• sanjeevshukla_ 7w

    कविता

    *कविता-शब्द प्रहार*

    अंतर्मन स्थिर करो स्वयं... जग की बातों पर ध्यान न दो !
    बस बढ़ते चलो कर्म पथ पर औरों की बात पे कान न दो l

    दुनिया की बातों की चिंता में,भ्रम अपने मन क्यूँ पालें,
    क्यूँ अर्थ हीन उत्साह हींन.. करती बातों पर मन डालेँ l

    आवाजें सुनो सदा मन की,जो सदा उचित पथ दिखलातीं , मत सुनो नकारात्मक बातें,जो पथ से विचलित कर जातीं l

    कर्तव्य निष्ठ संघर्ष मयी,व्यक्तित्व शिखर की सीढ़ी है ,
    पदचिन्ह तुम्हारे देख-देख, उन पर चलती नव पीढ़ी है l

    कुछ तुच्छ अनर्गल शब्द तुम्हें, विचलित कर दें ये उचित नहीं,
    कुछ द्वेष भाव रखने वाले....... चिंतित कर दें ये उचित नहीं l

    जो तुमको चिंतित करते हैं तुम उनको चिंतित कर डालो,
    आनंदित होंगे हम..... ऐसे लोगों को विचलित कर डालो l

    जो दशा न मन की समझ सके उसकी बातों में सार नहीं,
    अपने मन पर अधिकार रखो,औरों को दो अधिकार नहीं l!

    तुम जैसे हो सर्वोत्तम हो....... तुमसे औरों का पार नहीं,
    तुम लक्ष्य बनाओ औरों को, खुद सहना शब्द प्रहार नहीं !...

    ©संजीव शुक्ला'रिक्त'