prashant_gazal

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  • prashant_gazal 1w

    2122 2122

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    ग़ज़ल (काश)

    आशिक़ों को होश होता l
    फिर कहाँ पुर-जोश होता ??

    रोज़ परवाने न जलते....
    गर शमा का दोश होता ll

    तिश्नग़ी मेरी न मिटती...
    मैकदा बेहोश होता ll

    ज़िंदगी गर दौड़ होती....
    आदमी खरगोश होता ll

    ये ज़माना चाहता है.....
    शेर-दिल ख़ामोश होता ll

    काश उसमें भी 'ग़ज़ल' सा....
    हसरत-ए-आग़ोश‌ होता ll
    ©prashant_gazal

  • prashant_gazal 4w

    बहरे रमल मुसम्मन महज़ूफ़
    फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
    2122 2122 2122 212

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    ग़ज़ल (ज़िंदगी)

    ज़िंदगी पैकार है तो हौसला हथियार है l
    ठान लो तो जीत बन्दे, मान लो तो हार है ll

    ज़िंदगी आसान भी है, ज़िंदगी दुश्वार भी....
    किस तरह से जी गई ये आपका किरदार है ll

    क्या सही है क्या ग़लत, हर काम दिल से पूछकर...
    जो सुने सबकी, करे ख़ुद की, वही होश्यार है ll

    ग़ैर को अपना बना दे, है असल वो ज़िंदगी....
    सिर्फ़ अपने ही लिये जो जी गई , बेकार है ll

    बीज बो दो आज अगली नस्ल की खातिर 'ग़ज़ल'..
    कल जिसे बोया गया था, आज वो फलदार है ll
    ©prashant_gazal

  • prashant_gazal 4w

    2122 1212 22

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    ग़ज़ल (अश्क़)

    आस्तीनों में सांप पाले हैं l
    शौक अपने बड़े निराले हैं ll

    फिर सियासत ने आग बाँटी है..
    फिर से बाज़ार में उजाले हैं ll

    सरहद-ए-हिंद के चराग़ों ने...
    तेज तूफान रोज़ टाले हैं ll

    दांत के आस-पास रहती है...
    जीभ में दर्दनाक छाले हैं ll

    राम ने मस्जिदें कहाँ तोड़ीं..
    या ख़ुदा ने कहाँ शिवाले हैं ??

    दश्त-ए-दिल में गुफ़ा बनाई है...
    जा वहीं शेर ये निकाले हैं ll

    इश्क़ कब तक 'ग़ज़ल' लिखा जाए...
    अश्क़ भी आपके हवाले हैं l
    ©prashant_gazal

  • prashant_gazal 4w

    (12122) x 4

    सुनाई देती है जिसकी धड़कन...����

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    ग़ज़ल (तलाश)

    करूं मैं इजहार-ए-इश्क़ कैसे, दबी तमन्ना उभर न पाए l
    जो बात मुझको जला रही है, सनम सुने तो सुलग न जाए ll

    हैं इश्क़ के ही मक़ाम सारे, ये दिल्लगी, उंस या अकीदत..
    करे इबादत ख़ुदा बनाकर , जुनून-ए-दिलबर क़जा कहाए ll

    सराब का जब किया है पीछा, मिला हूँ आकर समंदरों से....
    न काम दोनों ही आए मेरे, किसे कहूं तिश्नग़ी बुझाए ??

    न झूठ बोले, न सच बताए, न ऐब जाने, न खूबियों को....
    ये आइना है शरीफ़ कितना, जिसे नज़र सब ज़हीन आए ll

    गुज़ारिशें महफ़िलें सजातीं, तो कौन किसको 'ग़ज़ल' सुनाता l
    बने हक़ीक़त हों ख़्वाब जिसके, कही-अनकही वही सुनाए ll

    ©prashant_gazal

  • prashant_gazal 4w

    ग़ज़ल (आता रहा )

    कुछ दिखाता रहा, कुछ छुपाता रहा l
    आइना झूठ, सच में मिलाता रहा ll

    हाय! दिल ना हुआ, प्लेटफारम हुआ....
    कोई आता रहा, कोई जाता रहा ll

    अश्क़, गम, दर्द बेचे-खरीदे नहीं....
    मैं हँसा और सबको हँसाता रहा ll

    रोज़ दरिया में सैलाब आते रहे.....
    और मालिक सफ़ीना चलाता रहा ll

    चांद तारों से रौशन उधर आसमाँ.....
    रात जुगनूँ इधर टिमटिमाता रहा ll

    ज़ख्म वीरानियों ने उसे भी दिए....
    महफ़िलों में 'ग़ज़ल' जो सुनाता रहा ll
    ©prashant_gazal

  • prashant_gazal 5w

    गीत (वतन)

