• deovrat 10w

    हौसला

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    सदियों से ग़म पिंघल कर अश्कों में ढल रहे हैं।
    वो दीदार-ए-ज़ुस्तज़ू में गिर कर संभल रहें हैं।।

    बादल दमकती बिजली वो काली घनी घटायें।
    ज़ीस्त-ओ-दहर में कब से तूफ़ां मचल रहें हैं।।

    आये हैं कैसे मौसम पतझड़ हो जैसे गुलशन।
    रंगीन दिल के अरमां रंग पलपल बदल रहे हैं।।

    मौसम गरम ज़बीं का तपते चमन की उलझन।
    गुलशन की आरज़ू में अब ख़ार पल रहें हैं।।

    ख़्वाहिश में जीतने की हरदम शिकस्त पाई।
    'अयन' के हौसलों में फ़िर पर निकल रहें हैं।।
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    ©deovrat 'अयन' 18.11.2021