• my_sky_is_falling 16w

    ग़ज़ल

    ख़्वाब पलकों पे कितने सजाए अब तक
    जाने क्या बात है वो नही आए अब तक

    खौफ़ में जीते है इक इसी बात पे दरख्त
    शाम हो गई है परिंदे नही आए अब तक

    ज़ख्म है गम है और इर्द गिर्द तन्हाइयां है
    इसीलिए तो चिराग़ नही जलाए अब तक

    ना पूछ मुझसे मेरी बेबसी का आलम कि
    कैसे जीते रहे तेरे गुनाह छिपाए अब तक
    ©my_sky_is_falling