pranavapraanjal

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  • pranavapraanjal 1w

    मैंने बनाई है बांध
    इक उफनती नदी पर
    टूटेगा सब्र किसी दिन नदी का
    सारे सपने डूब कर दम तोड़ देंगे

    मैं खुद तोड़ देना चाहता हूं, बांध
    पर कैसे? बांध के इस पार
    सपनों के बीज से
    कोई पौधा उगता देख कर
    दो चार पत्थर और चढ़ा आता हूं।।

    - प्रणव

  • pranavapraanjal 16w

    चाँद टूटा पिघल गए तारे
    क़तरा क़तरा टपक रही है रात
    पलकें आँखों पे झुकती आती हैं
    अँखड़ियों में खटक रही है रात
    आज छेड़ो न कोई अफ़्साना
    आज की रात हम को सोने दो

    शाम से पहले मर चुका था शहर
    कौन दरवाज़ा खटखटाता है
    और ऊँची करो ये दीवारें
    शोर आँगन में आया जाता है
    कह दो है आज बंद मय-ख़ाना
    आज की रात हम को सोने दो

    जिस्म ही जिस्म हैं, कफ़न ही कफ़न
    बात सुनते न सर झुकाते हैं
    अम्न की ख़ैर, कोतवाल की ख़ैर
    मुर्दे क़ब्रों से निकले आते हैं
    कोई अपना न कोई बेगाना
    आज की रात हम को सोने दो

    कोई कहता था, ठीक कहता था
    सर-कशी बन गई है सब का शिआर
    क़त्ल पर जिन को ए'तिराज़ न था
    दफ़्न होने को क्यूँ नहीं तय्यार
    होश-मंदी है आज सो जाना
    आज की रात हम को सोने दो

    खुलते जाते हैं सिमटे-सुकड़े जाल
    घुलते जाते हैं ख़ून में बादल
    अपने गुलनार पँख फैलाए
    आ रहे हैं इसी तरफ़ जंगल
    गुल करो शम्अ, रख दो पैमाना
    आज की रात हम को सोने दो

    -कैफ़ी आज़मी

  • pranavapraanjal 17w

    दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ
    मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ

    जम्अ' करते हो क्यूँ रक़ीबों को
    इक तमाशा हुआ गिला न हुआ

    हम कहाँ क़िस्मत आज़माने जाएँ
    तू ही जब ख़ंजर-आज़मा न हुआ

    कितने शीरीं हैं तेरे लब कि रक़ीब
    गालियाँ खा के बे-मज़ा न हुआ

    है ख़बर गर्म उन के आने की
    आज ही घर में बोरिया न हुआ

    क्या वो नमरूद की ख़ुदाई थी
    बंदगी में मिरा भला न हुआ

    जान दी दी हुई उसी की थी
    हक़ तो यूँ है कि हक़ अदा न हुआ

    ज़ख़्म गर दब गया लहू न थमा
    काम गर रुक गया रवा न हुआ

    रहज़नी है कि दिल-सितानी है
    ले के दिल दिल-सिताँ रवाना हुआ

    कुछ तो पढ़िए कि लोग कहते हैं
    आज 'ग़ालिब' ग़ज़ल-सरा न हुआ

    - मिर्ज़ा ग़ालिब

  • pranavapraanjal 18w

    मैंने कब कहा
    कोई मेरे साथ चले
    चाहा जरुर!
    अक्सर दरख्तों के लिये
    जूते सिलवा लाया
    और उनके पास खडा रहा
    वे अपनी हरीयाली
    अपने फूल फूल पर इतराते
    अपनी चिडियों में उलझे रहे

    मैं आगे बढ गया
    अपने पैरों को
    उनकी तरह
    जडों में नहीं बदल पाया

    यह जानते हुए भी
    कि आगे बढना
    निरंतर कुछ खोते जाना
    और अकेले होते जाना है
    मैं यहाँ तक आ गया हूँ
    जहाँ दरख्तों की लंबी छायाएं
    मुझे घेरे हुए हैं......

    किसी साथ
    या डूबते सूरज के कारण
    मुझे नहीं मालूम
    मुझे
    और आगे जाना है
    कोई मेरे साथ चले
    मैंने कब कहा
    चाहा जरुर!

    सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

  • pranavapraanjal 19w

    सब जीवन बीता जाता है
    धूप छाँह के खेल सदॄश
    सब जीवन बीता जाता है

    समय भागता है प्रतिक्षण में,
    नव-अतीत के तुषार-कण में,
    हमें लगा कर भविष्य-रण में,
    आप कहाँ छिप जाता है
    सब जीवन बीता जाता है

    बुल्ले, नहर, हवा के झोंके,
    मेघ और बिजली के टोंके,
    किसका साहस है कुछ रोके,
    जीवन का वह नाता है
    सब जीवन बीता जाता है

    वंशी को बस बज जाने दो,
    मीठी मीड़ों को आने दो,
    आँख बंद करके गाने दो
    जो कुछ हमको आता है

    सब जीवन बीता जाता है

    - जयशंकर प्रसाद

  • pranavapraanjal 24w

    मिट्टी प्यासी थी
    बादल को खुशबू चाहिए थी
    बादल ने खोल दिए नलके
    और पहाड़ी से उतर कर चुरा ली खुशबू

    मिट्टी बादल से मिलना चाहती थी
    हमेशा हमेशा के लिए
    पर बादल दूर, बहुत दूर जा चुका था

    फिर एक दिन बादल को तलब लगी
    खुशबू की
    वो बरसा, खूब बरसा
    पर मिट्टी पहले से भीग चुकी थी
    रो रो कर
    रोते हुए निकलती खुशबू का हकदार कोई और बना

    बादल बरसता रहा
    चुकी उसे गुमान था
    पानी के बगैर नहीं आ सकती खुशबू
    और उसका गुमान टूटा

    मिट्टी ने मौन संदेश दिया
    शोषण से नहीं निकलती है खुशबू
    प्रेम आधार है

    - प्रणव

  • pranavapraanjal 29w

    तुम नज़्म हो जिसकी कोई मीटर नहीं है

    देखूं जो तुमको गौर से तो
    लगता है मानो किसी हूर के सारे फीचर्स की
    मरम्मत हुई हो
    कि इस जहां में किसी मुख़्तलिफ़ रंग-ओ-बू की
    शिरकत हुई हो
    कि आसमां को ताकता हूं तो कोई तारा
    नहीं है तुमसा
    चांद की तो बात छोड़ो, तुमसे रश्क करके
    नादान जल रहा है बल्ब जैसा

    आइना जो टंगा है रूम के दीवार पे
    वो इक झलक पाने को ही लटका हुआ है
    फ्रेम जैसा
    कल सुबह कॉलेज को निकलो और झांको
    इक दफ़ा
    वो फिर खुशी से कल तलक लटका रहेगा
    फ्रेम जैसा
    बस वो ख़ाली फ्रेम में तुमको छुपाना चाहता है
    हर नफ़स शीशा तुम्हें अपना बनाना चाहता है

    तो कुछ दिनों से मैं भी बहर में
    तुमको गाने के लिए पगला गया हूं
    पर नहीं आवाज़ ना ही जितने मीटर जानता हूं
    उसमें कहीं तुम फिट हो बैठी
    तो सोचा मैंने पंछियों से
    धुन चुरा कर और सारे मिटरो का इल्म लेकर
    फिर तुम्हें मैं बांध लूं था ये इरादा
    पर रेत जैसी हो फिसलती बांधते ही
    क्या करूं मैं ?
    तुम किसी मीटर में आती ही नहीं हो !!!

    - प्रणव

  • pranavapraanjal 32w

    तुम मौसम हो
    जिसमे कई बदलाव हैं
    कभी सूखा कभी सर्द
    कभी गीला कभी गर्म
    आज पतझड़ कल बहार
    अभी शांत फिर बयार

    मैं आलोचक हूं
    हमेशा बदलता हूं
    बारिश में धूप चाहिए
    धूप में चाहिए बारिश
    जाड़े में चाहिए अलाव
    उमस में दरख़्त की छाव

    तुम प्रकृति हो
    मैं प्रवृति हूं ।।

    - प्रणव

  • pranavapraanjal 35w

    बहुत मायूस तुम रहने लगे हो

    कहो तो उसके हाथों सौंप आऊँ

    - प्रणव

  • pranavapraanjal 37w

    मैंने हक को दान समझकर भिक्षा मांगी है
    मैंने अनपढ़ राजाओं से शिक्षा मांगी है
    मेरे सारे प्रयासों का दान नहीं मिला
    मानव होने का मुझको सम्मान नहीं मिला

    झुग्गी से ब्रह्मांड झलकता सपने जलते हैं
    बच्चे बिलख बिलख कर अपनी आंखे मलते हैं
    पेट तड़पता रहता है जलपान नहीं मिला
    मानव होने का मुझको सम्मान नहीं मिला

    ज्वार देह का पसली में अकड़न दे जाता है
    हड्डी हड्डी रात रात भर चीख के गाता है
    सदियों से मुझ जैसों को आराम नहीं मिला
    मानव होने का मुझको सम्मान नहीं मिला

    - प्रणव