• rituchaudhry 9w

    याद

    तुम्हारी याद हर रोज़ बे पहर आती है
    ना देखे सुबह शाम दोपहर, कभी भी आती है

    हम लाचार हैं कुछ कह नहीं सकते
    बहुत बे शर्म ठहरी बिन बुलाये आती है

    मुहब्बत के कुछ उसूल हैं यारों
    कभी रुला के कभी हँसा के जाती है

    रातों की तन्हाईयों में तड़पा के जाती है
    पूछा हमने, तुम नहीं आते, क्यों अकेले आती है

    मुस्कुराई,बोली, दुनियादारी में बहुत मसरूफ़ हैं वो
    मुझे भेज देते हैं तुम्हारा साथ देने को

    बताएँ क्या अब, फ़र्क़ तुम्हारे और उसके आने में
    तुम समेट लेते हो वो बिखेरे जाती है

    बड़ी नासमझ है इशारे समझ नहीं पाती
    बहुत बे शर्म ठहरी बिन बुलाये आती है

    जब भी आती, रुला के कभी हँसा के जाती है
    तुम नहीं आते फ़क़त तनहाई आती है
    ©rituchaudhry