• abr_e_shayari 17w

    थक चुके हैं हम तुझ को प्यार कर कर के!

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    महज कुछ चंद वादों पर
    खड़ी रिश्तों की दीवारें
    तोड़ दी जाती है,
    बहाने चार कर-कर के!

    चली आती हूं चौक से
    लौट कर मैं भी तो अब,
    घड़ी बस एक-आधी,
    तेरा इंतज़ार कर-कर, के!

    कुछ दिलासा दो के,
    बदलेगा यहां कुछ तो,
    वरना क्या मिलेगा फिर,
    जाया इतवार कर-कर के!

    मैं लिखूं जो खत,
    खुले गर चार दिवारी,
    भीतर, बेहतर होगा ना,
    रखो इसे अखबार कर-कर के!
    ©shayra