    वतन से बिछड़कर वतन याद आया l
    गुलों से भरा वो चमन याद आया ll

    कमाई की खातिर कहां आ गये हैं l
    कहां छोड़ अपना जहां आ गये हैं ll
    न बोली, न भाषा, न त्योहार अपने,
    भला किसलिये हम यहां आ गये हैं ll
    पराई ज़मीं , आसमां भी पराया l
    वतन से बिछड़कर................ ll

    नए रास्तों की नई मंजिलें हैं l
    मगर अब कहां वो‌ हसीं महफ़िलें है ll
    बदन‌ है यहां पर , ज़हन है वहां पर,
    सफ़र संग करती कई मुश्किलें हैं ll
    जहाँ सब था अपना , न कोई किराया l
    वतन से बिछड़कर................ ll

    जुदाई की रातें , जुदाई भरे दिन l
    घड़ी चल रही धड़कनें रोज गिन-गिन ll
    क़दम कब रखेंगे वतन की ज़मीं पर,
    हमें उस घड़ी की तमन्ना है पल-छिन
    मुकद्दर ने कमबख़्त क्या-क्या दिखाया l
    वतन से बिछड़कर................ ll

    ख़ुदा से दुआ रात-दिन मांगता हूँ l
    सुख़न‌वर वो‌ अपना‌ वतन मांगता हूँ ll
    जहां बाप, मां और भाई बहन हैं ,
    सनम संग बेटी-मिलन मांगता हूँ ll
    वही आशियाना, कभी जो बनाया l
    वतन से बिछड़कर................ ll

    वतन से बिछड़कर वतन याद आया l
    गुलों से भरा वो चमन याद आया ll

    ©prashant_gazal

  • prashant_gazal 5w

    बहरे रमल मुरब्बा सालिम
    फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन
    2122 2122

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    ग़ज़ल ( हासिल)

    ज़िंदगी हासिल नहीं है l
    मौत भी मंजिल नहीं है ll

    बे-करारी मांगती है.......
    आशिक़ी मुश्किल नहीं है ll

    गम समंदर बन चुका है...
    दूर तक साहिल नहीं है ll

    जानवर से इश्क़ कर लो...
    आदमी क़ाबिल नहीं है ll

    वक़्त बदलेगा हमारा.....
    वक़्त पत्थर-दिल नहीं है ll

    क्यूँ लुटा दें जाहिलों पे...
    इल्म तो फ़ाज़िल नहीं है ll

    इस तरफ तो मुश्किलें हैं...
    क्या उधर हाइल नहीं है ??

    रूह बाक़ी है वतन में.....
    जिस्म में शामिल नहीं है ll

    अब 'ग़ज़ल' किसको सुनाएं...
    वो हसीं महफ़िल नहीं है ll
    ©prashant_gazal

  • prashant_gazal 6w

    चामर छंद
    वर्ण - १५
    रगण जगण रगण जगण रगण

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    ईश्वर

    हे शिवाय, विष्णु, ब्रह्म आदि देवता नमो l
    शारदा, उमा, रमा समस्त शुभ्रता नमो ll
    राम, कृष्ण, सूर्य, चंद्र की अनन्तता नमो l
    श्री गणेश, कार्तिकेय भातृ-भद्रता नमो ll

    सोम, इन्द्र, दक्ष, नाग, सिंधु, कल्कि, मारुती l
    कालरात्रि, भैरवी, नमामि मोहिनी, सती ll
    रिद्धि, सिद्धि, अत्रि, व्यास, बुद्धिदा सरस्वती l
    कालिका, कपीश,कामदेव, वैष्णवी, रती ll

    चित्रगुप्त, शेषनाग, वीरभद्र, दुर्गमा l
    नंदिनी, वशिष्ठ, ब्रह्मचारिणी, मनोरमा ll
    सिद्धिदात्रि,रूक्मिणी,वसुंधरा, सुधा, यमा l
    वेंकटेश, रेणुका, विभिन्न भेष-भंगिमा ll

    वायु, वारि, व्योम, भूमि, अग्नि पंच-तत्व में l
    जीव-जन्तु, पर्ण, पुष्प, वृक्ष के घनत्व में ll
    ज्वार-भाट, याम-रात्रि दिव्य चुम्बकत्व में l
    गुप्त आप हैं समस्त सृष्टि के महत्व में ll

    रूप भिन्न ,नाम भिन्न , भिन्न-भिन्न मान्यता l
    जै सनातनी परम्परा सुधर्म , सभ्यता ll
    सर्व देव-देवियां सदा करें सहायता l
    चित्त मध्य हो 'प्रशांत' के सदा प्रसन्नता ll
    ©prashant_gazal

  • prashant_gazal 7w

    इश्क़

    मैं अक़्सर सोचता हूँ, इश्क़ क्या है ?
    ख़ुदा है , बंदग़ी है, या ख़ता है ll

    तकल्लुफ़ से मुख़ातिब जो नहीं है,
    ज़माने से अलग दुनिया कहीं है l
    गुमाँ है इश्क़ या कोई हक़ीक़त,
    अधूरी या मुक़म्मल है मुहब्बत l
    कोई माँ-बाप को दिल में बसाए,
    कोई औलाद पे जाँ तक लुटाए l
    बहन का हाथ थामे ज़िंदगी भर,
    कलाई से बँधी राखी कहीं पर l
    सुख़न ने रूह को जैसे छुआ है,
    मैं अक़्सर सोचता हूँ, इश्क़ क्या है ?

