raakhaa_

#फालतू बातें

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  • raakhaa_ 1h

    मन्ज़िल का डेरा ज़रा छोटा है, राखा!
    सफर के यहाँ, आज जश्न मनाया जाए...

    ©raakhaa_

  • raakhaa_ 1d

    #faaltu_baatein

    ��एक सच बताऊं....
    जब थोड़ा बुरा लगता है, अतीत डराने को दौड़ता है, मैं अपने कमरे में एक कलम और कागज़ लेकर बैठ जाती हूँ। मुझे नहीं पता होता है क्या लिखना है, मैं कलम घिसती हूँ, वो खुद-ब-खुद कविता हो जाती है। ��

    गोविंद की कृपा है����

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    सवेरों में मुझे जब रात काली दिखने लगे जाए,
    मेरे मन की व्यथाएं यूँ सरेआम बिकने लग जाये।

    तुम ऐसा मोल रखना , खरीद लेना मुझको हे केशव!
    वो मुझसे दाम पूछें, हाथ तुमको लिखने लग जाये।

    मेरी नैय्या के केवट तुम बनो, नैय्या भी तुम होना,
    पालना मेरा तुम्ही हो, मेरी शैय्या भी तुम होना।

    मुझे तेरे ही धामों में बना के दास रख लेना,
    मेरी लोरी तुम्ही तो हो, मेरी मैय्या भी तुम होना।

    अतितों का बड़ा है भय, कैसे पार आऊं मैं?
    बिना टूटे ही हे गिरिधर! कैसे वार खाऊँ मैं?

    मेरा प्रारम्भ तुम ही थे, मेरी अंतिम तुम्ही इच्छा,
    तुम्हें जीतूं मैं दुनिया से, ये दुनिया हार जाऊं मैं।

    बंसी की तानों में छिपाकर मुझको रख लेना,
    या अपने चरनों में जीने का, हे माधव! हक मुझे देना।

    तर जाऊं मैं हर बाधा, मुझे आशीष दे दो तुम,
    ये दुनिया रूप परखेगी, तुम मेरा मन परख लेना।
    ©raakhaa_

  • raakhaa_ 3d

    #faaltu_baatein
    �� गोविंद��

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    उसके होने का एहसास अलग है! बहुत अलग...

    उसकी बांसुरी में जितना वो है, उतना ही उसके मोर पखा में। जितना वो अपने माखन मिश्री के भोग में दिखता है, उतना ही अपने कानों के कुंडल में चमकता है। जितना अपने चन्दन टीके में निखरता है, उतना ही अपने चरणों मे समर्पित तुलसी में महकता है! जितना वो अपने विग्रह में समाया है, उतना ही अपने भजनों में सुनाई देता है।

    अपने कमरे से दूसरे कमरे तक के सफर में उसकी झांकी पड़ती है। मैं हर बार ठिठक कर , उसे दो पल निहार कर ही गुज़रती हूँ। सुबह उसका श्रृंगार मैंने ही तो किया था! मैंने ही उसे पीताम्बर में सजाकर, तिलक किया था। उसके कंठ में एक माला, हाथों में चूड़ा, बाहों में बंसी, चरनों में तुलसी और सिर पर मोर मुकुट .... मैंने ही तो रखा था। पर उसे जितनी बार निहारती हूँ, मानो ऐसा लगता है, जैसा श्रृंगार किया था उससे सौ गुना ज्यादा निखरा हुआ रूप है।

    मैं नही समझ पाती ये क्या लीला है! ये प्रेम है, अपार प्रेम...ये भरोसा है, धैर्य है, मैत्री है, समरपण है....या इन सबका समावेश...पता नहीं।

    मैं बस इतना जानती हूँ, वो गोविंद है, और मैं .... और मैं? मैं...पता नहीं!!
    ©raakhaa_

  • raakhaa_ 4d

    #faltu_baatein
    काफी है��

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    गर्दिशों में जीते हैं तारे आजकल,
    तारे हैं, और जीते हैं...इतना काफी है!!

