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    आज कुछ मन हलका करने का दिल किया उसको, तो हसने लगे लोग। बात काटकर बाेले, "ये देखो आ गई लडकी।" यह कहकर उन्होने दो बातें जो उनके मन में बस चुकी हैं, वे दिखाई। पहली: हरकतोंसे तय होता है कि यह लडका है या लडकी। दूसरी: जज्बातों की कोई अहमियत नही होती।

    क्यों है यह जातिवाद? क्यों इन बातों को मान लिया जाता है? क्यों बस इन्ही बातों का सम्मान और प्रयोग होता है। हरकते तो इन्सान का व्यक्तित्व बताती है, ना की लिंग। और क्या ये सभ विचार रखना "औरतों का अपमान" नही होता?

    सोचलो और समझलो इन बातों को। देखने का दृष्टिकोण बदलो। सभीं के जज्बातों की इज्जत करो।

    "बात काटकर, सिर्फ उसकी बात कट गई
    दिल नही टूटा, पता चला उसे भी,
    यहा नही तो कही और ही सही,
    अपनेसे जुडनेवाला कोई मिल जाए बस।"

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