    गया बचपन जवानी पास आई,
    फ़िजाओं की रवानी पास आई l
    नज़ारे देखते जब आह निकली ,
    उमड़ते बादलों के बीच बिजली l
    मुसलसल करवटों में शब गुज़ारे,
    सुहाने ख़्वाब, जिनमें चांद-तारे l
    सनम का दिल लुभाती आज़माइश ,
    मुहब्बत के लिए होती नुमाइश l
    निग़ाहें मिल रहीं , दिल खो गया है l
    मैं अक़्सर सोचता हूँ, इश्क़ क्या है ?

    अभी तक इश्क़ अच्छा लग रहा था,
    सुहाना और सच्चा लग रहा था l
    मगर अब दर्द क्यूँ होने लगा है ?
    मुहब्बत में मज़ा खोने लगा है l
    जुदाई अब सहन होती नहीं है,
    रहाइश एक पल की भी नहीं है l
    दुआओं में सनम की ख़्वाहिशें हैं ,
    मगर मजबूरियों की आतिशें हैं ll
    ख़याल-ए-हमसफ़र मुश्किल हुआ है ,
    मैं अक़्सर सोचता हूँ, इश्क़ क्या है ?

    वफ़ा-ए-यार पाकर मुस्कुराए ,
    हुआ ग़र बेवफ़ा आंसू बहाए l
    मिले या छोड़ जाए रास्ते में ,
    जुदा लम्हात दो, दोनों नशे‌ में l
    मुहब्बत की सही मंजिल कहाँ है ?
    ख़ुशी महबूब की पहले जहाँ है l
    बने ग़र हमसफ़र तो ज़िंदगानी ,
    जुदा हो जाए तो कोई कहानी l
    सनम बस ख़ुश रहे , इतनी दुआ है ,
    मैं अक़्सर सोचता हूँ, इश्क़ क्या है ?

    सुकून-ए-दिल मुहब्बत से अगर है,
    दिलों में हाय! नफरत क्यूँ मगर है ?
    बदलते वक़्त में बदले नहीं जो ,
    भले हो‌ ख़ाक पर पिघले नहीं जो l
    शमा से रोज़ परवाना जलेगा ,
    गुल-ए-उलफ़त तो रोज़ाना खिलेगा l
    वही रिश्ता बचेगा इश्क़ जिसमें ,
    ज़वानी में, बुढ़ापे , बचपने में l
    'मुहब्बत' को कहो, कैसा लिखा है ,
    मैं अक़्सर सोचता हूँ, इश्क़ क्या है ?

    ©prashant_gazal

  • prashant_gazal 7w

    2122 2122 212

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    हे गुरू ! शत शत नमन है आपको l
    शिष्य का श्रद्धा-सुमन है आपको ll
    लेखनी परिवार का सौभाग्य है l
    'रिक्त' होने की कला वैराग्य है ll
    नित 'नवल' ऊर्जा जगाई आपने l
    'दीप्ति' दीपक बन जलाई आपने ll
    है 'परम' यह ज्ञान का भण्डार भी l
    व्याकरण की 'माधुरी' रसधार भी ll
    शिल्प , लय, रस, छंद की 'अनिता' यहाँ l
    'सौम्यता' 'रजनी' 'हिया' 'शुचिता' जहाँ ll
    काव्य का नीरद 'सरोजों' से भरा l
    तृप्त 'मानव' का 'विपिन' मन उर्वरा ll
    'शिवि', 'लवी', 'रानी', 'अतुल ', 'आनंद' में l
    शुभ 'विराजित' है 'किशोरी' छंद में ll
    शांतिप्रद 'सम्प्रति', 'तुषारापात' से l
    और 'आकांक्षा'मयी कुछ बात से ll
    शब्द 'गुंजित' हो चले 'संजय' सुनें l
    भाव की 'रेखा' सरल 'अंजलि' चुनें ll
    गीत सुंदर तो 'ग़ज़ल' कोई कहे l
    धार भावों की कहानी में बहे ll
    आप सबसे यह सुखद संसार है l
    आप सबसे लेखनी परिवार है ll

    आप सबसे लेखनी परिवार है ll
    ©prashant_gazal