• prashant_gazal 11w

    ग़ज़ल (आता रहा )

    कुछ दिखाता रहा, कुछ छुपाता रहा l
    आइना झूठ, सच में मिलाता रहा ll

    हाय! दिल ना हुआ, प्लेटफारम हुआ....
    कोई आता रहा, कोई जाता रहा ll

    अश्क़, गम, दर्द बेचे-खरीदे नहीं....
    मैं हँसा और सबको हँसाता रहा ll

    रोज़ दरिया में सैलाब आते रहे.....
    और मालिक सफ़ीना चलाता रहा ll

    चांद तारों से रौशन उधर आसमाँ.....
    रात जुगनूँ इधर टिमटिमाता रहा ll

    ज़ख्म वीरानियों ने उसे भी दिए....
    महफ़िलों में 'ग़ज़ल' जो सुनाता रहा ll
    ©prashant_gazal