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  • purnimaindra 1w

    थोड़े ही है

    सामान थोड़ा बिखरा पड़ा रहने दो
    ये अपना घर है कोई होटल थोड़े ही है।

    बैठ लो ज़रा दादी नानी के पास किस्से कहानियां हैं अख़बार थोड़े ही है।

    खाओ चाहें पिज़्ज़ा बर्गर मोमोज़ कितने
    दही-भल्ले ,चाट,कांजी बड़े थोड़े ही है।

    पहनों कितनी ही जींस,प्लाज़ो ,लैगिंग ये भारतीय परिधान साड़ी थोड़े ही है।

    होंगे गगन में लाखों चांद सितारे कितने ही
    ये मेरे हिस्से का आसमान थोड़े ही है।

    मकानों में बन गये कमरे ,लॉबी
    वहां आंगन और दालान थोड़े ही है।

    भूल गये सब बाग-बगीचे, ताल-तलैया
    यहां उड़ती मिट्टी की सोंधी महक थोड़े ही है।

    रिश्ता अपनों से बना रहे या टूटे कभी
    दोस्तों तुम पर ये इल्ज़ाम थोड़े ही है।

    भटक रहे किस तरह इस दुनियां में हम
    ये जिंदगी का आखिरी मुक़ाम थोड़े ही है।
    ©purnimaindra

  • purnimaindra 1w

    आंसू भी न दें मोहलत,
    कुछ न कहने की ठानी है।
    ये है इक मोहब्बते इबादत,
    बस इतनी ही कहानी है।
    ©purnimaindra

  • purnimaindra 17w

    दो जोड़ी हाथ
    ************

    जेल की सीखचों के पीछे
    अपराधिनी सी खड़ी
    सलाखों पर
    अपने एक जोड़ी हाथों से
    टटोलती रही
    "अपने एक जोड़ी हाथों को"
    जिनकी मुट्ठी में शायद--
    मेरे अपने ही सपने
    अपना सारा आकाश
    मेरी अपनी ही आकांक्षाएं
    मेरी अपनी पूरी जीवन लीला बंद थी।
    ठीक एक दुनियां में आए
    नवागन्तुक शिशु की तरह
    जो भाग्य बंद किए थी
    मुट्ठी में।
    और टटोल-टटोल कर
    उन रेखाओं में अपना जीवन-दर्शन
    खोज रही थी।
    और मैं भी--
    सलाखों के उस पार के
    एक जोड़ी हाथों को
    जो पृथक संवेदना के थे,
    टटोलती रही,रोती रही,
    अपनी व्यथा सुनाती रही।
    जल्दी पास बुलाने की
    मिन्नतें करती रही।
    लेकिन साथ ही
    सलाखें थे कि
    दो जोड़ी हाथों के बीच
    दीवार बन कर खड़े हो गये थे।
    जो मुझे और उसे
    आपस में देखने तो देती थीं,
    पर आलिंगन में बंधने को
    तीखी नज़र से देखती थीं
    शायद इसकी ईर्ष्या ही थी यह
    या फिर शायद-
    ये सींखचे भी सौतेलेपन का
    रूप प्रस्तुत करते रहे।
    मैं उसकी उंगलियों में
    वह मेरी उंगलियों में
    उंगलियां फंसाए--
    आलिंगनबद्ध होने को आतुर
    सारा दुखड़ा,बीती यादें,आने वाले पल
    सारा प्रेम,सारा आह्लाद, विषाद
    एक साथ परस्पर
    बिखेरने को आतुर
    एक दूसरे को निरीह सा ताकते रहे,
    आंसुओं की ज़ुबान से सब कुछ कहते रहे।
    और बार- बार इसी तरह
    मेरे व उसके दो जोड़ी हाथ
    सलाखों के आर-पार
    मिलते रहे।
    अनकही बातें कहते रहे।
    अपनी इच्छाओं को
    इन्हीं दो जोड़ी हाथों से कुचलते रहे।
    और चार वर्षों की
    अवधि खत्म होने की
    प्रतीक्षा करते रहे।
    ©️®️ purnima Indra



    ©purnimaindra

  • purnimaindra 17w

    दे जाओ
    ********


    सिफारिश है ये दिल की नज़र झुका के आ जाओ
    बड़े बेताब बैठे हैं मिलकर गले आकर के लग जाओ।
    बड़ा सूना सा जीवन है प्यार की रसधार बन जाओ
    बड़ी मायूस है ज़िन्दगी ज़रा झंकार तो कर जाओ।

