• my_sky_is_falling 10w

    ग़ज़ल

    कहीं धूप-छांव की बंदिशें,कहीं बे-शुमार काफिले
    ऐ जिंदगी इस सफ़र में,तू ही बता कि किधर चलें

    ये इश्क़ था कि हादसा,था मगर गजब ये मोजज़ा
    जो तेरी निगाह से उतर गए,तो खार बनकर खिले

    ये तेरे दरीचे में उतरती,सुनहली धूप भी अजीब है
    मेरी आंख में बुझी रहे,तेरी जुल्फ में जा कर खिले

    जो शरारे दिल से उठे,वो पलकों पे जाके ठहर गए
    मेरी चश्म ए तर में डूब के,कुछ चराग़ शबभर जले

    था ज़मानेभर का दर्द वो,मैं दवा समझ के पी गया
    है तुम्हारा गम ज़हर तो फिर,ये ज़हर उम्र-भर मिले
    ©my_sky_is_falling