    ©raakhaa_

  • raakhaa_ 1w

    #faaltu_baatein

    डंके - गुरूर की पहचान
    शोर - मन को द्रवित करने वाली चीज़ें (materialistic desires)
    अरि - शत्रु

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    ......

    कुपित कठोर मन का होना, फिर हारे-मारे थक सोना,
    बोल कहाँ ले जाएगा, किस दिशा तुझे पहुंचाएगा?

    व्यथित पथिक मन होता है, और भाग्य भरोसे सोता है,
    क्यों विपदा बाज़ी मार गयी? क्यों शक्ति मन से हार गई?

    तीर नहीं तलवार नहीं, चंचल मन इनके पार कहीं,
    भटका के तुझे सताएगी, न सत्य तुझे बतलायेगी!

    जब चारों ओर सब काला हो, और कोई न सुनने वाला हो,
    एक ओर झुका सर दोहराना, हरि-हरि तुम चिल्लाना!

    बन धैर्य हरि आ जाएंगे, उस मन मे वो बस जाएंगे,
    जब तेरे मन मे हरि रहे, तो कैसे मन फिर अरि रहे?

    मन से तेरी फिर हार नहीं, मन से कोई भी रार नहीं,
    मन जगविजयों की धूरी है, और मनोविजय ज़रूरी है,

    जो खुद के मन से हारेगा,तो फिर किस-किस को मारेगा?
    क्योंकि फिर तू तेरा दुश्मन,तेरा जीवन ही तेरा रण!

    जब शोर यहां बढ़ जाएगा, और मन तेरा अकुलायेगा
    मन मे रखना हरि नाम कहीं, राम कहीं, घनश्याम कहीं,

    डंके बजते हर ओर सुनो, एक सत्य कहूँ पुरज़ोर सुनो!
    हर हारे के हर ओर सखा, हरे हरि हर शोर सखा!

    हरे हरि हर शोर सखा...

    ©raakhaa_

  • raakhaa_ 1w

    मैं तो नहीं हूँ काबिल...तेरा पर कैसे पाऊं,
    टूटी हुई वाणी से...गुणगान कैसे गाउँ��

    #faaltu_baatein

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    घर-आंगन औ' राज भुलावे, राह निहारे मतवारी,
    हीरा-मोती फीका लागे, ब्रज-रज भावे गिरधारी!

    ©raakhaa_

  • raakhaa_ 2w

    बच्चों सा बचा नहीं कुछ, बस बेवकूफी के अलावा...
    चलो मुझको भी Happy Children's Day!!

    ©raakhaa_

  • raakhaa_ 2w

    चञ्चलं हि मन: कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् |
    तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ||

    The mind is very restless, turbulent, strong and obstinate, O Krishna. It appears to me that it is more difficult to control than the wind.

    The way you guided Arjun...O my ParthSarthi!! Help me...I beg...Help me!!

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    I don't know the exact reason, but they are forming a different image of mine in their minds. I don't know the day it started, but the present is all full of them.

    People think I have grown SERIOUS... WAY TOO SERIOUS.
    My teachers ask my friends 'Whats making Shikha so sad?' My friends say I have got a SERIOUS FACE. (Can someone tell what's this serious face??)

    I don't enjoy more maybe....But wait!! I am not sad. I am happy....Yes, not satisfied, not relaxed,but.....Neither sad too!!

    Sorry I can't make out a fake smile....Sorry I am all done with it. But when you will see me around people I am comfortable with, you will see me happy...That's obvious! Right?
    But the thing that's not obvious is that 'those' same people say I've got a serious face!! How????? That's a mystery.

    Maybe I am not happy....Maybe! But I know I am...Or maybe not....

    ©raakhaa_

  • raakhaa_ 3w

    Self realization (maybe)

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    It takes a lot...But eventually you understand....

    Everything never mattered, and everything will never matter!
    And the world's more admirable than you think.

    ©raakhaa_

  • raakhaa_ 5w

    #faaltu_baatein

    जो करना था वो कर भी रही हूँ या नहीं?....

    शजर - पेड़

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    दबकर बैठी हैं ख्वाहिशें, किसी छोटे से शजर में,
    मुकामों के अब चर्चे हैं, "राखा" के शहर में...

    ©raakhaa_