• goldenwrites_jakir 6w

    #लिबाज़ ✍️✍️

    मुफलिसी की चादर ज़िन्दगी पर गरीबी का लिबाज़ उड़ाए हुए है
    कहीं पर लगे पेमन - कहीं पर दिखते निशां पुराने हैं ,,
    मिलजाती कभी इक वक्त की रोटी तो कभी सूनी चूल्हे पर कड़ाई है
    बदल रहा जमाना फैशन का - नए कपड़ो में फटे हुए धागे हैं
    लिबाज़ अब लिबाज़ नही मर्यादा भुल बैठे हम मुसाफिर हैं
    कहने को बहुत कुछ पर समझता यहाँ कोई नही
    इसी लिए बिराम कलम की धारा है .... |
    ©goldenwrites_jakir