• rudraaksha 68w

    कसक बगावत तो करती है ,
    मगर भीतर ही भीतर
    कितना भी टूट जाए शख्स
    कभी मरम्मत नहीं करती है ।
    @succhiii@rangkarmi_anuj @rani_shri @aparna_shambhawi
    @neha_netra

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    ठहराव

    ठहराव कचोटता है , रह रहकर
    जैसे किसी कोठरी में
    इक उम्र बसर की हो मैंने ।

    जैसे आईने पर मुखौटा हो
    नदारद हों परिंदे और घोंसले उनके
    जैसे घड़ी अरसे से वहीं खड़ी हो ।।

    जैसे डायरी धूल धूसरित कोई
    बीस बरसों से घुट रही हो
    और अर्गनियों पर टंगे हो सवाल कई
    शायद अंगीठी में , कुछ खत जले हों।

    जैसे पूस की रात हो
    और निपट अकेला मैं
    हज़ारों मील दूर जुगनूओं से
    मैं रिहाई की मिन्नतें करता रहता हूं।
    ©rudraaksha