• ayushsinghania 13w

    अजीब है,
    इक तरफ़,
    चारदीवारी के अंदर कोई अपनी पीठ पर गढ़े नाखूनों के निशान छुपाना में लगा है;
    कैसे वो कहेगी भी क्या,
    आखिर समाज जिस विवाह को संस्थान का दर्जा देता है,
    वही वो इस बात से मुँह भी मोड़ लेता की,
    "विवाह पश्चात ये सब आम है , क्योंकि वह पुरुष हैं",
    शायद इसीलिए भी वो,
    हर रोज़ साड़ी का पल्लू पीछे करते वक़्त वो चंद सेकंड पीठ पर उन उकेरी गई चीखों को सुन , दो आँसू गिरा ,
    कमरे से बाहर मुस्कुरा कर निकलती है...."

    और कही दूर , या शायद उसी मोहल्ले/इलाके/शहर में,
    दफ्तर को जाता पुरुष मन ही मन सोचता है,
    की क्या विवाह महज़ एक लेन देन है;
    चीजों का, सामानों का , पैसों का;
    क्या पुरुष होने का मतलब अपनी भावनाओं को पी लेना है,
    क्या रिश्ता सिर्फ़ एक पहिये की जिम्मेदारी है,
    क्या शादी या प्यार सिर्फ़ लोगो के सामने दिखावा है,
    क्या ये सिर्फ़ जलसे में तस्वीरों में झूठा मुस्कुराना भर हैं ?
    क्या इस संस्थान का मतलब,
    संवेदना और एक दूसरे को संभालना नही?
    क्या ये रुपयो, जरूरतों और दिखावे पर ख़त्म हो जाता है....?

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    अजीब हैं ना,
    एक ही जात(इंसानियत),
    एक ही शहर,
    पर अलग सोच ?
    ऐसे कितने ही पुरुष और स्त्रियां हर तरफ है,
    पहले भी थी/थे,
    आज भी है और शायद आगे भी रहेंगे/रहेंगी;
    दिक्कत ये है कि हम चश्मा और नज़रिया नही बदलना चाहते,
    या तो सिर्फ़ हुम् पुरुष या सिर्फ़ स्त्री को कटघरे में खड़ा कर देते है।
    जबकि,
    जरूरत ये समझने की है कि उस कटघरे में प्रश्न चिन्ह इंसानी जात पर है , न कि किसी रंग/जात/धर्म/लिंग/ पर

    प्रश्न इंसानियत का है , इंसानियत से.....
    ©ayushsinghania

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    इंसानी चश्मा
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