• sramverma 36w

    Date 08/05/2021 Time 11:36 PM #SRV #hizr

    ये हिज़्र की रात
    हर बार ख़ौफ़ के ख़ाली
    पैकर लिए ख़ूँ मेरा माँगने
    बे-ख़ौफ़ चली आती है;

    जलती हुई आँखों के
    विस्मय के तले एक सन्नाटा
    बहुत शोर किया करता है;

    कुछ तो कटता है
    तड़पता है बहाता है ख़ूँ
    और खुल जाते हैं
    रेशों के पुराने बख़िये;

    रात हर बार मेरी
    जागती पलकें चुनकर
    अंधे गुमनाम दरीचों पर
    सजा जाती है;

    और धुँदलाए हुए
    गर्द-ज़दा रस्तों में
    एक आहट का सिरा है
    जो नहीं मिलता है;

    आसमाँ गीली चट्टानों
    पर टिकाए अपना चेहरा
    सिसकियाँ लेता है किसी
    सहमे हुए बच्चे की तरह;

    और दरीचों पर धरी
    काँपती पलकें मेरी
    गुल-ज़मीनों के नए
    ख़्वाब बुना करती हैं !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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