• parle_g 14w

    हुज्जत - जबानी झगड़ा , तर्क-वितर्क
    काँ - कहाँ

    @vipin_ bahar @bal_ram_pandey @prashant_gazal @iamfirebird @anas_saifi

    इज ग़ज़ल पेश ए ख़िदमत में ...मुझे यकीन है आपको सब शेर अच्छे से पसन्द आएंगे....��❤️❤️

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    ग़ज़ल ( जानता हूँ )

    वज़्न - 2122 2122 2222 2122

    मैं नही भी पूछ'ता मैं फिर भी इतना जानता हूँ
    मैं तिरी राहों का हर पत्थर हर सह'रा जानता हूँ

    तुम मिरी बातें भली भाँती रखती हो अपने अंदर
    यार मैं भी तो तिरे दिल का यक रस्ता जानता हूँ

    ये मुहब्बत होती क्या है कोई आ'फ़त के सिवा फिर
    मैं बस इक़ प्यासा हूँ जाहिल, मैं बस दरिया जानता हूँ

    आगे चलकर मोड़ पर मुड़ जाना है तुमको इसी दर
    मैं तिरे इस शहर का अच्छे से नक्शा जानता हूँ

    मुझ'को कोई शाइरी अपने हालातों पर कहो तुम
    रे मियाँ फ़नकार हूँ, कागज़ पन्ना जानता हूँ

    फिर उसी हुज्जत में बिछड़ेंगे हम दोनों देख लेना
    कम्बख्त तुम क्या बता'ती हो, औ' मैं क्या जानता हूँ

    सो तुझे फिर भी हिदायत देने वाला हूँ मिरे यार
    आदमी हूँ आद'मी, मैं बस यक पैसा जानता हूँ

    अब ज़िया चाहत का कोई भी मरघट इस शहर में हो
    तुम शिकारी तो नही लगती, पर मैं काँ जानता हूँ
    ©parle_g