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  • priyanshu_ranjan 6w

    बारिश की बूँदों मे चुपके से रो गया हूँ,
    मै खो गया हूँ।
    मुश्किल हालातों से लड़ते लड़ते
    ख़ुद पेचीदा हो गया हूँ,
    मै खो गया हूँ।
    कितनी रातों को नींद ना आयी,
    अब जब जागना था तब सो गया हूं,
    मै खो गया हूं।
    खुशी की फसल नहीं लहलहाती,
    कितनी बार तो बीज़ बो गया हूँ,
    मै खो गया हूँ।
    बार बार फ़िर से शुरुआत की है,
    अब नहीं आऊंगा जो गया हूँ,
    मै खो गया हूँ ।

    ©priyanshu_ranjan

  • priyanshu_ranjan 32w

    जहाँ देखो हर तरफ हंगामा है,
    जिन्दगी क्या है फिजूल का ड्रामा है,

    ये दुनिया झूठ की बुनियाद पर टिकी है,
    और मैंने सच का दामन थामा है,

    तुमने अब तक ख्याली पुलाव ही पकाए हैं,
    या किसी चीज़ को पहनाया अमली जामा है,

    गरीबों के रिश्तेदार कम होते हैं,
    पैसे वालों के तो कई चाचा मामा हैं।

    मन की नंगई कैसे ढके कोई,
    तन के लिए तो सफेद कुर्ता पजामा है।
    -priyanshu

  • priyanshu_ranjan 55w

    मुझे हारे हुए लोग अच्छे लगते हैं,
    कामयाब लोगों में दंभ आ जाता है
    जिसे वो छुपाने का नाटक करते हैं बस।
    मुझे वो लोग अच्छे लगते हैं जो हार जाते हैं
    अक्सर
    बिना अपनी किसी गलती के
    जिनमें होती हैं खूबियां सफल लोगों से कहीं ज्यादा,
    पर जो हार जाते हैं सिस्टम से, भाग्य से या अपनी लापरवाही से
    या ऐन मौकों पर चूक जाते हैं
    उन मौकों पर जब सफलता की इबारत लिखी जाती है,
    तब वो सुस्ता रहे होते हैं
    या शायद उठा रहे होते हैं जिम्मेदारियाँ,
    मुझे वो हारे हुए लोग अच्छे लगते हैं
    जिनमे कोई गुस्सा या खीझ नहीं होती
    अपनी हार के प्रति ,
    जो संतुष्ट होते हैं अपनी जगह,
    हाँ पर होती है जिनमे समझ
    और इज्जत दूसरे हारे हुओं के लिए ,
    जो नहीं देखते हीनभावना से उन्हें
    या नाटक करते हमदर्दी का।
    मुझे तरस नहीं आता हारे हुए लोगों पर,
    बल्कि मेरे सबसे पसंदीदा इंसान हैं वो।
    ©priyanshu_ranjan

  • priyanshu_ranjan 69w

    टहनियां ढूँढती जड़ें,
    नादानियां करते बड़े,
    छोटे भी हैं ज़िद पर अड़े,
    हम थक गए सीधे खड़े,
    कट गए हमारे धड़ें,
    अब और हम कितना लड़ें,
    हाथ भी हो गये कड़ें,
    सिस्टम जाता और सड़े,
    उसूल लगातार हैं झड़ें,
    छोड़ो आओ कोने में पड़ें।

    ©priyanshu_ranjan

  • priyanshu_ranjan 71w

    दिमाग से सोचो दिल तो जज्बाती है,
    तुम्हारी बातों से बगावत की बू आती है,

    क्यो नही सर झुकाकर चलते,
    क्यो नही तुम हाँ में हाँ ही भरते,

    क्यों तुम अलोचना करते हो,
    क्यो नही बंद सोचना करते हो,

    क्यो दूसरों की पीड़ा तुम्हें छू जाती है,
    तुम्हारी बातों से बगावत की बू आती है।

    देखो बहारें हैं आयी हुई,
    देखो घटायें हैं छायी हुईं,

    गरीब का घर क्यों देखते हो,
    वो टपकता छप्पर क्यों देखते हो।

    गड्ढों वाली सड़क तुम्हें क्यों नहीं भाती है,
    तुम्हारी बातों से बगावत की बू आती है।

