• tengoku 29w

    बारिशों में बरामदे की ठंडी फर्श पर बैठकर, तुम्हे हमारी हाथों कि लकीरों को तराशना बहुत अच्छा लगता था। हर बार, लकीरों में खुदको देखकर तुम हल्का सा शरमाते थे और बस, हमारा दिन बन जाता था। लेकिन हां, तुमने हमें कभी बताया नहीं की तुम्हे बिजली की आवाज़ से डर लगता है। पर जैसे ही बिजली कड़कती थी, तुम्हारे हाथ हमारी हथेली को ज़रा कसकर पड़ लिया करते थे। हम भी दुबककर तुमसे लग जाते थे और तुम्हारा डर हमारा हो जाता था।

    तुम कहते थे, हमारी आंखों में तुम्हे खुदा दिखता है। शायद इसीलिए तुम्हे हमारी बातें सुनने से ज़्यादा, हमें निहारना भाता था। बिना किसी रोक-टोक के। और इसका एहसास हमें तब होता था जब हम सारी बात कर चुके होते थे।
    "सुन भी रहे हो तुम हम तबसे क्या कह रहे हैं?"
    तुम धीरे से आंखों पर आए हमारे बालों को कान के पीछे करते और हल्का सा मुस्कुराते थे। जैसा चांद को थोड़ा और करीब से ताकने के लिए खिड़की पर लगे पर्दे को सरका रहे हो।
    "हां बाबा सब सुना"
    "अच्छा जी! क्या सुना?"
    "वहीं जो तुमने कहा"
    "हां तो हमने क्या कहा?"
    "तुमने कहा कि हम तुम्हारे और तुम हमारी।"
    "कुछ भी? जाओ हम नहीं करेंगे अब से बात!"
    "ओफ्फो!"
    फिर कुछ घंटों तक हमारा रूठना और तुम्हारा मनाना चलता था। लेकिन हां, तुमने हमें कभी ये नहीं बताया कि हमारी आंखों में तुम खुदको भी देखा करते थे। हमारी आंखों के खुदा होने का अर्थ है, उनमें तुम्हारी झलक दिखना। सिवा तुम्हारे खुदा पत्थर मात्र है।

    खैर अभी तो बहुत सी यादों को उड़ेलना बाक़ी है, अभी तो हमे तुम्हे और भी लिखना बाक़ी है।

    अच्छा सुनो ना, हाल ही में एहसास हुआ कि तुमने कितना कुछ छुपाया था हमसे, नहीं बताया कभी। आज जब उस छुपे हुए को ढूंढने, लिखने बैठते हैं तो खुदको थोड़ा और बारीकी से जान लेते हैं। मानो जैसे तुम्हारी खोज में निकलें हों और रास्ते में खुदको पा लिया। आज कल तो फुर्सत से बैठकर खूब रोते हैं उसके साथ, पर कभी नज़रें नहीं मिला पाते उससे।
    फिर अंत में उस छुपे खुदको तुम्हारे पास उसी मोड़ पर छोड़कर, वापस आ जाते हैं। तुमसे दूर, खुदसे दूर।



    -अनन्या