• rajput_pankaj 23w

    कलम

    है कलम वो कितनी नशीबों वाली
    जो तेरे सजदे में कुछ लिखती है

    मुझे भाता नहीं कुछ अब सिवा तेरे
    हर रंग में तेरी ही परछाई दिखती है

    रंग तेरे दामन में कितने प्यारे मिलते हैं
    है भागों वाले वो फुल जो तेरे आँगन में खिलते हैं

    तेरे इस ठन्डे आँचल की छावं में
    जाने कितनी नदियाँ संगीत लिखती हैं

    रंग बिरंगे रंगों से होली भी इतराती है
    दीपों से सजी दिवाली हमें प्यार का पाठ पढ़ाती है

    अनेकों मजहबों से मिलकर बनी ये माला तेरी
    हमें एकता का सुत्र सीखलाती है

    कहीं सूखे रेतों में कहीं हरे भरे खेत खलिहानों में
    कभी भीड़ में ढूंढे तुझको हम कहीं ढूंढे विरानों में

    कहीं पर गंगा के पानी सा पावन बहता है
    कहीं गौ हत्या कर मलिन सा रहता है

    कहीं कहीं नफरतों के पसरे बसेरे हैं
    कहीं कहीं महोब्बत के अथाह सागर सा बहता है

    शहरों की भीड़ भाड़ में कहीं शोर गुल सा बस्ता है
    कहीं शांत पड़े गावों की खुशहाली में रहता है

    जिसकी रक्षा के खातिर सपूतों को मौत से महोब्बत यथार्थ है
    दुनिया के विशाल सितिज पर चमकता सूरज वो मेरा भारत है

    हम लाखों ख़ाब तेरी महोब्बत के बुनते हैं
    किसी और से क्यों सुने हम भारत की कहानी भारत से सुनते हैं
    ©rajput_pankaj