• dharmi09 150w

    किसी पत्थर को अपने जज़्बात बताना कितना मुश्किल था !
    अपनी ही लाश अपने कन्धे पर उठाना कितना मुश्किल था !

    अखबार मे ये पढ़कर रूह काँप गयी कि फसल जल गई सारी!
    सोचो तैयार फसल के खेत मे आग लगाना कितना मुश्किल था !

    घने कोहरे से सूरज का छन कर आना कितना मुश्किल था,
    पिता के मर जाने के बाद माँ का घर चलाना कितना मुश्किल था!

    आमावस की सूनी रात मे भी मैने वो सूनापन पसरे न देखा !
    माँ की नम-उदास आँखों का वो वीराना कितना मुश्किल था !

    जो भी कमाया दिन भर उससे ज़्यादा की जब बेटा शराब पी गया
    उस वक्त पड़ोस के घर से लिया आटा लौटाना कितना मुश्किल था!

    इलाज की लाचारी से माँ ने जल्द ही फिर बिस्तर पकड़ लिया,
    पैसो की तंगहाली से माँ को दवा दिलाना कितना मुश्किल था!

    अस्पताल मे नही घर की पुरानी चारपाई पे दम तोड़ दिया माँ ने,
    हाय! अब मुर्दा जिस्म को कफन ओढ़ाना कितना मुश्किल था!

    मरकर उसके जिस्म के साथ अब लकडियों का पूरा ढेर जलेगा ,
    जीते जी लकड़ी का टुकडा जलाना उसके लिये कितना मुश्किल था !

    माँ तो मेरा उदास चेहरा देखकर ही समझ लेती थी मेरा हाल ऐ दिल,
    माँ के रूखसती के बाद किसी को अपना दर्द बताना कितना मुश्किल था !

    अन्धेरों के साये मे अपनी परछाई को खोज पाना कितना मुश्किल था,
    अब माँ के कमरे मे जाकर माँ को आवाज लगाना कितना मुश्किल था !
    ©Dharmi09