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  • raaz_meghwanshi 71w

    काश !
    कभी फुर्सत से तुम्हारे साथ बैठूं जहां कोई न हो
    तुमको देखूं , निहारूं
    तुम्हारी आंखों में आंखें डाल कर देखूं
    फिर तुम्हारी आंखों में कुछ ख़ूबसूरत अल्फ़ाज़ों की लड़ियां बुन लूं
    अल्फ़ाज़ जो बयां करें तुम्हारी ख़ूबसूरती को बहुत खूबसूरती से
    फिर काग़ज़ क़लम मिले तो इत्मिनान से उन अल्फ़ाज़ों की लड़ियों को काग़ज़ पर सजा दूं
    अगले रोज़ मिलो तो फिर तुम्हारी आंखों में आंखें डाल कर देखूं
    फिर तुम्हारी आंखों में खूबसूरत अल्फ़ाज़ों की लड़ियां बुन लूं
    अल्फ़ाज़ जो बयां करें तुम्हारी ख़ूबसूरती को बहुत खूबसूरती से
    फिर उसी इत्मिनान से उन ख़ूबसूरत अल्फ़ाज़ों की लड़ियों को काग़ज़ पर सजा दूं
    ऐसा हर रोज़ करूं, बार बार करुं
    मालूम है तुम फिर शिकायत करोगी कि 'यार ! तुम चुप क्यूं हो ? बोलते क्यूं नहीं ? ऊब गए हो क्या ? ऐसे मत रहा करो ना !'
    मगर मैं बुनता रहूंगा ख़ूबसूरत अल्फ़ाज़ों की लड़ियां तुम्हारी आंखों में आंखें डाल कर
    कुछ इस तरह मैं तुम्हारी आंखों में अपना साहित्य बना लूंगा
    साहित्य जो बयां करें तुम्हारी ख़ूबसूरती को, तुम्हारी सहुलियत को
    साहित्य जिसमें कविताएं हों तुम पर
    साहित्य जिसमें ग़ज़लें हों तुम पर
    साहित्य जिसमें नज़्में हों तुम पर
    साहित्य जिसमें शायरियां हों तुम पर
    साहित्य जिसमें रूबाइयां हो तुम पर
    साहित्य जिसमें क़िस्से हों तुम पर
    साहित्य जिसमें सिर्फ तुम हो, सिर्फ तुम.....

    ©raaz_meghwanshi

  • raaz_meghwanshi 82w

    मार्क्स ने कहा मज़दूर का ना कोई देश
    ना कोई सरकार
    फिर मज़दूर है क्या, कैसे लाता है आहार,
    उसके सपनों को सत्ता की बेड़ियों ने जकड़ा है
    उसे किसी महामारी ने नहीं बल्की गरीबी ने पकड़ा है,
    गलतफहमी है कि देश सरकार और अमीर चलाते हैं
    जब अकाल पड़ता है तो सबको किसान, मज़दूर याद आते हैं,
    अमीरों की औलादें तो पासपोर्ट से उड़ आती है
    घर पहुंचने की आस में मज़दूर की नींदें उड़ जाती है,
    मकान की एक ईंट रखना भी है आसान क्या मज़दूर के बिना
    अमीर की ज़िंदगी भी चलती है क्या मज़दूर के बिना,
    दिन में सौ दो सौ कमा ले तो आंखें चमक जाती है
    घर में चूल्हा जल जाता है रात में राहत की नींद आ जाती है,
    सत्ता की बर्बरता मेहनत को जात - मज़हब में तौल लेती है
    मज़दूर की पहचान का गला कंबख्त ग़रीबी घौंट देती है,
    कभी मज़दूर नीच और अछूत बन जाता है
    ढोंगी इंसान उसके बनाए मंदिर में माथा टेक आता है,
    ज़ाहिल उसकी मेहनत को नफ़रत से रौंदते है
    वो क्या साबित करे इस देश का होना
    वो नफ़रत वाले उसके बनाए मकानों में सोते हैं,
    ना आधार होता है ना राशन कार्ड होता है
    मज़दूर है साहब उसको तो अपने बच्चों का पेट भरना होता है
    मज़दूर की ना कोई सरकार ना देश होता है...
    ©raaz_meghwanshi

  • raaz_meghwanshi 92w

    मैं बयां करता तो हूं ,
    मैं कोशिश करता तो हूं ,
    पर तुम बस बातें करते हो ,
    मेरा इज़हार तुम्हारी बातों तले दब जाता है......

