purujit_kothari

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एक भटकता आवारा इंसान!

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  • purujit_kothari 1w

    || ताज़ ||

    रूबरू होकर ताजमहल नहीं देखा है मैंने कभी,

    तुम्हें देखा है

    मेरा अब ताज़ देखने का कोई ख़ास मन नहीं !

    ©purujit_kothari

  • purujit_kothari 1w

    || तुम ||

    दिसम्बर की ठंड में
    निकली हल्की धूप हो तुम

    कहूँ भी तो कैसे कहूँ
    बड़ी ही खूब हो तुम

    ©purujit_kothari

  • purujit_kothari 1w

    || गाॅंव का मकाॅं ||

    सुना था दिल बस इश्क़ में टूटता है,
    मैंने आज बचपन की यादों को टूटते देखा!

    ©purujit_kothari

  • purujit_kothari 1w

    || राह-रौ ||

    मैं राह-रौ नहीं,
    फ़िर भी अक़्सर गुज़रता हूॅं तेरे शहर से!

    ©purujit_kothari

  • purujit_kothari 11w

    || मुसाफ़िर ||

    रास्ते अनजान हैं बड़े, ना जाने मैं किधर जाऊँगा
    मुसाफ़िर हूॅं सफ़र का, कहीं से तो गुज़र जाऊँगा।

    मिलेंगे कई हमराह, इस रहगुज़र पर चलते चलते,
    तिरी नज़रों का कैदी हूं, तेरे शहर ही ठहर जाऊँगा।

    ज़रा सा सॅंवार ले, चेहरे पर आती उन ज़ुल्फ़ को,
    गर आया झोंका हवा का, उन्हीं में उलझ जाऊँगा।

    बाकी है तुमसे गुफ़्तुगू अभी, तुम जागती रहना,
    मैं अंधेरी रात में, एक सहर छोड़ जाऊँगा।

    यूॅं तो काफ़िले में साथ हैं कई और भी,
    पर ज़रा तेरा साथ हो, शायद मैं सुधर जाऊँगा।

    ©purujit_kothari

  • purujit_kothari 31w

    || शाम ||

    एक शाम की ललक है मुझे
    एक शाम जो मेरे घर की छत से दूर हो!

    जब सूरज अपने घर को चला हो,
    आसमां में एक लाली सी छायी हो,
    पंछी उस शाम की लालिमा में,
    लाल होने को दौड़ रहें हों।
    सामने हो समंदर का एक किनारा
    मिट्टी की सौंधी सी खुशबू,
    जहां लहरें किनारों से टकरा कर
    उन ठंडी हवाओं के साथ
    जैसे कोई राग गा रही हो,
    और नज़दीक बैठी हो तुम।

    तुम हर पल हाथों से चेहरे पर आती जुल्फें हटाती,
    अगले पल फिर वो हवाएं उन्हें वहीं ले आती!

    उन हवाओं और जुल्फ़ों की कश्मकश की ललक है मुझे!

    ©purujit_kothari

  • purujit_kothari 39w

    || उम्मीद ||

    क्रंदनों का शोर, फिर से उठ चला है हर तरफ़
    बेबसी का दौर, फिर से उठ चला है हर तरफ़
    गिनती सांसों की लगी है चलने, फिर से हर तरफ़
    ढ़ेर लाशों के लगे हैं जलने, फिर से हर तरफ़

    नेताजी, तुम लगे रहना, अपनी रैलीयों की होड़ में,
    पीछे ना रह जाना कहीं, मढ़ने दोषों की दौड़ में,
    जनता तुम भी देखना कहीं, एक डुबकी कम ना लग जाए,
    आदमी, मरता मरे, पर तुम रहना अपनी चौड़ में,

    ख़ैर हैं मसीहा अब भी कई, खाकी-सफ़ेद वर्दियों में हर तरफ़
    पोंछ अश्कों को स्वयं के, मदद का हाथ फैलाए हर तरफ़
    हिम्मत बंधा कर खुद को, थामना उम्मीद तुम भी ज़रा,
    लंबी है दुखों की रात पर, खुशी का सूरज निकलेगा कल फिर हर तरफ़।

    ©purujit_kothari

  • purujit_kothari 45w

    || ख़्वाब ||

    दबे पांव आज फिर से,
    दस्तक दी थी उसने!

    आंखें खोल, इधर-उधर देखा मैंने,
    मगर, वो थी नहीं आस-पास।

    उसकी वो घंटी बजाकर,
    भाग जाने की आदत,
    ख़्वाबों में भी है।

    ©purujit_kothari

  • purujit_kothari 47w

    || यादें ||

    कब तलक सिर्फ़ यादें तेरी, आती रहेंगी,
    निकल कर ख़्वाब से ज़रा, रख क़दम, मेरे शहर में!

    ©purujit_kothari

  • purujit_kothari 48w

    || इश्क़ नामा ||

    अनकही बातें हैं कई, कभी तो जबां पर आएगी,
    सूखने को है स्याही, बातें कब तक ही लिखीं जाएगी!

    पते से अनजान हूॅं उसके, बस शहर का नाम वाक़िफ़ है,
    कोई तो गाड़ी होगी, जो उसकी गली को जाएगी!

    खाली सा है कमरा मेरा, दीवारें वीरान लगती है,
    पर्दों का रंग जो चुन ले वो, तो दीवाली मनाई जाएगी!

    नज़्मों से हैं भरे पन्ने, वो आधी लिखी ग़ज़लें,
    असर-ए-मय हुआ जिस दिन, उसे सब गुनगुनाई जाएगी!

    ©purujit_kothari