    बाकी भी तो लोग हैं जी रहे,
    हिंदू मुस्लिम जात पांत कर रहे,

    तुम भी कोई ऐसा मुद्दा ढूँढ लो,
    बाकी चीज़ों से बस आँखें मूँद लो,

    ये इतनी सी बात समझ क्यों नहीं आती है,
    तुम्हारी बातों से बगावत की बू आती है।
    ©Priyanshu Ranjan

  • priyanshu_ranjan 79w

    गोल है रोटी
    गोल है दुनिया
    खाली है थाली
    रोती है मुनिया
    किसी को भगवान
    तो इतना दे दिया
    किसी के खाते
    एक ना पैसा रुपिया
    खेतों में पसीना
    बहाता है हरिया
    फ़िर भी रूखी है रोटी
    किस्मत है करिया।
    ©Priyanshu ranjan

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    .

  • priyanshu_ranjan 80w

    वहाँ तुम रहते हो,
    मैं वहाँ नहीं जाऊँगा,
    ये नहीं कि नफरत है,
    बल्कि बेपनाह मोहब्बत है,
    पर जो सैलाब समाया है रगों में,
    वो संभाल नहीं पाऊँगा,
    वहाँ तुम रहते हो,
    मै वहाँ नहीं जाऊँगा,

    तुम्हें दूर से निहारूंगा,
    तुम्हें मन में ही पुकारुंगा ,
    मैं सारे अश्क पी लूँगा,
    मैं आंहो में ही जी लूँगा,
    कोई सपना ही सजा लूंगा
    ग़र तुम्हें भुला ना पाऊँगा,
    वहाँ तुम रहते हो,
    मै वहाँ नहीं जाऊँगा।
    ©priyanshu_ranjan

  • priyanshu_ranjan 80w

    मैंने हिटलर, स्टालिन देखे हैं,
    मैंने फैज़ और ग़ालिब देखे हैं,
    मैंने कायर हत्यारे देखे हैं ,
    मैंने शायर मतवाले देखे हैं ।

    यदि मैं इतिहास लिख सकता ,
    तो लिखता शायरों, चित्रकारों, गीतकारों को ,

    उन्हें देता ऊँचा ओहदा,
    ना कि रजवाड़ों, तानाशाहों, सियासतदारों को,

    मग़र समाज इतिहास लिखता है,
    समय बस चुपचाप देखता है।
    ©priyanshu_ranjan

  • priyanshu_ranjan 82w

    मेरे दिल के जो चराग बुझ गये हैं,
    उन्हें फ़िर से ना जलाना,
    तुम वापस ना आना।
    मुझे अच्छे से याद है वो दोपहर,
    जब मेरे कांधे पे था तुम्हारा सर,
    तुम्हारी बातों से भीनी खुशबू आती थी,
    लबों से मेरे मुस्कान भी तो नहीं जाती थी,
    अब मेरे लब भूल चुके हैं सब,
    उन्हें फ़िर से ना हंसाना,
    तुम वापस ना आना ।
    जब मैं लाता था तुम्हें कानो की बाली,
    कैसे खिल जाती थी तुम्हारे चेहरे की लाली,
    दौड़ कर जोर से मुझसे लिपट जाते थे,
    कभी जो रूठ जाते थे तो कितना सताते थे,
    अब कि मैं रूठा हूँ,
    तुम मुझे ना मनाना,
    तुम वापिस ना आना ।
    तुम्हारी जुल्फों में उँगलियाँ अटक जाती थी,
    कभी तुम्हारी चूडिय़ां भी तो चटक जाती थी,
    जब मैं चूमता था तुम्हारे सुर्ख हाथ,
    तुम कहते थे कभी छोड़ेंगे ना साथ,
    वो वादा ना सही,
    ये वादा तो निभाना,
    तुम वापस ना आना।
    ©priyanshu_ranjan

  • priyanshu_ranjan 87w

    "पैर में छाले पड़े हैं,
    बुद्धि पर ताले पड़े हैं,

    ट्रेन की क्या गलती इसमे
    पटरी पर साले पड़े हैं,

    दारू के लिए लाइन में ,
    और खाने के लाले पड़े हैं।"

    अमीर ये कहता बेशर्मी से पर
    देगा नहीं जो निवाले पड़े हैं।


    ©priyanshu_ranjan