prince_kmr

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  • prince_kmr 13w

    नहीं जानता प्राण किसने हँसाये
    नहीं जानता प्राण किसने रुलाये
    मगर मुसकराकर नयन अश्रु भर-भर
    लिखे गीत मैंने जगत को सुनाये,

    रहा दुख बिछुड़ जो गया अश्रु मेरा
    दुबारा अभी तक मुझे मिल न पाया,

    स्वयं बन सुमन शूल में मैं खिला हूँ
    स्वयं दीप बन आँधियों में जला हूँ
    न पतवार है हाथ में किन्तु फिर भी
    स्वयं नाव लेकर अकेला चला हूँ,

    बहा जा रहा आज मँझधार में मैं
    किनारा अभी तक मुझे मिल न पाया..।
    ©prince_kmr

  • prince_kmr 13w

    यदि स्वर्ग कहीं है पृथ्वी पर
    तो वह नारी उर के भीतर,

    दल पर दल खोल हृदय के अस्तर
    जब बिठलाती प्रसन्न होकर
    वह अमर प्रणय के शतदल पर,

    मादकता जग में कहीं अगर
    वह नारी अधरों में सुखकर,

    क्षण में प्राणों की पीड़ा हर,
    नव जीवन का दे सकती वर
    वह अधरों पर धर मदिराधर।

    यदि कहीं नरक है इस भू पर
    तो वह भी नारी के अन्दर,

    वासनावर्त में डाल प्रखर
    वह अंध गर्त में चिर दुस्तर
    नर को ढकेल सकती सत्वर..।
    ©prince_kmr

  • prince_kmr 13w

    समय से पूर्व की परिपक्वता अच्छी नहीं होती,
    चाहे वह किसी वृक्ष की हो या व्यक्ति की और उसकी हानि आगे चल कर भुगतनी ही होती है..।
    ©prince_kmr

  • prince_kmr 13w

    किसी के द्वारा अत्यधिक प्रेम मिलने से आपको शक्ति मिलती है,
    और किसी को अत्यधिक प्रेम करने से आपको साहस मिलता है..।
    ©prince_kmr

  • prince_kmr 13w

    सभी लोग लगे हैं काम में
    चले गए.. मैं हूँ आराम में
    हमाम में.. याद करूँगा तुम्हें
    शाम में.. सब होंगे अपने
    धन-धाम में.. मैं बैठा रहूँगा
    अन्तिम विराम में..
    नीरस निष्काम में
    तमाम में..
    ©prince_kmr

  • prince_kmr 14w

    मौसम

    कोई मौसम इतना अधूरा नहीं होता
    कि उसका होना ही खटकने लगे,
    कोई मौसम मौसम इतना निर्दय नही होता
    कि तबाह करे जीवन,

    कोई मौसम जर्जर नही होता
    अतीत का खंडहर नही होता
    कोई मौसम बंजर नही होता,

    एक मौसम में बीज बोया जाए तो
    वही खिलता है दूसरे मौसम में..।
    ©prince_kmr

  • prince_kmr 14w

    Raksha Bandhan

    कच्चे धागे में बंधा पक्का भरोसा है,
    एक रिश्ता जो अपनत्व और प्रेम का झरोखा है।

    राखी शुभ हो..
    ©prince_kmr

  • prince_kmr 15w

    ����स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं एवं बधाई ����
    ��������इंक़लाब जिंदाबाद भारत माता की जय ��������

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    हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती
    स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती
    'अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़- प्रतिज्ञ सोच लो,
    प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो!'

    असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ विकीर्ण दिव्य दाह-सी
    सपूत मातृभूमि के- रुको न शूर साहसी!
    अराति सैन्य सिंधु में, सुवाड़वाग्नि से जलो,
    प्रवीर हो जयी बनो - बढ़े चलो, बढ़े चलो!

    ©prince_kmr

  • prince_kmr 17w

    तुम जलाकर दिये, मुँह छुपाते रहे, जगमगाती रही कल्पना,
    रात जाती रही, भोर आती रही, मुसकुराती रही कामना।

    चाँद घूँघट घटा का उठाता रहा,
    द्वार घर का पवन खटखटाता रहा,
    पास आते हुए तुम कहीं छुप गए,
    गीत हमको पपीहा रटाता रहा,

    तुम कहीं रह गये, हम कहीं रह गए, गुनगुनाती रही वेदना,
    रात जाती रही, भोर आती रही, मुसकुराती रही कामना।

    तुम न आए, हमें ही बुलाना पड़ा,
    मंदिरों में सुबह-शाम जाना पड़ा,
    लाख बातें कहीं मूर्तियाँ चुप रहीं,
    बस तुम्हारे लिए सर झुकाता रहा,

    प्यार लेकिन वहाँ एकतरफ़ा रहा, लौट आती रही प्रार्थना,
    रात जाती रही, भोर आती रही, मुसकुराती रही कामना।

    शाम को तुम सितारे सजाते चले,
    रात को मुँह सुबह का दिखाते चले,
    पर दिया प्यार का, काँपता रह गया,
    तुम बुझाते चले, हम जलाते चले,

    दुख यही है हमें तुम रहे सामने, पर न होता रहा सामना,
    रात जाती रही, भोर आती रही, मुसकुराती रही कामना।
    ©prince_kmr

  • prince_kmr 17w

    जब-जब अनबन हुई हमारी ,
    स्वाभिमान नित छोड़ा मैंने ।
    सुलह किया,मतभेद मिटाया,
    नेह पुराना जोड़ा मैंने ।।
    अबकी मैं ही रूठ गयी जब ,
    भीतर - भीतर टूट गयी जब ,
    आकर ,गले लगाकर मुझको;
    प्यार तुम्हीं यदि कर लेते !
    क्या जाता प्रिय? एक बार ,
    मनुहार तुम्हीं यदि कर लेते !!

    एक बार स्मरण तो करते ,
    मेरे प्रेमिल अभिसारों का ।
    रहे समर्पित जो बस तुमको ,
    मेरे सारे शृंगारों का ।।
    सीने में मृदुभाव उमड़ते ,
    मैंने होंठ सिले हैं प्रियवर ।
    नेह - नगीने इन आँखों के ,
    टांक रही अब तक तकिये पर ।।
    छोटा - सा , अपराध हुआ ;
    स्वीकार तुम्हीं यदि कर लेते !
    क्या जाता................... !!

    हो प्रेम-सरोवर तुम , लेकिन
    जल हुआ सागरों-सा खारा ।
    मुरझाई नलिनी क्यों जल में ?
    तुमसे जग पूछ रहा सारा ।।
    अमृत का पान किया मैंने ,
    पी लूँगी आज हलाहल भी ।
    लो सम्मुख बैठी हूँ आकर ,
    नयनों में नदिया कल-कल भी।।
    भ्रम, संशय के भवसागर को ;
    पार तुम्हीं यदि कर लेते !
    क्या जाता................... !!

    साजन! मेरा धूमिल मुखड़ा ,
    तुम अपने हाथों में लेकर ।
    इस मौन हृदय के भावों को ,
    विन्यास अक्षरों का, देकर ।।
    कहना है जो,कह दो साथी ,
    लड़ना चाहो तो लड़ भी लो ।
    सब बैर भुलाकर , माथे पर -
    निर्मल-सा चुम्बन जड़ भी दो ।।
    एक बार हँसकर , मुझपर ;
    अधिकार तुम्हीं यदि कर लेते !
    क्या जाता.................... !!
    ©prince_kmr