• stewpid_ 113w

    मन उदास एक बार फिर से है
    मगर नहीं है लिखने को आज कुछ

    निकला है इस पूर्णिमा पे भी चाँद
    मगर चमक में कमी तो उसकी भी है आज कुछ

    पंछियो ने आज फिर डाला है बसेरा आंगन में
    मगर मायूसी तो उनकी चेचाहट में भी है आज कुछ

    गलत तो ठहरा दिया दुनिया ने तुम्हे
    मगर मजबूरियां तो रही होंगी न तुम्हारी भी कुछ