• a_novice_speaks 37w

    किसी किताब में सिमटा कागज कोरा सा हूँ मैं,
    तेरे बिन आधा अधूरा सा हूँ मैं,
    वो राह जो जाती कहीं नही,
    मंजिल को बस देखती रहती है,
    उस राह सुनसान सा हूँ मैं,
    लाखों चेहरे पहचाने से,
    फिर भी कोई जानता नही...
    भीड़ भरे शहर मैं अनजान सा हूँ मै,
    फूल खिलते है मुरझाते है हज़ारों
    अदद तेरे इन्तेज़ार मे,
    स्याह रातों में जंगल बियाबान सा हूँ मैं,
    लाखों अफ़साने सुने अनसुने,
    नगमे दर्द भरे रोज वही,
    वही पुराने ख़त जो तूने लिखे थे,
    पढ़ता हूँ रोज कई कई बार...
    इस दिल मे अरमान कई बेरंग से है...
    रंग भर दे नए,
    तेरे चेहरे का नूर झलका,
    रोशन ये मेरा जहां करदे,
    कब तलक यूँ मायूस दिल तेरा रास्ता देखे,
    मैंने तेरे नाम लिख दी ये जान अपनी,
    तू मेरे नाम अपना ये जहान लिख दे,
    मेरे जीवन के पन्नो पे कुछ किस्से लिख दे.....
    जो आधे अधूरे से छूटे है वो हिस्से लिख दे।
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