    ©raaz_meghwanshi

  • raaz_meghwanshi 96w

    उसके घर ठहरते तो उम्र भर ठहरते

    हम तो उसके मुसाफिरखाने के बस मुसाफिर ही थे..

    ©raaz_meghwanshi

  • raaz_meghwanshi 96w

    रिश्ते - नातों की फटी चद्दर में सूईयां पिरोई हैं

    कच्चे - पक्के धागों से कुछ यादें संजोई हैं.....

    ©raaz_meghwanshi

  • raaz_meghwanshi 97w

    रुकसत होने की तो बात पुरानी है

    आंखों से मगर ओझल कैसे होवोगे


    ©raaz_meghwanshi

  • raaz_meghwanshi 97w

    फातिमा न सही, सावित्रीबाई न सही

    मगर लाज़िम है कि

    मकां बचाने हर औरत अब 'शाहिन बाग'सी हो


    ©raaz_meghwanshi

  • raaz_meghwanshi 99w

    ये नफ़रत का सिलसिला अब खत्म क्यूं नहीं होता
    इंसानियत से मोहब्बत का अब मिलन क्यूं नहीं होता
    क्यूं मेरी कलम परेशान है इतनी
    मैं महबूब पर लिखूं या क्रांति पर लिखूं
    सवाल है कि ये देश कभी वसुधैव कुटुंबकम् क्यूं नहीं होता
    क्या ये बेहतरी है कि लाठियों और गोलियों से हमन मर जाए
    हमन सही है तो फिर हमन का आवाज़ उठाना सही क्यूं नहीं होता
    लाज़िम है इंतकाल तानाशाही का और तख्तापलट होना है ज़ाहिल सियासत का
    मगर अंधा बाशिंदा अपने पंखों में लगी आग से होशियार क्यूं नहीं होता
    वो रोकते हैं हमन को क्रांति की किताबें पढ़ने से
    वो डरते हैं,
    उनको हमन का अंबेडकर - गांधी पढ़ना मंज़ूर क्यूं नहीं होता
    ©raaz_meghwanshi

  • raaz_meghwanshi 101w

    कितने ख्वाब बाकि है, कितने इम्तिहान बाकि हैं

    जो सोचता था मैं हूं मुस्तकबिल क़ौम का

    अब सोच में है क़ौम के कितने राज़ बाकि हैं

    गलत कौन था और अब सही कौन है

    तालीम हासिल की कोशिश में कितने सबक बाकि हैं

    मसला है अब खुद को इस मिट्टी का साबित करने का

    एक - एक कर जल रहें हैं सब जामियां

    आज मेरा, कल तेरा और जलने कितने मकान बाकि हैं

    ©राज़ मेघवंशी

  • raaz_meghwanshi 101w

    ये कैसा भ्रम है उनको
    क्या वो कहेंगे तो सावरकर को वीर लिख देंगे ?
    खूनी सियासत में चीखंता एक कश्मीर लिख देंगे ?
    वो ना बना पाएं जनता को पागल तो अख़बारों में छल्लिये को फ़कीर लिख देंगे ?
    इस देश को हिंदुराज़ लिख देंगे ?
    मुसलमान का पाकिस्तान लिख देंगे ?

    हम लोग अम्बेडकरवादी हैं
    हम गांधी की अहिंसा वाली लाठी है
    भगतसिंह की जवानी वाले, हम क्रांति करने के आदि है
    वो कब तक डराएंगे लाठी - गोली से
    न हिंदू न मुसलमां , हम सिर्फ भारतवासी हैं

    ना लिखेंगे हिंदूराज , ना लिखेंगे कोई संघवाद
    'हिटलर' भी था हारा अंततः
    तख्तापलट कर जनता का राज लिख देंगे
    क्रांति की गुहार से गांधी-अंबेडकर की आवाज़ लिख देंगे
    ©raaz_meghwanshi