कुछ अलग आज जब
    एक आई लहर वह बहा ले गई।
    मन भी व्याकुल हुआ सोचकर आज फिर।
    मेरे सपनों को वह कहाँ ले गई।
    था जो अनुराग उनसे व्यक्त कर न सका।
    मेरे सपनों को शायद सजा ले गई।
    एक रिश्ता बनाया था रेत से आज फिर।
    उससे कह न सका वह रजा ले गई।
    उसने पत्थर समझ के था ठुकरा दिया।
    नाम जिसका लिखा फिर मिटा ही नहीं।
    अब तो शब्दों से शब्दों का मिलन हो गया।
    नजरें ऐसी हटी कुछ दिखा ही नहीं।
    मेरे सपनों में वह इस तरह बस गई।
    उसकी अनुपम सी आकृति बन गई।
    उसके नाम में ही कुछ अलग था दिखा।
    हृदय में वह सुंदर प्रकृति बन गई।
    मैं तो लिखता रहा वह बहाती रही।
    थक गई हारकर मुझसे कहने लगी।
    तार हृदय से मेरे जब उसके जुड़ ही गये।
    हृदय के वश से ही मन्द बहने लगी।
    ©raghvendra