• amateur_skm 9w

    (✿☉。☉)

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    दो प्रेत

    गर्मी गुजर रही है
    धीरे धीरे ठंड आ रही है
    लेकिन इस बार
    देह नहीं दिल ठिठुर रहा है

    गर्मी के उड़ते धूल बैठ चुके हैं
    पार्क के कुर्सियों पर
    अब उन कुर्सी पर कोई नहीं बैठता
    सिवाय दो प्रेत के
    दोनो प्रेत सिर्फ़ एकटक निहार रहे हैं
    वो भी बिना आँखों के

    अब इस सन्नाटे में
    तुम्हें सुनने की कोशिश होती है
    लेकिन अब कोई कविता नहीं सुनाई देती
    सिर्फ़ सुनाई देती हैं सिसकियां
    वो भी प्रेम के देवता की
    जैसे
    उस देवता को किसी ने काल कोठरी में कैद कर
    भयंकर पीड़ाएं दे रहा हो,

    हां! उन सिसकियों के परे
    अब दो प्रेत भटकते रहते हैं
    कभी मेरे छत पर
    कभी तुम्हारे छत पर

    /सौरभ