    काली बिखरी सी ज़ुल्फों को कांधे पे लहराते आ जाओ अपनी कजिरारी अंखियन की वो मुस्कान तो दे जाओ।
    दमकती मेरे नाम की बिंदी माथे पे सजा के आ जाओ
    आओगे मेरे बुलाने पर इसका ज़रा ऐतबार तो दे जाओ।

    मेरे हिस्से के वो लम्हे मेरी सौगात ज़रा तो दे जाओ
    दामन फैलाए बैठा हूं वो खुशियों के फूल दे जाओ।
    मेरे सीने की धड़कन को ज़रा रफ्तार तो दे जाओ
    तेरे सज़दे में बैठा हूं आओ ज़रा दीदार तो दे जाओ।
    ©purnimaindra

  • purnimaindra 20w

    मैं- एक- बूंद
    ***********
    मैं-
    स्वाति-नक्षत्र के
    जल की बूंद भी नहीं,
    जो सीप में पड़ कर
    एक सच्चा मोती बनूं।
    और फिर-
    मोती बनकर किसी के
    आभूषण में टकूं।
    मैं बूंद हूं एक मामूली सी,
    मामूली जल की।
    जिसका अस्तित्व
    क्षण-प्रतिक्षण बदलता है।
    पृथ्वी पर पड़ी स्थिर बूंद की तरह
    मैं और मेरा अस्तित्व!!
    जिसको अंगुली से छेड़ते हुए
    कोई भी आकृति बनाओ,
    तुम अंगुली जिधर घुमाओगे
    उधर ही मैं बढ़ जाऊंगी।
    तुम गढ़ो किसी भी सोने में,
    नगीना न बन पाऊंगी।
    मैं ओस की बूंद भी तो नहीं,
    जो बैठूं फूलों पत्तों पर,
    और दूर से अपनी चमक से
    भ्रांति दूं मोती की,
    और झिलमिलाऊं
    मोती की आभा बनकर।
    न ही मैं गंगा के
    पवित्र जल की बूंद,
    जो जीवन के अंतिम-क्षणों का
    अमृत-पान बनूं।
    मैं हूं सिर्फ एक ठहरे
    जल की बूंद-
    अस्तित्व विहीन,कांति विहीन,शक्ति विहीन।
    ©purnimaindra

  • purnimaindra 21w

    मील का पत्थर
    **************
    सड़क के किनारे लगे मील के पत्थर की तरह हूं मैं,
    जो अपनी चिर स्थिर जगह पर विराजमान है।
    जो प्रतीक्षा में रत है आते जाते राहगीरों के लिए,
    शायद उसकी दयनीय निष्प्राण स्थिति पर दृष्टि डाले कोई।
    पर हाय! नहीं कोई मूल्य है मेरे शांत,मूक अस्तित्व का,
    केवल एक प्रतीक बन के रह गया है उनके मार्गदर्शन का।
    मेरे अस्तित्व के खोल पर कोई छायादार वृक्ष भी नहीं,
    क्यों कि मैं मील का पत्थर हूं न कठोर प्रस्तर,
    यही तो दुनियां समझती आ रही है पर कैसे कहूं कि,
    प्रस्तर हूं तो क्या? आख़िर एक अस्तित्व मेरा भी तो है।
    हां कभी कभी वर्ष में एक बार मेरे रंग रूप को चमकाने के लिए,
    कोई व्यक्ति रंग और तूलिका लिए आ बैठता है,
    अपनी गुनगुनाते हुए वह मगन हो मुझ पर नया आवरण चढ़ाता है।
    पर मैं उससे,अपना दोस्त समझकर बोलना चाहता हूं,
    तो उसकी गुनगुनाहट में मेरी आवाज़ गुम हो जाती है।
    आया हुआ व्यक्ति अपना काम निपटाकर चल देता है।
    फिर मैं अकेला तन्हा रह जाता हूं अपने चिर परिचित स्थान पर,
    सोंचता हूं आवरण तो सुंदर चढ गया पर ,
    मेरे अंदर की टूटन और घुटन वैसे की वैसी ही है,
    कुछ भी तो नहीं बदला,हां-बदला तो एक नया अहसास।
    जीवन के क्षणों में निरंतर, नये अहसासों को पाते हुए,
    टूटते-टूटते जीवन की अंतिम घड़ी तक पहुंचना चाहता हूं।
    पर क्या करूं?ठहरा प्रस्तर स्थिर हूं निरंतर,
    हां, कभी कभी उस वाहन की प्रतीक्षा करता हूं,
    जो टकरा जाए मुझसे और मुक्त हो जाऊं मैं,
    अपने मील के प्रस्तर के आवरण से,
    मुक्त हो जाऊं मैं अपनी चिर स्थिरता से,
    पहनूं नये जीवन का चोला जो परिवर्तन की ओर उन्मुख हो।
    फिर मैं अपने नये जीवन में प्रवेश करके नये अहसासों का भागी बनूं,
    और नये आवरण में नये अस्तित्व का निर्माण करूं।
    स्वरचित और मौलिक-
    ©️®️ purnima Indra
    ©purnimaindra

  • purnimaindra 21w

    आख़िरी किनारा
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    तनहाई का आलम ही अब सहारा है,
    किश्ती डूबी है कोई न अब किनारा है।

    राह में बहुत थक गये थे चलते चलते,
    मिली न कोई छांव न ही कोई आसरा है।

    भूली बिसरी मचलती यादों के जंगल में,
    न ही कोई डगर है न ही कोई उजियारा है।

    ढूंढता फिरता हूं कितने सारे अपनों को,
    कितना पागल दिल है कितना मतवारा है।

    दफ़न होती गयी हैं उम्मीदें और ख्वाहिशें,
    न ही कोई लख्त़े ज़िगर है न ही कोई प्यारा है।

    सबकी नादानियां भुला दी हैं मैंने मेरे यारों,
    दिल बस ढूंढता इक आख़िरी किनारा है।
    स्वरचित एवं मौलिक--
    ©purnimaindra

  • purnimaindra 22w

    ***** रक्षाबंधन ***
    आज है श्रावण मास की पूरनमासी,
    भाई-बहन का रिश्ता है अविनाशी।
    करो इनकी परिक्रमा कोस चौरासी,
    प्रेममय इनका रिश्ता क्या गोला-काशी।

    भाइयों की कलाई पर बंधा बहन का प्यार है
    रक्षाबंधन प्रेम से भरा अनोखा त्योहार है ।
    मिठाइयों की महक और घेवर की बयार है,
    चिरैया जैसी बिटियों की चहकें गुंजार है।

    बेटियां न हों तो घर अच्छे नहीं लगते
    इनकी रंगोली बिना त्योहार नहीं सजते।
    बेटों से इनकी नोंक-झोंक बिना पर्व नहीं मनते,
    चाॅकलेट के बिना बहिनों के हैप्पी-मूड नहीं बनते।

    त्योहारों ने जीवन में हमेशा नये रंग भरे हैं,
    नये- नये त्योहारों से ही हमारे रिश्ते हरे हैं।
    जीवन में सभी रिश्तों के बिना हम सूने खड़े हैं,
    इनसे ही जिंदा हैं वरना अवसाद तो हमें घेरे खड़े हैं।

    स्वरचित और मौलिक---
    पूर्णिमा इन्द्र
    लखीमपुर-खीरी
    उत्तर-प्रदेश
    (गोला---"गोला गोकर्ण नाथ"- खीरी.....छोटी काशी)
    ©purnimaindra

  • purnimaindra 23w


    स्वतंत्रता का बिगुल
    ****************

    लक्ष्मीबाई ने की स्वतंत्रता की नई पहल
    हुंकार भर कर बजा दिया एक नया बिगुल।

    भारत के लिए हुए क्रांतिकारी बलिदान
    आज़ाद ,भगतसिंह, अशफाक , बिस्मिल ।

    अंग्रेज़ों भारत छोड़ो कह-कहकर लोगों ने मिल जलाई स्वतंत्रता की बार बार एक नई मशाल।

    लाल,बाल,और पाल ने मचाया कोलाहल
    तो बापू ! आंदोलन ,अनशन कर गये मचल।

    आओ अपनी इस आज़ादी को करें सफल
    आओ मिलकर भारत का निर्माण करें नवल।

    स्वरचित--
    पूर्णिमा इन्द्र
    लखीमपुर-खीरी (उ०प्र०)
    ©purnimaindra

  • purnimaindra 24w

    दिल में चलता ग़मों का दौर है
    कानों में गूंजे महब्बतों का शोर है।
    ग़मों से कह दो जाके कहीं और बैठें
    पुकारता मुझे कोई अपना और है।
    ©purnimaindra